० डॉ. नीरज दइया
व्यंग्य विधा के परिदृश्य में राजस्थान के जिन गिने-चुने व्यंग्यकारों ने राष्ट्रीय फलक पर अपनी पहचान बनाई है उनमें एक अग्रणी और वरेण्य रचनाकार बुलाकी शर्मा है। उनके अब तक हिंदी में चार- ‘दुर्घटना के इर्द-गिर्द’, ‘रफूगिरी का मौसाम’, ‘चेखव की बंदूक’, ‘आप तो बस आप ही हैं’ और राजस्थानी भाषा में दो व्यंग्य संग्रह- ‘कवि कविता अर घरआळी’, ‘इज्जत में इजाफो’ प्रकाशित हो चुके हैं। वे अनेक व्यंग्य संग्रहों में संकलित व्यंग्यकार के रूप में शामिल रहे हैं साथ ही अनेक समाचार पत्रों में भी नियमित रूप से व्यंग्य लिख रहे हैं। उनके व्यंग्य लेखक की संपूर्ण छवि से हम भले परिचित नहीं हो सकें किंतु चार हिंदी व्यंग्य संग्रहों के माध्यम से उनके एवं समकालीन व्यंग्य के उतार-चढ़ाव देखे-समझे जा सकते हैं। उनकी यह यात्रा एक नवोदित व्यंग्यगार से वरिष्ठ व्यंग्यकार के विविध आयामों से भरी है। व्यंग्य लेखन पर पुरस्कारों की बात करें तो बुलाकी शर्मा सौभाग्यशाली रहे हैं कि उनके पहले ही व्यंग्य संग्रह ‘दुर्घटना के इर्द-गिर्द’ को राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा वर्ष 1998-99 का कन्हैयालाल सहल पुरस्कार अर्पित किया गया। वे व्यंग्यकार के रूप में अनेक बार अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित हो चुके हैं।
बुलाकी शर्मा की व्यंग्य लेखन यात्रा की चर्चा उनके एक एक व्यंग्य संग्रहों की चर्चा करते हुए की जा सकती है। ऐसे में हमें उनके उत्तरोत्तर विकास के विविध सौपान भी दिखाई देंगे और उनके मूल सरोकारों के विषय में भी सोचा जा सकेगा। कहना होगा कि उनके व्यंग्य लेखन का आरंभ मध्यवर्गीय जीवन की आकांक्षाओं और विद्रूपताओं से हुआ। उनकी व्यंग्य रचनाओं में कथा-तत्वों के साथ घटनाओं में उनका ‘मैं’ पात्र आत्मकथात्मक भी प्रतीत होता है। ‘दुर्घटना के इर्द-गिर्द’ संग्रह के व्यंग्य ‘आम आदमी की खोज’ की आरंभिक पंक्तियां देखें- ‘और मैं एक दिन सारी लाज-शर्म खूंटी पर टांग कर उन नामी-गिरामी साहित्यकार के सामने हाजिर हो ही गया। बिना किसी औपचारिक भूमिका बांधे सीधा निवेदन किया- कोई रास्ता बताइये साब। रचनाएं दनादन वापिस आ रही है। अगर यही हाल रहा तो.....’ ‘तो’ के बाद मेरे द्वारा छोड़ी गहरी उदास उसांस उन्हें साफ, सैंट परसेंट अर्थालू लगी।’
यहां पात्र ‘मैं’ का प्रश्न नए साहित्यकारों, पाठकों और उससे भी अधिक बुद्धिजीवियों का है। साथ ही यहां नामी-गिरामी साहित्यकार की भूमिका भी चिंता का विषय है। यह देश-काल का अतिक्रमण है, वहीं निजता का अहसास भी है जो गहरी उदास उसांसें चत्रित करती है। । व्यंग्यकार जिस ‘तो’ के बाद की स्थितियों को छोड़ रहा है वहीं से गंभीर व्यंग्य का आगाज होता है। यहां जो रिक्त स्थान है वह महत्त्वपूर्ण है। अकथनीय को बहुविकल्पी बना कर रह जाता है उसे व्यंग्य में कहा गया है। इस व्यंग्य रचना का सच है कि हर कोई अपने आप को खास आदमी समझता है और असल में जो ऐसा खास आदमी है वही बुलाकी शर्मा की व्यंग्य रचनाओं का आम आदमी है। एक अन्य व्यंग्य ‘पहचान का संकट’ में उन्होंने एक साहित्यकार के समाचार-पत्रों में छपे फोटो को बेहद प्रभावी ढंग से व्यंजित किया है।
साहित्य और साहित्यकारों की दुनिया पर व्यंग्य लिखना यानी अपनी ही दुनिया पर चोट करना है। बुलाकी शर्मा के यहां उनकी ऐसी दुनिया के प्रति यह व्यवहार न केवल उनकी अपनी दुनिया वरन प्रकारांतर से पूरी दुनिया को बेदाग और सुंदर बनाने के सतत प्रयास हैं। उनका आत्मकेंद्रित पात्र ‘मैं’ इसी दुनिया का वासी है। वे निजी जीवन में रोजगार के सिलसिले में दफ्तर जाते हैं और दैनिक जीवन की विभिन्न क्रियाएं, गतिविधियां रचनाओं का आधार बनते हुए उन्हें नई दिशाएं देते हैं। उनके यहां अपने निजी जीवन और संसार की घटनाओं में निर्ममता का व्यवहार देखा जा सकता है। वे सामान्य प्रतीत होने वाली ऐसी असामान्य घटनाओं-स्थितियों का चयन कर हमें देखते-परखते और व्यंग्य को पकड़ लेने की दृष्टि देते हैं। यह हमारे देखे हुए और भोगे हुए यथार्थ में से चयनित दिखाने का उपक्रम ऐसा है कि अपने भाषिक और कहन अंदाज से उस यथार्थ को फिर फिर भोगने का विकल्प मिलता है।
