12 सितंबर, 2017

टॉलस्टॉय की टोपी

मैं लेखक हूं पर दिखता नहीं हूं। मुझे देखकर कोई भी लेखक नहीं कहता। देखने में मैं बिल्कुल आम आदमी जैसा हूं। जो भी मुझे से मिलता है यही कहता है कि मैं लेखक जैसा दिखता नहीं हूं। अपनी ऐसी तारीफ सुन-सुन कर कोई कब तक धीरज रखेगा। आखिरकार धीरज को जबाब देना था दे दिया। मुझे महसूस होने लगा कि जब मैं लेखक हूं तो लेखक जैसा दिखाई क्यों नहीं देता हूं। अगर लेखक जैसा दिखाई दूं तो हर्ज ही क्या है? सभी समकालीन लेखक तो लेखक जैसे दिखते हैं फिर मैं आम आदमी जैसा क्यों बना रहूं। वैसे यह गलत भी तो है कि कोई लेखक हो और वह देखने में लेखक जैसा दिखाई ही नहीं दे। इस गलती को मेरे अलावा कौन सुधार सकता है। अब मैं लेखक की तरह दिखना चाहता हूं।
    मुझे खुद के लिए कुछ भी करूंगा। मैं जो हूं वही तो दिखाई देना चाहिए। समस्या यह भी है कि इधर के आलोचक भी मुझे लेखक कम और आम आदमी अधिक मानते हैं। अब आप ही बताएं कि कोई इतने वर्षों से कोई लिख रहा हो और उसे लेखक नहीं माना जाए तो वह क्या करे! यह तो सरासर नाइंसाफी हुई ना। आपको और मुझे ही नहीं वैसे सबको पता है कि सबके अपने-अपने ग्रुप हैं। मैं उनके ग्रुप में नहीं हूं तो मेरा यह हाल है। वैसे मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। और अगर पड़ता भी है तो मैं प्रत्यक्ष में यही कहूंगा कि मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं लेखक हूं और किसी आलोचक के कुछ कहने-सुनने से आम आदमी नहीं हो जाऊंगा। ऐसी साहित्य विरोधी घटनाओं और गतिविधियों से आहत होकर मैं लिखना-पढ़ना बंद नहीं कर सकता। मैं तो यहां तक छाती ठोक कर कहता हूं कि कोई पाठक भी अगर मुझे रिजेक्ट करता है तो कर दे मेरी बला से। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मुझे किसी पाठक ने लेखक नहीं बनाया है। फिर यहां यह भी बता दूं जो पाठक मुझे लेखक नहीं मानते हैं, मैं उन्हें पाठक भी नहीं मानता हूं।
    भारतीय लेखकों को देखता हूं तो सब अलग-अलग मिजाज के दिखाई देते हैं। उनमें ऐसी कोई उभयनिष्ठ चीज है ही नहीं कि मैं अपना लूं। अब मेरी दूरदृष्टि का कमाल देखिए। लगभग सारे विदेशी लेखक हेट लगया करते थे और लगते हैं। मैंने भी हेट लगाने की सोच ली। तीन-चार नेहरू टोपी ले तो आया पर बात जमी नहीं। देशी टोपी की यही औकात है कि उन्हें लगाते ही लोग मुझसे पूछने लगे कि क्या अबकी चुनाव में खड़े होने का इरादा है? कहलाना चाहता था लेखक और लोग कहने लगे नेताजी। लेखक को नेताजी कहें तो गाली जैसा लगता है।
    पंच काका की शरण में गया। उनसे सारी कथा कही। उन्होंने संदूक से एक टोपी निकाल कर मुझे देते हुए कहा- इसे पहन कर अब ठाठ से घूम। यह टॉलस्टॉय की टोपी है। कोई पूछे तो नाम बता देना। सबकी बोलती बंद हो जाएगी। फिर उन्होंने काम की बात बताई कि लेखक होने या दिखने से जरूरी है हमारा चिंतन-मनन। ईश्वर ने हम सब को पांच तत्त्वों से बनाया है पर कोई किसी के जैसा नहीं। ऐसी होती है रचना की मौलिकता। शब्द सभी के पास समान हैं पर उनको रचना में अपनी मौलिकता के साथ प्रयुक्त करना आना चाहिए। एक लेखक को अपनी भाषा गढ़नी और कमानी होती है, तभी वह लेखक कहलाता है।

नीरज दइया

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