आप आत्मा में विश्वास करें या ना करें। मुझे तो पूरा विश्वास है कि आत्मा होती है। मेरी आत्मा है और मुझ को मेरी आत्मा में आस्था है। आप क्या कहते हैं, क्या मानते हैं या मानते भी है कि नहीं मानते, इस से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं अपनी आस्था पर अडिग हूं। अडिग होना बड़ा कठिन काम है। पूरा पार्टी इतिहास देखेंगे तो पता चलेगा कोई किसी पार्टी में अडिग नहीं रहा है। वे अस्थिर होते हैं, कहते हैं- बदलाव प्रकृति का नियम है। अडिग रह कर क्या झंडे गाड़ने हैं। अडिग तो यह जीवन भी नहीं। सब चला चली का दो दिन का खेला है। इस खेले में जितन हंस खेल लें, खा-पी लें वही बस अपना है। बंद मुठ्ठी आए थे और खाली हाथ जाना है। ये इतनी ज्ञान की बातें करने वाले बड़े स्याणे होते हैं। बाते बड़ी बड़ी करते हैं और हरकतें छोटी-छोटी। मुंह में राम और बगल में छुरी की बातें ऐसे महानुभाव ही पुष्ट करते हैं। इन के लिए कुछ कहना खतरा मोल लेना है। इसलिए अपनी तो चुप है जी।
हां तो मैं बता रहा था कि मेरा मानना है- आत्माएं होती हैं और वे भटकती रहती हैं। आपको सच कह रहा हूं कि भटकती आत्माएं बेचैन होती है। भटकन और बेचैनी परस्पर एक दूसरे को हस्ट-पुष्ठ करती है। अगर इस बीमारी को चैन मिल जाए तो वे सुखी हो जाए। सुख में भला कौन भटकता है। दुनिया में सारा खेल बस सुख-चैन का है। जिसको सुख-चैन मिला की ठहर कर बैठ जाते हैं। सुख में सुमरिन भी कहां होता है। दुखी और बेचैन भटकता भटकता भी सुमरिन करता है। उसे जिस जिस की याद आती है वह उस उस के पास भटकता भटकता पहुंच जाता है इसलिए उसे भटकती आत्मा कहा जाता है। जगत में रावण की आत्मा भटकने में विख्यात है। एक रावण दस सिर और उसकी आत्माएं कितनी थी यह पता नहीं। फिर उसके भाई-बंधु और वंशज भी तो उसी नस्ल की आत्मा को लिए हुए थे।
रावणी आत्माओं का आजादी के इतने वर्षों बाद भी इलाज नहीं हुआ तो अब क्या होगा! रामजी भी रुष्ठ हो गए हैं कि अबकी बार जब माननीय प्रधानमंत्री जी ने रावण के सामने धनुष की प्रत्यंचा से निशाना साधाने का प्रयास किया तो बिना आवाज के वह टूट गया। विपक्ष की आत्माओं अट्टहास हुआ। अदृश्य आत्माएं और मौन अट्टहास। प्रत्यक्ष में तो इस टूटने पर पास खड़े पूरे व्यवस्था-विभाग को सांप सूंध गया। निकट खड़े पूर्व प्रधानमंत्री जी को वर्तमान प्रधानमंत्री जी ने देख हल्की सी स्मित विखेरी और कहा- रावण को नहीं छोड़ेंगे। उन्होंने तीर को भाले की तरह रावण की दिशा में फेंका। बात बस इतनी थी। रावणी आत्माओं को मौका मिल गया। बात का बतंगड़ बना। जाने खबरों और अपवाहों का जाल कैसे रचा, किसने रचा। पर आजाद देशवासियों ने इस घटना को तूल दिया। इसे सफेद बालों वाले 56 इंची छाती से संपन्न युवा नरेंद्र के हाथों रावण का मरने से इनकार बताते हुए, अनिष्ट और अपशकुन का प्रमाण बताया गया। पंच काका कहते हैं- राजस्थानी में एक कहावत है- रांडे रोती रहेंगी और जवांई जीमते रहेंगे। भटकती आत्माएं रांडे हैं जिनको रोना है और जवांई कौन है यह कहने की जरूरत नहीं है। थोड़ी बहुत समझ तो रखते हैं आप। अब सब कुछ काका के मुंह से ही सुनोगे कि अपना मुंह भी कुछ खोलोगे...।
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हां तो मैं बता रहा था कि मेरा मानना है- आत्माएं होती हैं और वे भटकती रहती हैं। आपको सच कह रहा हूं कि भटकती आत्माएं बेचैन होती है। भटकन और बेचैनी परस्पर एक दूसरे को हस्ट-पुष्ठ करती है। अगर इस बीमारी को चैन मिल जाए तो वे सुखी हो जाए। सुख में भला कौन भटकता है। दुनिया में सारा खेल बस सुख-चैन का है। जिसको सुख-चैन मिला की ठहर कर बैठ जाते हैं। सुख में सुमरिन भी कहां होता है। दुखी और बेचैन भटकता भटकता भी सुमरिन करता है। उसे जिस जिस की याद आती है वह उस उस के पास भटकता भटकता पहुंच जाता है इसलिए उसे भटकती आत्मा कहा जाता है। जगत में रावण की आत्मा भटकने में विख्यात है। एक रावण दस सिर और उसकी आत्माएं कितनी थी यह पता नहीं। फिर उसके भाई-बंधु और वंशज भी तो उसी नस्ल की आत्मा को लिए हुए थे।
रावणी आत्माओं का आजादी के इतने वर्षों बाद भी इलाज नहीं हुआ तो अब क्या होगा! रामजी भी रुष्ठ हो गए हैं कि अबकी बार जब माननीय प्रधानमंत्री जी ने रावण के सामने धनुष की प्रत्यंचा से निशाना साधाने का प्रयास किया तो बिना आवाज के वह टूट गया। विपक्ष की आत्माओं अट्टहास हुआ। अदृश्य आत्माएं और मौन अट्टहास। प्रत्यक्ष में तो इस टूटने पर पास खड़े पूरे व्यवस्था-विभाग को सांप सूंध गया। निकट खड़े पूर्व प्रधानमंत्री जी को वर्तमान प्रधानमंत्री जी ने देख हल्की सी स्मित विखेरी और कहा- रावण को नहीं छोड़ेंगे। उन्होंने तीर को भाले की तरह रावण की दिशा में फेंका। बात बस इतनी थी। रावणी आत्माओं को मौका मिल गया। बात का बतंगड़ बना। जाने खबरों और अपवाहों का जाल कैसे रचा, किसने रचा। पर आजाद देशवासियों ने इस घटना को तूल दिया। इसे सफेद बालों वाले 56 इंची छाती से संपन्न युवा नरेंद्र के हाथों रावण का मरने से इनकार बताते हुए, अनिष्ट और अपशकुन का प्रमाण बताया गया। पंच काका कहते हैं- राजस्थानी में एक कहावत है- रांडे रोती रहेंगी और जवांई जीमते रहेंगे। भटकती आत्माएं रांडे हैं जिनको रोना है और जवांई कौन है यह कहने की जरूरत नहीं है। थोड़ी बहुत समझ तो रखते हैं आप। अब सब कुछ काका के मुंह से ही सुनोगे कि अपना मुंह भी कुछ खोलोगे...।
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