बुलाकी शर्मा के अधिकाशः व्यंग्य छोटे-छोटे आकार के सपनों सरीखे हैं, उनमें जैसी स्थितियां हैं उसे वे हू-ब-हू प्रस्तुत करते हुए बदलाव का कोई विकल्प या सिद्धांत बताने की बजाय हमारे भीतर कुछ बदलने के लिए वे जमीन तैयार करते हैं और कुछ बीज सौंपते हैं। उनके व्यंग्य असल में उनका अपना प्रतिरोध है। उनके यहां लोक-व्यवहार अपनी व्यंजना में अनेक क्षेत्रों को समाहित करता हुआ विशद विमर्श की प्रेरणा देता है। अफसर की मां की शवयात्रा’ में हमारे बदलते और नित्य बदल रहे अंग्रेजियत रंग-ढंग को जबरदस्त तरीके से उठाते हैं। वे अपनी भाषा और अंदाज के कारण हमसे उफ्फ, आह और वाह जैसे भावों को जैसे जाग्रत करते हैं। आपका प्रतिक्रिया देना उन्हें पढ़ते हुए अनिवार्य हो जाता है। उनकी रचनाओं में हमारी भाषा, संस्कार और संस्कृति की गहरी उदास उसांसें हमें साफ-साफ सुनाई देती है। उदाहरण के लिए यह अंश देखें-
अर्थी तैयार हो जाने पर परंपरानुसार पंडितजी ने उनसे अपनी मां को जोर से आवाज लगाने को कहा।
उन्होंने चारों तरफ देखा। सभी के लिए वे ही आकर्षण का केंद्र बने हुए थे। वे थोड़ा झुके। उनके साथ-साथ तीन-चार उनके अधीनस्थ भी झुके। उन्होंने प्रथानुसार मां की अर्थी को कंधा लगाया और तुरंत उन अधीनस्थों ने अपने कंधों पर अर्थी उठाली। गंभीरता के साथ वे बोले- ‘मदर, ... ओ मदर।’
पंडितजी सुनकर चौंके, बोले- ‘अजी महाशय, शास्त्र सम्मत बोलिए। माजी, ओ माजी कहिए।’
वे ठहरे बड़े अफसर। अड़ गए अपनी बात पर। बोले- ‘हम जेंटिल लोग अपनी भाषा में मां को मदर बोलते हैं। बात तो वो ही है फिर परेशानी कैसी?’
(दुर्घटना के इर्द-गिर्द, पृष्ठ-43)
यहां अति तब होती है जब उनके अधीनस्थों द्वारा उकेरा जाता है- राम नेम.. इज ट्रुथ’ दूसरे जवाब देते हैं- ‘ट्रुथ गिव ...फ्रीडम ।’ तब ऐसा लगता है कि यह ऐसी फ्रीडम है जिससे हमारी आस्थाओं का राम नाम सत्य हो रहा है। बुलाकी शर्मा का यह और ऐसी अनेक व्यंग्य-रचनाएं हमें हमारे ऐसे सामाजिक सत्यों की आंतरिकता से परिचित कराती हैं। यह उनकी लेखनी का जादू है कि व्यंग्य पाठ के उपरांत जब भी किसी शव यात्रा में हम पहुंचेंगे तब हमारी स्मृति में उनका यह व्यंग्य निश्चय ही जाग्रत हो जाएगा।
उनके दूसरे व्यंग्य संग्रह ‘रफूगीरी का मौसम’ की अधिकांश रचनाओं में फिर से साहित्य समाज और लेखन से जुड़े उसी लोक का वर्णन है किंतु यहां आते आते एक विशेष भाव जुड़ जाता है वह है- बदलते समय में सर्वाधिक जिम्मेदारियों के अहसास का है। यहां तक पहुंचते हुए उनका लेखक तबका अपनी सामाजिक भूमिका और उत्तरदायित्त्व के लिए आत्मनिर्भर होता नजर आता है। विभिन्न मानवीय संबंधों पर लिखते हुए बुलाकी शर्मा अलग अलग चरित्रों को परत-दर-परत हमारे सामने खोलते हुए यहां सूक्ष्म से अधिक सूक्ष्म होते हुए उन स्थितियों को खुल कर कहने के स्थान पर संकेत करते हैं। बेशक प्रत्यक्ष में लेखकों का यह संसार है किंतु यह हमारे से जुड़ता हुआ व्यापक होता जाता है।
‘रफूगीरी का मौसम’ में एक ऐसा मौसम है जिस में हम अनेक मुखौटे पहनते हुए अपना असली चेहरा भूल चुके हैं। या फिर असली चेहरा इतना कटा-फटा और जीर्ण-शीर्ण हो चुका है कि हम बाहर से रंगीन दिखाई देते हुए भीतर एकदम बदरंग हो चुके हैं। बदरंग होना अथवा रंग विहीन होना एक दुख है जो अपने मूल रंगों को लुप्त होते हुए देख रहा है। ऐसे विकट समय और संकट में सहारा लेखक ही है। वही हमारे मूल स्वरूप की स्मृति लिए हुए जैसे हमारे मुखौटों को रफू कर सुधार रहा है। बुलाकी शर्मा अपने ‘मैं’ का मुखौटा पहने हुए अपनी इस कृति में जैसे हमें खुद के भीतर झांकते को प्रेरित और प्रोत्साहित करते हैं। युक्ति के रूप में कभी वे श्रोतारामजी को हमारे बीच लाते हैं तो कभी सुखलालजी को। इस प्रकार उनका केवल और केवल एक लक्ष्य नजर आता है कि दुनिया की सुंदरता दुर्घटना के इर्द-गिर्द रहते हुए निरंतर चोटिल होते हुए इतनी चोटग्रस्त ना हो जाए कि रफूगीरी की जद से बाहर हो जाए।
