18 सितंबर, 2017

सदा असत्य बोलो अधिनियम

डॉ. नीरज दइया
कोई माने ना माने पर देश में असत्य के प्रयोग हो रहे हैं। कहा जाता था- सच्चे का बोलबाला, झूठे का मुंह काला। अब इतने काले मुंह देख लिए कि सभी के चेहरे सफेद हो चुके हैं। काले मुंह वाले भी खुद से अधिक काले मुंह वालों की तरफ अंगुली कर दिखाने लगे हैं। कहते हैं कि हम उनसे तो ठीक है। समझ ने काम करना बंद कर दिया। अब ठीक-गलत सब गड़मड़ है। दाढ़ी-मूछों में बाबा लोग काला मुंह छिपा कर रखते रहे। अब उनकी काली करतूतें कोर्ट से प्रमाणित हो रही है। संदेह है कि इतनी कालिख क्या स्वच्छता अभियान साफ कर पाएगा।
हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं। जो दिलवाले हैं वे ही काले-काले नजर आते हैं। हे ढोंगी बाबाजी! अब सब साफ हो गया है कि आपकी पूरी दाल काली थी। काली दाल खाकर सब कुछ काला हो गया। यहां तक कि गांठ का धन भी काला हो गया। नोटबंदी के बाद काले और सफेद धन में ऐसी कुश्ती हुई कि देश की जनता मूर्ख बनी। अगली-पिछले सारी बातें भूल गए। किसने क्या कहा और कब कहा? हमने जान लिया कि हिसाब रख कर परेशान होने में लाभ नहीं है। आज लाठी आपके पास है तो भैंस आपकी है, कल को अगर यही लाठी हमारे हाथ आ जाएगी तो फिर भैंस भी हमारी ही होगी। दुनिया इसी का नाम है, यहां तो चला चली का खेला है। कभी धूप तो कभी छांव। कहते हैं काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती पर जानता का मन भी अजीब है। वह खुद की तुलना में देश का लाभ अधिक देखती है।
देश को लाभ हो तो जनता को लाभ हो। कहते हैं कि देश में नोटबंदी के बाद करदाताओं की संख्या में विरोधाभास है। जो ऐसा कहते हैं वे देश के विकास को रोकना चाहते हैं। माना यह सच्चाई है- आंकड़ों को अलग-अलग श्रोत, एक जैसा नहीं दे पा रहे हैं। हमें इन चक्करों में उलझना नहीं चाहिए। हमारे लिए बस इतना जानना काफी है कि नए व्यक्तिगत करदाताओं की संख्या में अधिक इज़ाफा हुआ है। अब प्रधानमंत्रीजी ने कितना बताया और वित्तमंत्रीजी ने क्या कहा को छोड़ देना चाहिए। हमें इस बात में सुख की अनुभूति करनी चाहिए कि देश में आयकर रिटर्न भरने वालों की संख्या भारी मात्रा में बढ़ गई है। देखिए अधिक कर आएगा तो विकास भी अधिक होगा। इसमें हमारा लाभ ही लाभ होगा।
पंच काका का सुझाव है- देश को सदा-सदा के लिए आंकड़ों के जाल से मुक्त करने के लिए ‘सदा असत्य बोलो अधिनियम’ बनाया जाना चाहिए। जिसके अंतर्गत सब को यह छूट दी जानी चाहिए कि आगे कहीं किसी प्रसंग में आंकड़ों की बात होगी तो आंकड़ा लिखा ही नहीं जाए। बस उस आंकड़े की जगह डेस-डेस-डेस लिख दिए जाएगा। ये तीन डेस देकर देश की जनता को छूट होगी कि वे अपनी मर्जी से आंकड़ा भरे। यह देश हम सब का है। इसके विकास को हम सब बताएंगे। लोकतंत्र सबका है इसलिए विकास को सभी देखें। यह ठीक रहेगा कि सब अपने-अपने हिसाब से आंकड़े भरें। सारी जिम्मेदारी और जबाबदेही मंत्रियों पर क्यों हो? ऐसा करने से फायदा ही फायदा होगा और कोई किसी को यह नहीं सकेगा कि सर आंकड़ों में फर्क है। अगर इसके बाद भी कोई कहता है तो कह सकते हैं कि भैया तेरे डेस-डेस-डेस में तू अपने हिसाब से सही आंकड़ा भर कर चुप बैठ।
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