यह समझना इतना आसान नहीं है कि देखा और समझ आ जाए। बड़े और छोटे का खेल निराला है। लो इधर देखो, यह लाइन देखो और बताओ यह छोटी है या बड़ी? क्या बोले, तुम इसे छोटी लाइन कहते हो भैया। नहीं भैयाजी देखो.... और उन्होंने उस लाइन के पास एक दूसरी लाइन खींच कर उसे छोटी लाइन को बड़ा साबित कर दिया। वे मुस्कुराते हुए बोले- यह मायाजाल है, दुनिया का भ्रम है। धोखा है। भैया, वास्तव में कोई छोटा-बड़ा होता ही नहीं है। सब अपने अपने कर्मों का लेखा-जोखा है कि यहां कोई छोटा दिखाई देता है और कोई बड़ा। ध्यान से सुनो, बताता हूं- बहुत बड़े-बड़े लोग, खूब पैसे टक्के कमाने वाले बड़े लोग... क्या समझते हैं- हम बड़े गली संकरी। पर भैया टेम-टेम की बात है, आज जो गली संकरी लग रही है वो समय बदलने पर बड़ी भी लग सकती है और ऐसा भी हो सकता कि बिल्कुल छोटी हो जाए। नाली जैसी। नहीं समझे.... उन्होंने कहा और मैंने अपना आपा खो दिया- नहीं तो ये सब बातें आप मुझे क्यों समझा रहे हैं। आप अपना ज्ञान अपने पास रखिए। मेरे पास खुद अपना ही ज्ञान बहुत है, मुझे क्या समझ रखा है? अपना काम करो।
फिर वे मुस्कुराते हुए बोलने लगे- नहीं भाई, तुम तो नाराज हो गए। तुम लेखक हो और ऐसी गहन गंभीर बातों पर तुम नाराज नहीं हो सकते। तुम्ही तो हो जो रहस्य समझ सकते हो। भाई साहब ऐसे तमतमाओ मत। चलो बताओ, मुझे कुछ पूछने-जानने का तो अधिकार है ना? तो मैं उसी अधिकार के नाते तुमसे जानना चाहता हूं कि कबीरजी ने लिखा था- ‘प्रेम गली अति सांकरी, जा में दो न समाय!’ यह शब्द संकरी है या सांकरी? माना की संकरी और सांकरी का एक ही अर्थ है और मात्रा से कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता। पर मात्रा से अंतर तो पड़ता है ना मेरे भाई। जैसे नर में मात्रा बढ़ाओ तो नारी बन जाता है। अरे केवल अ को आ की मात्रा में बदलने का मजा देखो कि गली से शब्द गाली बन जाता है।...
- नहीं तो जब मैंने कह दिया कि आप ज्ञानी हो और मुझे आपका ज्ञान नहीं चाहिए। फिर आप जबरदस्ती क्यों लादते जा रहे हैं। माना कि यह आपका अधिकार है कि कोई सवाल पूछ सकते हैं, पर यह क्या ऊट-पटांग जो जी में आता है, बकते जा रहे हो। लाइन छोटी-बड़ी और फिर कबीर... ये सब क्या है? मुझे क्यों परेशान कर रहे हो? उनके चेहरे की मुस्कान पर कोई ब्रेक नहीं लगा। उनकी मधुर मुस्कान और बकबक जारी रही। वे कह रहे थे- मेरा उद्देश्य आपको परेशान करना कतई नहीं है भैयाजी। मैं एक चिंतनशील प्राणी हूं और जाहिर है कि आप लेखक हैं तो आप भी चिंतनशील प्राणी हैं। जब दो चिंतनशील प्राणी मिल-बैठे तो आस-पास वालों को लगना चाहिए कि कोई गंभीर विषय पर चर्चा हो रही है। क्या मैं गलत कह रहा हूं...?
मैंने हाथ जोड़ते हुए कहा- भैया मेरे लेखक के पास बहुत सारी समस्याएं और चिंतन के विषय पहले से है। आप नाहक परेशान हो रहे हैं, आपको जो करना है करें और मुझे जो करना है वह मैं करता हूं। वे फिर बीच में बोल पड़े- अरे जब सब अपना-अपना काम करेंगे तो यह चिंतन-मनन-मंथन कौन करेगा। शब्द तो ब्रह्म है। हमारी इस विरासत और देश का क्या होगा?... वे बोलते चले जा रहे थे।
डॉ. नीरज दइया
फिर वे मुस्कुराते हुए बोलने लगे- नहीं भाई, तुम तो नाराज हो गए। तुम लेखक हो और ऐसी गहन गंभीर बातों पर तुम नाराज नहीं हो सकते। तुम्ही तो हो जो रहस्य समझ सकते हो। भाई साहब ऐसे तमतमाओ मत। चलो बताओ, मुझे कुछ पूछने-जानने का तो अधिकार है ना? तो मैं उसी अधिकार के नाते तुमसे जानना चाहता हूं कि कबीरजी ने लिखा था- ‘प्रेम गली अति सांकरी, जा में दो न समाय!’ यह शब्द संकरी है या सांकरी? माना की संकरी और सांकरी का एक ही अर्थ है और मात्रा से कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता। पर मात्रा से अंतर तो पड़ता है ना मेरे भाई। जैसे नर में मात्रा बढ़ाओ तो नारी बन जाता है। अरे केवल अ को आ की मात्रा में बदलने का मजा देखो कि गली से शब्द गाली बन जाता है।...
- नहीं तो जब मैंने कह दिया कि आप ज्ञानी हो और मुझे आपका ज्ञान नहीं चाहिए। फिर आप जबरदस्ती क्यों लादते जा रहे हैं। माना कि यह आपका अधिकार है कि कोई सवाल पूछ सकते हैं, पर यह क्या ऊट-पटांग जो जी में आता है, बकते जा रहे हो। लाइन छोटी-बड़ी और फिर कबीर... ये सब क्या है? मुझे क्यों परेशान कर रहे हो? उनके चेहरे की मुस्कान पर कोई ब्रेक नहीं लगा। उनकी मधुर मुस्कान और बकबक जारी रही। वे कह रहे थे- मेरा उद्देश्य आपको परेशान करना कतई नहीं है भैयाजी। मैं एक चिंतनशील प्राणी हूं और जाहिर है कि आप लेखक हैं तो आप भी चिंतनशील प्राणी हैं। जब दो चिंतनशील प्राणी मिल-बैठे तो आस-पास वालों को लगना चाहिए कि कोई गंभीर विषय पर चर्चा हो रही है। क्या मैं गलत कह रहा हूं...?
मैंने हाथ जोड़ते हुए कहा- भैया मेरे लेखक के पास बहुत सारी समस्याएं और चिंतन के विषय पहले से है। आप नाहक परेशान हो रहे हैं, आपको जो करना है करें और मुझे जो करना है वह मैं करता हूं। वे फिर बीच में बोल पड़े- अरे जब सब अपना-अपना काम करेंगे तो यह चिंतन-मनन-मंथन कौन करेगा। शब्द तो ब्रह्म है। हमारी इस विरासत और देश का क्या होगा?... वे बोलते चले जा रहे थे।
डॉ. नीरज दइया

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