तीसरा और बहुचर्चित संकलन ‘चेखव की बंदूक’ के विषय में कवि कृष्ण कल्पित ने फेसबुक स्टेट्स में लिखा- ‘बुलाकी की बंदूक’। मेरा भी मानना है कि लगभग चालीस वर्षों की इस सतत व्यंग्य-साधना के साधक बुलाकी शर्मा की यह उदारता है कि अपने नाम के स्थान पर चेखक का नाम अटका दिया है। यह ब्रांड है जिसमें इक्यावन रचनाएं नवीन सफूर्ती के साथ चयनित की गई है। इन व्यंग्य रचनाओं में अनेक स्थलों पर कहानीपन का जायका चेखव का स्मरण करता है। इन रचनाओं में व्यंग्य का पैनापन, प्रस्तुति का चुटीलापन और भाषा का बांकपन सधा हुआ है, इसमें व्यंग्यकार की अधिक तटस्थता, निष्पक्षता और पारदर्शी दृष्टि को देख सकते हैं। कभी वे हंसाते-गुदगुदाते हैं तो कभी चपत भी जमा देते हैं। यहां तक पहुंचते पहुंचते शर्मा ने ऐसा व्यंग्य कौशल हासिल कर लिया है कि वे भीतर-ही-भीतर तिलमिलाने वाले व्यंग्य अधिक प्रखता से लिखने लगे हैं। यहां व्यष्टि से समष्टि की पहुंच अपनी व्यापकता से साथ देख सकते हैं।
ये रचनाएं अलग-अलग होते हुए भी जैसे किसी विशेष राग का सतत गीत है। जिसमें परस्पर समानता, समन्वय और सामंजस्य है। इनकी दुनिया में बेहद भोला और मासूस-सा सदाचारी जीव ‘मैं’ अभी भी विविध दृष्टिकोणों के साथ प्रयुक्त हुआ है। यह बेहद सहनशील है जो छोटे-बड़े आघात में निरंतर घायल होने के बाद भी अपनी मुस्कान को अक्षुण बनाए रखने की आदत से ग्रसित है। बड़ी खूबी यही है कि ‘मैं’ अपनी मुस्कान नहीं छोड़ता और दूषित मन को स्वच्छ करने का सक्रिय रहते हैं। यह अतिशयोक्ति नहीं होगी कहा जाए कि ‘चेखव की बंदूक’ कोरी किताब जैसी किताब नहीं, वरन हमारे समय का आइना है। इसमें हम सभी अपना-अपना चेहरा देख सकते हैं। शीर्षक-व्यंग्य ‘चेखव की बंदूक’ का अंश देखिए-
‘मैं कथा उस्ताद चेखव से नहीं वरन् उन्हें जब तब ‘कोट’ करते रहने वाले अपने स्थानीय साहित्यिक उस्ताद से आतंकित रहता हूं। चेखव ने जो लिखा, उस पर चलूं अथवा नहीं चलूं, इसका निर्णय करने के लिए मैं स्वतंत्र हूं, क्योंकि चेखव बाध्य करने को उपस्थित नहीं हैं। किंतु स्थानीय उस्ताद की उपस्थिति हर जगह-हर समय रहती है और उनकी यही उपस्थिति मुझे आतंकित बनाए रखती है। उनका आतंक मुझ पर इस कदर हावी है कि नई रचना लिखते समय भी मुझे उनकी उपस्थिति का अहसास बना रहता है।’
यहां भाषा की सहजता में उस्ताद की स्थानीयता पर जिस बल का प्रयोग हुआ है वह देखते ही बनता है। सूक्तवाक्य चेखव ने कहानी के लिए दिया तो उस वाक्य को सभी विधाओं पर लागू करने का द्वंद्व यहां है। हम अपनी आंखें खोलें और अपने भीतर के जमीर को जिंदा करें, यही व्यंग्यकार का उद्देश्य होता है। व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा के हमारे जमीर को न केवल मांजते हैं, वरन उसे संवारने-सजाने का स्वप्न भी सौंपते हैं।
हाल ही में प्रकाशित ‘आप तो बस आप ही हैं !’ व्यंग्य संग्रह में ‘आप’ के स्थान पर व्यंग्य विधा के अवदान को देखते हुए यदि यूं लिखा जाए ‘बुलाकी शर्मा तो बस बुलाकी शर्मा ही हैं!’ तो अधिक उपयुक्त होगा। किसी भी लेखक की मौलिकता उसकी निजता होती है। बुलाकी शर्मा के व्यंग्य में अन्य व्यंग्यकारों की छवि दिखाई नहीं देती, वे सभी से सर्वथा पृथक हैं। वे व्यंग्य विधा में इतने भीतर पहुंच चुके हैं कि लंबे समत तक हमें सालते रहने की क्षमता उनमें है।
‘आप तो बस आप ही हैं!’ शीर्षक व्यंग्य की बात करें। इस व्यंग्य में कुल तीन पात्र हैं। रविवार के दिन लेखक सुखलालजी के घर मिलने पहुंचता है तो तीसरा पात्र रामभरोसेजी वहां आता है। संवाद और मुलाकात की यह कहानी कब उधार लेने देने वालों के खेल में बदल जाती है हमें खबर भी नहीं होती है और वे अपने दो चरित्रों के माध्यम से खुद को घायल कर लेते हैं। उनका सुखलालजी और रामभरोसेजी के शब्दों से घायल होना तिलमिलाने वाला है। यहां लेखक की सहजता-सरलता और मौन भाषा पाठकों को बहुत कुछ कहते हुए सोचने को विवश कर देती है। छोटी सी कहानी के रूप में ऐसे अनेक व्यंग्य उन्होंने लिखे हैं जिन्हें प्रस्तुत करने का यही एक मात्र तरीका संभव है। उधार और झूठ पर लिखे गए अन्य व्यंग्य जहां लेखकीय ज्ञान से भरे हुए होते हैं वहीं यहां पाठक पर लेखक का भरोसा है कि वह मर्म को समझ लेगा। उन्हें अपने पाठक पर विश्वास है।
