10 सितंबर, 2017

बड़े लोगों की बड़ी बातें

   जो आसानी से समझ आ जाए, वह छोटी बात होती है। जो आसानी से समझ नहीं आए, वह बड़ी बात होती है। छोटी बात छोटे लोग करते हैं। बड़ी बात बड़े लोग। छोटे लोगों की छोटी-छोटी बातें करने वाले लेखक छोटे होते हैं और बड़े लोगों की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले लेखक बड़े। बड़ा लेखक और बड़े लोग कभी नहीं चाहते कि वे छोटे लोगों के समझ में आने लायक कोई छोटी बात करें, किंतु छोटे लेखक और छोटे लोग हमेशा इसी अभिलाषा में मरते हैं। वे चाहते हैं कि कुछ बड़ी बात हो जाए, वे भी बड़े लोगों की श्रेणी में पहुंच जाएं। उनका जीवन भी धन्य हो जाए। पर नहीं होता।
    मैं बहुत चाहता हूं कि कुछ ऐसी बात करूं जो आपके बिल्कुल समझ में नहीं आए। सिर के ऊपर से निकल जाए। आप उसे लेकर पहले तो खूब माथा-पच्ची करें कि कहीं कोई पेंच मिल जाए और बाद में उसे साझा करते हुए अपने दोस्तों को भी परेशान करें कि समझाओ इसका अर्थ। मैं छोटा वाक्य लिखता हूं और आप तक बात पहुंच जाती है। मैं बड़ा वाक्य लिखता हूं तब भी आप अर्थ समझ जाते हैं। मैं करूं क्या? ऐसा कैसे क्या लिखूं कि आप अटक जाएं, भटक जाएं। 
    वैसे गुणी जनों का मानना है कि कोई बड़ी और ना समझ में आने वाली बात हमें छोड़ देनी चाहिए। उसे समझने की जरूरत ही नहीं होनी चाहिए। जो बड़े हैं और जो बड़ी बातें है, उन्हें बिना समझे ही बड़ी बात मान कर उन्हें बड़ी बात बने रहने देना चाहिए। ऐसी बड़ी बातें लिखने वाले बड़े लेखकों की बड़ी-बड़ी किताबें बड़े-बड़े प्रकाशक प्रकाशित करते है। वे बिकते हैं। उनका नाम बिकता है। उन्होंने क्या और कैसा लिखा है? इसकी चिंता वे नहीं करते। जो बिकता है उसे समझने-समझाने की जरूरत ही क्या है? वे बाजार की नब्ज पहचानते हैं। उनके जुमले चलते हैं। उन्हें बाजार की गति और लय का पुराना अनुभव होता है। वे अपनी बड़ी बातों के लिए बाजार बनाना जानते हैं। उनके संस्थान और उनसे उपकृत संस्थानों में खेल चलता है। पैसों का खेल है और खेल सारा पैसों के लिए है। बाप बड़ा ना भैया सबसे बड़ा रुपया।
    बड़े लोग कभी नाक को सीधी पकड़ते हैं और कभी घुमा कर पकड़ते हैं। जब जरूरत होती है अपने नाक-कान सब पकड़ लेते हैं। इनके नाक का कमाल है कि उन्हें पहले से खुशबू आ जाती है कि नाक कटने वाली है। परिस्थियों को देखते हुए वे अपनी नाक लंबी कर लेते हैं और नाक कटा भी लेते हैं। नाक कट चुकने के बाद भी देखने में नाक की लंबाई पहले जितनी ही नजर आती है। वे कहते हैं कि देखो नाक तो सही सलामत है। उनके नाक लंबी करने और कट जाने पर भी सामान्य आकार के रहस्य को हर कोई जान नहीं सकता। यह रहस्य भी उनके अर्थ से परे होता है। अर्थ होता है तो भी दिखाई नहीं देता। उनकी ऐसी महिमा अपरमपार है।
    पंच काका कहते हैं कि बड़े लोग अर्थ लेना जानते हैं, देना जानते ही नहीं! बड़े लोग बड़े पदों पर रहे होते हैं। सबके लिए तीन शब्द शक्तिया होती हैं पर उनके लिए ऐसी चार। यह चौथी शब्द-शक्ति ही है जिसमें वे अर्थ को गायब कर चुके होते हैं। वे जीवन पर्यंत अनेक शक्तियों से तीन-पांच करते इतना निचोड़-निचोड़ कर अर्थ प्राप्त कर चुके होते हैं कि आम भी गायब और गुठलियां भी गायब। यानी अर्थ और रस सफाचट्ट !
० डॉ. नीरज दइया

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