‘प्रतिरोध के कीटाणु’ व्यंग्य में वे अखबार में छपी एक खबर को आधार बनाते हुए हमें मध्यप्रदेश के स्थापना दिवस के कार्यक्रम और छिंदवाड़ा के सर्किट हाउस की सैर कराते हुए जनप्रतिनिधियों के असहिष्णु व्यवहार पर सोचने के लिए विवश कर देते हैं। व्यंग्य में उनकी शैली प्रत्यक्ष में अक्सर प्रतिपक्ष के पक्ष में होती है। वे हमारे पक्ष को इस प्रकार उभारते हैं कि खुद भी प्रतिपक्ष की पैरवी जैसी बातें करने लगते हैं। झूठ और गलत को सही और बराबर सिद्ध करने का उनका नजरिया हमें भीतर ही भीतर भड़काने वाला होता है। वे जैसे हमारे भीतर की चिंगानारी को ऐसा करते हुए बार बार हवा देते हैं कि हमारे भीतर आग जल उठे। यहां दुष्यंत को याद करें- ‘मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।’ व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा के सीने में व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियों को लेकर जबरदस्त आग है और वे ऐसा व्यंग्य प्रस्तुत करते हैं कि पाठक के सीने में आग जलने लगती है। उनके व्यंग्य हमारी चेतना को झकझोरने वाले हैं।
कोई व्यंग्यकार अपने व्यक्तिगत प्रसंगों और अनेक प्रकरणों से भी प्रेरणा पाता है और अपने भीतर की आग को व्यंग्य में व्यंजित करता है। उसके सुख-दुख, आशा-निराशा अथवा अवसाद की घटनाओं पर व्यंग्य विधा विरेचन का कार्य करती है। व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा व्यंग्य में जब खुद को गिराने लगते हैं तो उनका अंत नहीं होता जब तक पाठक अपने भीतर ही भीतर यह कबूल ना कर लें कि कहा तो ठीक ही जा रहा है। ऐसा होता है और मैं भी कुछ कुछ या पूरा अथवा इससे अधिक ऐसा ही हूं।
उनके अनेक व्यंग्य अपने शहर बीकानेर के स्थानीय वातावरण से जुड़े हैं और ऐसा होने के बाद भी वे किसी भी शहर के हो सकते हैं। बुलाकी शर्मा की रेंज में घर के आंगन में धीमे-धीमे वार्तालाप करती पुत्रवधू चेतना से लेकर इंडोनेशिया की मोहतरमा बीना लिया तक है। इस बीच अनेक पड़ाव और मुकाम हैं। अनेक दिशाएं और अनेक देश हैं जहां से वे व्यंग्य के सूत्र बटोर लाते हैं।
अंत में बुलाकी शर्मा के राजस्थानी भाषा में व्यंग्य अवदान पर भी संक्षेप में चर्चा होनी चाहिए। राजस्थानी के प्रख्यात लेखक विजयदान देथा का कथन था कि बुलाकी शर्मा राजस्थानी के परसाई हैं। यह अभिधा की टिप्पणी है अथवा व्यंजना में कहा गया था? क्या केवल दो राजस्थानी व्यंग्य संग्रह- ‘कवि, कविता अर घरआळी’ और ‘इज्जत में इजाफो’ के आधार पर उन्हें परसाई कहना मानना उचित है? क्या यह अतिशयोक्ति जैसा नहीं लगता? यह अतिशयोक्ति नहीं है क्योंकि राजस्थानी में व्यंग्य को विधा के रूप में स्थापित करने वालों में बुलाकी शर्मा का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। यह कथन उनके संख्यात्मक अवदान को लेकर नहीं वरन व्यंग्य विधा में निष्ठापूर्वक सतत कार्य को देखते हुए विजयदान देथा ‘बिज्जी’ ने कहा होगा। यहां मैं अपने हवाले भी कह रहा हूं कि वे राजस्थानी व्यंग्य विधा के परसाई हैं।
बुलाकी शर्मा ने व्यंग्य विधा में शिल्प और भाषा के स्तर पर अनेक प्रयोग किए हैं। उन्होंने परंपरा को शक्ति के रूप में स्वीकार करते हुए आधुनिकता को विकसित किया। वे पाठक के पक्ष और विपक्ष दोनों खेमों में खड़े होने से गुरेज नहीं करते। समय की धारा के साथ चलने वाले व्यंग्यकार शर्मा की स्थिति सदा समान एकरेखिय अथवा पूर्वनिर्धारित नहीं रही। वे बचपन से लेकर बुढापे तक में विनोद और विसंगतियों को ढूंढ़ लेने में माहिर हैं। व्यंग्यकार के रूप में बुलाकी शर्मा के व्यंग्य में अनुभवों का आकर्षण भाषा और शिल्प में देखा जा सकता है। शब्द शक्तियों का जादू इस रूप में साकार होता है कि वे अपने पाठ में कब अभिधा से लक्षणा और व्यंजना शब्द शक्ति का कमाल दिखाने लगते हैं पता ही नहीं चलता। ऐसे में विसंगतियों के प्रति संवेदनशीलता करुणा के रूप में हमारे भीतर प्रवाहित होती है।
बुलाकी शर्मा समकालीन लेखकों जिसमें वे स्वयं भी शामिल है, की प्रवृत्तियों को जिस मुलायम मुलायम जायकेदार भाषा में उधेडऩा आरंभ करते हैं वह उनका कौशल है। किसी व्यंग्य लेखक की सबसे बड़ी सफलता यही मानी जा सकती है कि पाठक उसकी रचनाओं का इंतजार करे और पढ़ी हुई रचनाएं भी फिर फिर पाठ को आमंत्रित करती रहे। शर्मा ऐसे ही व्यंग्यकार है जिनके कॉलम का पाठकों को इंतजार रहता है। पाठकों के बीच उनकी किताबों की मांग भी बहुत है। वे अपनी सुदीर्घ यात्रा एवं व्यंग्य विधा के अवदान से वरिष्ठ व्यंग्यकारों की श्रेणी में शामिल हो चुके हैं।
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व्यंग्य विधा के परिदृश्य में राजस्थान के जिन गिने-चुने व्यंग्यकारों ने राष्ट्रीय फलक पर अपनी पहचान बनाई है उनमें एक अग्रणी और वरेण्य रचनाकार बुलाकी शर्मा है। उनके अब तक हिंदी में चार- ‘दुर्घटना के इर्द-गिर्द’, ‘रफूगिरी का मौसाम’, ‘चेखव की बंदूक’, ‘आप तो बस आप ही हैं’ और राजस्थानी भाषा में दो व्यंग्य संग्रह- ‘कवि कविता अर घरआळी’, ‘इज्जत में इजाफो’ प्रकाशित हो चुके हैं। वे अनेक व्यंग्य संग्रहों में संकलित व्यंग्यकार के रूप में शामिल रहे हैं साथ ही अनेक समाचार पत्रों में भी नियमित रूप से व्यंग्य लिख रहे हैं। उनके व्यंग्य लेखक की संपूर्ण छवि से हम भले परिचित नहीं हो सकें किंतु चार हिंदी व्यंग्य संग्रहों के माध्यम से उनके एवं समकालीन व्यंग्य के उतार-चढ़ाव देखे-समझे जा सकते हैं। उनकी यह यात्रा एक नवोदित व्यंग्यगार से वरिष्ठ व्यंग्यकार के विविध आयामों से भरी है। व्यंग्य लेखन पर पुरस्कारों की बात करें तो बुलाकी शर्मा सौभाग्यशाली रहे हैं कि उनके पहले ही व्यंग्य संग्रह ‘दुर्घटना के इर्द-गिर्द’ को राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा वर्ष 1998-99 का कन्हैयालाल सहल पुरस्कार अर्पित किया गया। वे व्यंग्यकार के रूप में अनेक बार अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित हो चुके हैं।
बुलाकी शर्मा की व्यंग्य लेखन यात्रा की चर्चा उनके एक एक व्यंग्य संग्रहों की चर्चा करते हुए की जा सकती है। ऐसे में हमें उनके उत्तरोत्तर विकास के विविध सौपान भी दिखाई देंगे और उनके मूल सरोकारों के विषय में भी सोचा जा सकेगा। कहना होगा कि उनके व्यंग्य लेखन का आरंभ मध्यवर्गीय जीवन की आकांक्षाओं और विद्रूपताओं से हुआ। उनकी व्यंग्य रचनाओं में कथा-तत्वों के साथ घटनाओं में उनका ‘मैं’ पात्र आत्मकथात्मक भी प्रतीत होता है। ‘दुर्घटना के इर्द-गिर्द’ संग्रह के व्यंग्य ‘आम आदमी की खोज’ की आरंभिक पंक्तियां देखें- ‘और मैं एक दिन सारी लाज-शर्म खूंटी पर टांग कर उन नामी-गिरामी साहित्यकार के सामने हाजिर हो ही गया। बिना किसी औपचारिक भूमिका बांधे सीधा निवेदन किया- कोई रास्ता बताइये साब। रचनाएं दनादन वापिस आ रही है। अगर यही हाल रहा तो.....’ ‘तो’ के बाद मेरे द्वारा छोड़ी गहरी उदास उसांस उन्हें साफ, सैंट परसेंट अर्थालू लगी।’यहां पात्र ‘मैं’ का प्रश्न नए साहित्यकारों, पाठकों और उससे भी अधिक बुद्धिजीवियों का है। साथ ही यहां नामी-गिरामी साहित्यकार की भूमिका भी चिंता का विषय है। यह देश-काल का अतिक्रमण है, वहीं निजता का अहसास भी है जो गहरी उदास उसांसें चत्रित करती है। । व्यंग्यकार जिस ‘तो’ के बाद की स्थितियों को छोड़ रहा है वहीं से गंभीर व्यंग्य का आगाज होता है। यहां जो रिक्त स्थान है वह महत्त्वपूर्ण है। अकथनीय को बहुविकल्पी बना कर रह जाता है उसे व्यंग्य में कहा गया है। इस व्यंग्य रचना का सच है कि हर कोई अपने आप को खास आदमी समझता है और असल में जो ऐसा खास आदमी है वही बुलाकी शर्मा की व्यंग्य रचनाओं का आम आदमी है। एक अन्य व्यंग्य ‘पहचान का संकट’ में उन्होंने एक साहित्यकार के समाचार-पत्रों में छपे फोटो को बेहद प्रभावी ढंग से व्यंजित किया है।
साहित्य और साहित्यकारों की दुनिया पर व्यंग्य लिखना यानी अपनी ही दुनिया पर चोट करना है। बुलाकी शर्मा के यहां उनकी ऐसी दुनिया के प्रति यह व्यवहार न केवल उनकी अपनी दुनिया वरन प्रकारांतर से पूरी दुनिया को बेदाग और सुंदर बनाने के सतत प्रयास हैं। उनका आत्मकेंद्रित पात्र ‘मैं’ इसी दुनिया का वासी है। वे निजी जीवन में रोजगार के सिलसिले में दफ्तर जाते हैं और दैनिक जीवन की विभिन्न क्रियाएं, गतिविधियां रचनाओं का आधार बनते हुए उन्हें नई दिशाएं देते हैं। उनके यहां अपने निजी जीवन और संसार की घटनाओं में निर्ममता का व्यवहार देखा जा सकता है। वे सामान्य प्रतीत होने वाली ऐसी असामान्य घटनाओं-स्थितियों का चयन कर हमें देखते-परखते और व्यंग्य को पकड़ लेने की दृष्टि देते हैं। यह हमारे देखे हुए और भोगे हुए यथार्थ में से चयनित दिखाने का उपक्रम ऐसा है कि अपने भाषिक और कहन अंदाज से उस यथार्थ को फिर फिर भोगने का विकल्प मिलता है।
बुलाकी शर्मा के अधिकाशः व्यंग्य छोटे-छोटे आकार के सपनों सरीखे हैं, उनमें जैसी स्थितियां हैं उसे वे हू-ब-हू प्रस्तुत करते हुए बदलाव का कोई विकल्प या सिद्धांत बताने की बजाय हमारे भीतर कुछ बदलने के लिए वे जमीन तैयार करते हैं और कुछ बीज सौंपते हैं। उनके व्यंग्य असल में उनका अपना प्रतिरोध है। उनके यहां लोक-व्यवहार अपनी व्यंजना में अनेक क्षेत्रों को समाहित करता हुआ विशद विमर्श की प्रेरणा देता है। अफसर की मां की शवयात्रा’ में हमारे बदलते और नित्य बदल रहे अंग्रेजियत रंग-ढंग को जबरदस्त तरीके से उठाते हैं। वे अपनी भाषा और अंदाज के कारण हमसे उफ्फ, आह और वाह जैसे भावों को जैसे जाग्रत करते हैं। आपका प्रतिक्रिया देना उन्हें पढ़ते हुए अनिवार्य हो जाता है। उनकी रचनाओं में हमारी भाषा, संस्कार और संस्कृति की गहरी उदास उसांसें हमें साफ-साफ सुनाई देती है। उदाहरण के लिए यह अंश देखें-
अर्थी तैयार हो जाने पर परंपरानुसार पंडितजी ने उनसे अपनी मां को जोर से आवाज लगाने को कहा।
उन्होंने चारों तरफ देखा। सभी के लिए वे ही आकर्षण का केंद्र बने हुए थे। वे थोड़ा झुके। उनके साथ-साथ तीन-चार उनके अधीनस्थ भी झुके। उन्होंने प्रथानुसार मां की अर्थी को कंधा लगाया और तुरंत उन अधीनस्थों ने अपने कंधों पर अर्थी उठाली। गंभीरता के साथ वे बोले- ‘मदर, ... ओ मदर।’
पंडितजी सुनकर चौंके, बोले- ‘अजी महाशय, शास्त्र सम्मत बोलिए। माजी, ओ माजी कहिए।’
वे ठहरे बड़े अफसर। अड़ गए अपनी बात पर। बोले- ‘हम जेंटिल लोग अपनी भाषा में मां को मदर बोलते हैं। बात तो वो ही है फिर परेशानी कैसी?’
(दुर्घटना के इर्द-गिर्द, पृष्ठ-43)
यहां अति तब होती है जब उनके अधीनस्थों द्वारा उकेरा जाता है- राम नेम.. इज ट्रुथ’ दूसरे जवाब देते हैं- ‘ट्रुथ गिव ...फ्रीडम ।’ तब ऐसा लगता है कि यह ऐसी फ्रीडम है जिससे हमारी आस्थाओं का राम नाम सत्य हो रहा है। बुलाकी शर्मा का यह और ऐसी अनेक व्यंग्य-रचनाएं हमें हमारे ऐसे सामाजिक सत्यों की आंतरिकता से परिचित कराती हैं। यह उनकी लेखनी का जादू है कि व्यंग्य पाठ के उपरांत जब भी किसी शव यात्रा में हम पहुंचेंगे तब हमारी स्मृति में उनका यह व्यंग्य निश्चय ही जाग्रत हो जाएगा।
उनके दूसरे व्यंग्य संग्रह ‘रफूगीरी का मौसम’ की अधिकांश रचनाओं में फिर से साहित्य समाज और लेखन से जुड़े उसी लोक का वर्णन है किंतु यहां आते आते एक विशेष भाव जुड़ जाता है वह है- बदलते समय में सर्वाधिक जिम्मेदारियों के अहसास का है। यहां तक पहुंचते हुए उनका लेखक तबका अपनी सामाजिक भूमिका और उत्तरदायित्त्व के लिए आत्मनिर्भर होता नजर आता है। विभिन्न मानवीय संबंधों पर लिखते हुए बुलाकी शर्मा अलग अलग चरित्रों को परत-दर-परत हमारे सामने खोलते हुए यहां सूक्ष्म से अधिक सूक्ष्म होते हुए उन स्थितियों को खुल कर कहने के स्थान पर संकेत करते हैं। बेशक प्रत्यक्ष में लेखकों का यह संसार है किंतु यह हमारे से जुड़ता हुआ व्यापक होता जाता है।
‘रफूगीरी का मौसम’ में एक ऐसा मौसम है जिस में हम अनेक मुखौटे पहनते हुए अपना असली चेहरा भूल चुके हैं। या फिर असली चेहरा इतना कटा-फटा और जीर्ण-शीर्ण हो चुका है कि हम बाहर से रंगीन दिखाई देते हुए भीतर एकदम बदरंग हो चुके हैं। बदरंग होना अथवा रंग विहीन होना एक दुख है जो अपने मूल रंगों को लुप्त होते हुए देख रहा है। ऐसे विकट समय और संकट में सहारा लेखक ही है। वही हमारे मूल स्वरूप की स्मृति लिए हुए जैसे हमारे मुखौटों को रफू कर सुधार रहा है। बुलाकी शर्मा अपने ‘मैं’ का मुखौटा पहने हुए अपनी इस कृति में जैसे हमें खुद के भीतर झांकते को प्रेरित और प्रोत्साहित करते हैं। युक्ति के रूप में कभी वे श्रोतारामजी को हमारे बीच लाते हैं तो कभी सुखलालजी को। इस प्रकार उनका केवल और केवल एक लक्ष्य नजर आता है कि दुनिया की सुंदरता दुर्घटना के इर्द-गिर्द रहते हुए निरंतर चोटिल होते हुए इतनी चोटग्रस्त ना हो जाए कि रफूगीरी की जद से बाहर हो जाए।
तीसरा और बहुचर्चित संकलन ‘चेखव की बंदूक’ के विषय में कवि कृष्ण कल्पित ने फेसबुक स्टेट्स में लिखा- ‘बुलाकी की बंदूक’। मेरा भी मानना है कि लगभग चालीस वर्षों की इस सतत व्यंग्य-साधना के साधक बुलाकी शर्मा की यह उदारता है कि अपने नाम के स्थान पर चेखक का नाम अटका दिया है। यह ब्रांड है जिसमें इक्यावन रचनाएं नवीन सफूर्ती के साथ चयनित की गई है। इन व्यंग्य रचनाओं में अनेक स्थलों पर कहानीपन का जायका चेखव का स्मरण करता है। इन रचनाओं में व्यंग्य का पैनापन, प्रस्तुति का चुटीलापन और भाषा का बांकपन सधा हुआ है, इसमें व्यंग्यकार की अधिक तटस्थता, निष्पक्षता और पारदर्शी दृष्टि को देख सकते हैं। कभी वे हंसाते-गुदगुदाते हैं तो कभी चपत भी जमा देते हैं। यहां तक पहुंचते पहुंचते शर्मा ने ऐसा व्यंग्य कौशल हासिल कर लिया है कि वे भीतर-ही-भीतर तिलमिलाने वाले व्यंग्य अधिक प्रखता से लिखने लगे हैं। यहां व्यष्टि से समष्टि की पहुंच अपनी व्यापकता से साथ देख सकते हैं।
ये रचनाएं अलग-अलग होते हुए भी जैसे किसी विशेष राग का सतत गीत है। जिसमें परस्पर समानता, समन्वय और सामंजस्य है। इनकी दुनिया में बेहद भोला और मासूस-सा सदाचारी जीव ‘मैं’ अभी भी विविध दृष्टिकोणों के साथ प्रयुक्त हुआ है। यह बेहद सहनशील है जो छोटे-बड़े आघात में निरंतर घायल होने के बाद भी अपनी मुस्कान को अक्षुण बनाए रखने की आदत से ग्रसित है। बड़ी खूबी यही है कि ‘मैं’ अपनी मुस्कान नहीं छोड़ता और दूषित मन को स्वच्छ करने का सक्रिय रहते हैं। यह अतिशयोक्ति नहीं होगी कहा जाए कि ‘चेखव की बंदूक’ कोरी किताब जैसी किताब नहीं, वरन हमारे समय का आइना है। इसमें हम सभी अपना-अपना चेहरा देख सकते हैं। शीर्षक-व्यंग्य ‘चेखव की बंदूक’ का अंश देखिए-
‘मैं कथा उस्ताद चेखव से नहीं वरन् उन्हें जब तब ‘कोट’ करते रहने वाले अपने स्थानीय साहित्यिक उस्ताद से आतंकित रहता हूं। चेखव ने जो लिखा, उस पर चलूं अथवा नहीं चलूं, इसका निर्णय करने के लिए मैं स्वतंत्र हूं, क्योंकि चेखव बाध्य करने को उपस्थित नहीं हैं। किंतु स्थानीय उस्ताद की उपस्थिति हर जगह-हर समय रहती है और उनकी यही उपस्थिति मुझे आतंकित बनाए रखती है। उनका आतंक मुझ पर इस कदर हावी है कि नई रचना लिखते समय भी मुझे उनकी उपस्थिति का अहसास बना रहता है।’
यहां भाषा की सहजता में उस्ताद की स्थानीयता पर जिस बल का प्रयोग हुआ है वह देखते ही बनता है। सूक्तवाक्य चेखव ने कहानी के लिए दिया तो उस वाक्य को सभी विधाओं पर लागू करने का द्वंद्व यहां है। हम अपनी आंखें खोलें और अपने भीतर के जमीर को जिंदा करें, यही व्यंग्यकार का उद्देश्य होता है। व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा के हमारे जमीर को न केवल मांजते हैं, वरन उसे संवारने-सजाने का स्वप्न भी सौंपते हैं।
हाल ही में प्रकाशित ‘आप तो बस आप ही हैं !’ व्यंग्य संग्रह में ‘आप’ के स्थान पर व्यंग्य विधा के अवदान को देखते हुए यदि यूं लिखा जाए ‘बुलाकी शर्मा तो बस बुलाकी शर्मा ही हैं!’ तो अधिक उपयुक्त होगा। किसी भी लेखक की मौलिकता उसकी निजता होती है। बुलाकी शर्मा के व्यंग्य में अन्य व्यंग्यकारों की छवि दिखाई नहीं देती, वे सभी से सर्वथा पृथक हैं। वे व्यंग्य विधा में इतने भीतर पहुंच चुके हैं कि लंबे समत तक हमें सालते रहने की क्षमता उनमें है।
‘आप तो बस आप ही हैं!’ शीर्षक व्यंग्य की बात करें। इस व्यंग्य में कुल तीन पात्र हैं। रविवार के दिन लेखक सुखलालजी के घर मिलने पहुंचता है तो तीसरा पात्र रामभरोसेजी वहां आता है। संवाद और मुलाकात की यह कहानी कब उधार लेने देने वालों के खेल में बदल जाती है हमें खबर भी नहीं होती है और वे अपने दो चरित्रों के माध्यम से खुद को घायल कर लेते हैं। उनका सुखलालजी और रामभरोसेजी के शब्दों से घायल होना तिलमिलाने वाला है। यहां लेखक की सहजता-सरलता और मौन भाषा पाठकों को बहुत कुछ कहते हुए सोचने को विवश कर देती है। छोटी सी कहानी के रूप में ऐसे अनेक व्यंग्य उन्होंने लिखे हैं जिन्हें प्रस्तुत करने का यही एक मात्र तरीका संभव है। उधार और झूठ पर लिखे गए अन्य व्यंग्य जहां लेखकीय ज्ञान से भरे हुए होते हैं वहीं यहां पाठक पर लेखक का भरोसा है कि वह मर्म को समझ लेगा। उन्हें अपने पाठक पर विश्वास है।
‘प्रतिरोध के कीटाणु’ व्यंग्य में वे अखबार में छपी एक खबर को आधार बनाते हुए हमें मध्यप्रदेश के स्थापना दिवस के कार्यक्रम और छिंदवाड़ा के सर्किट हाउस की सैर कराते हुए जनप्रतिनिधियों के असहिष्णु व्यवहार पर सोचने के लिए विवश कर देते हैं। व्यंग्य में उनकी शैली प्रत्यक्ष में अक्सर प्रतिपक्ष के पक्ष में होती है। वे हमारे पक्ष को इस प्रकार उभारते हैं कि खुद भी प्रतिपक्ष की पैरवी जैसी बातें करने लगते हैं। झूठ और गलत को सही और बराबर सिद्ध करने का उनका नजरिया हमें भीतर ही भीतर भड़काने वाला होता है। वे जैसे हमारे भीतर की चिंगानारी को ऐसा करते हुए बार बार हवा देते हैं कि हमारे भीतर आग जल उठे। यहां दुष्यंत को याद करें- ‘मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।’ व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा के सीने में व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियों को लेकर जबरदस्त आग है और वे ऐसा व्यंग्य प्रस्तुत करते हैं कि पाठक के सीने में आग जलने लगती है। उनके व्यंग्य हमारी चेतना को झकझोरने वाले हैं।
कोई व्यंग्यकार अपने व्यक्तिगत प्रसंगों और अनेक प्रकरणों से भी प्रेरणा पाता है और अपने भीतर की आग को व्यंग्य में व्यंजित करता है। उसके सुख-दुख, आशा-निराशा अथवा अवसाद की घटनाओं पर व्यंग्य विधा विरेचन का कार्य करती है। व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा व्यंग्य में जब खुद को गिराने लगते हैं तो उनका अंत नहीं होता जब तक पाठक अपने भीतर ही भीतर यह कबूल ना कर लें कि कहा तो ठीक ही जा रहा है। ऐसा होता है और मैं भी कुछ कुछ या पूरा अथवा इससे अधिक ऐसा ही हूं।
उनके अनेक व्यंग्य अपने शहर बीकानेर के स्थानीय वातावरण से जुड़े हैं और ऐसा होने के बाद भी वे किसी भी शहर के हो सकते हैं। बुलाकी शर्मा की रेंज में घर के आंगन में धीमे-धीमे वार्तालाप करती पुत्रवधू चेतना से लेकर इंडोनेशिया की मोहतरमा बीना लिया तक है। इस बीच अनेक पड़ाव और मुकाम हैं। अनेक दिशाएं और अनेक देश हैं जहां से वे व्यंग्य के सूत्र बटोर लाते हैं।
अंत में बुलाकी शर्मा के राजस्थानी भाषा में व्यंग्य अवदान पर भी संक्षेप में चर्चा होनी चाहिए। राजस्थानी के प्रख्यात लेखक विजयदान देथा का कथन था कि बुलाकी शर्मा राजस्थानी के परसाई हैं। यह अभिधा की टिप्पणी है अथवा व्यंजना में कहा गया था? क्या केवल दो राजस्थानी व्यंग्य संग्रह- ‘कवि, कविता अर घरआळी’ और ‘इज्जत में इजाफो’ के आधार पर उन्हें परसाई कहना मानना उचित है? क्या यह अतिशयोक्ति जैसा नहीं लगता? यह अतिशयोक्ति नहीं है क्योंकि राजस्थानी में व्यंग्य को विधा के रूप में स्थापित करने वालों में बुलाकी शर्मा का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। यह कथन उनके संख्यात्मक अवदान को लेकर नहीं वरन व्यंग्य विधा में निष्ठापूर्वक सतत कार्य को देखते हुए विजयदान देथा ‘बिज्जी’ ने कहा होगा। यहां मैं अपने हवाले भी कह रहा हूं कि वे राजस्थानी व्यंग्य विधा के परसाई हैं।
बुलाकी शर्मा ने व्यंग्य विधा में शिल्प और भाषा के स्तर पर अनेक प्रयोग किए हैं। उन्होंने परंपरा को शक्ति के रूप में स्वीकार करते हुए आधुनिकता को विकसित किया। वे पाठक के पक्ष और विपक्ष दोनों खेमों में खड़े होने से गुरेज नहीं करते। समय की धारा के साथ चलने वाले व्यंग्यकार शर्मा की स्थिति सदा समान एकरेखिय अथवा पूर्वनिर्धारित नहीं रही। वे बचपन से लेकर बुढापे तक में विनोद और विसंगतियों को ढूंढ़ लेने में माहिर हैं। व्यंग्यकार के रूप में बुलाकी शर्मा के व्यंग्य में अनुभवों का आकर्षण भाषा और शिल्प में देखा जा सकता है। शब्द शक्तियों का जादू इस रूप में साकार होता है कि वे अपने पाठ में कब अभिधा से लक्षणा और व्यंजना शब्द शक्ति का कमाल दिखाने लगते हैं पता ही नहीं चलता। ऐसे में विसंगतियों के प्रति संवेदनशीलता करुणा के रूप में हमारे भीतर प्रवाहित होती है।
बुलाकी शर्मा समकालीन लेखकों जिसमें वे स्वयं भी शामिल है, की प्रवृत्तियों को जिस मुलायम मुलायम जायकेदार भाषा में उधेडऩा आरंभ करते हैं वह उनका कौशल है। किसी व्यंग्य लेखक की सबसे बड़ी सफलता यही मानी जा सकती है कि पाठक उसकी रचनाओं का इंतजार करे और पढ़ी हुई रचनाएं भी फिर फिर पाठ को आमंत्रित करती रहे। शर्मा ऐसे ही व्यंग्यकार है जिनके कॉलम का पाठकों को इंतजार रहता है। पाठकों के बीच उनकी किताबों की मांग भी बहुत है। वे अपनी सुदीर्घ यात्रा एवं व्यंग्य विधा के अवदान से वरिष्ठ व्यंग्यकारों की श्रेणी में शामिल हो चुके हैं।
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