18 सितंबर, 2017

हॉट सीट की हॉट कथा

नुमति है और अनुमति नहीं है के बीच बस एक ओब्लिक रहता है। अधिकारी की मर्जी है कि वह इन दोनों में से किसे चुने। कभी वह खुश कर देता है तो कभी दुखी कर देता है। हरे पेन की इंक बर्बाद करते हुए कुछ अधिकारी एक तरफ टिक लगाते हैं तो दूसरे विकल्प को पूरा काटना नहीं भूलते। माना छुट्टी किसी कर्मचारी का अधिकार नहीं है, फिर इसे आप अधिकार में लेते हुए आपनी इच्छा हो दिया करें। आपका मूड हुआ कि आज फलां कर्मचारी को छुट्टी देनी है, तो उसे पहले ही सूचित कर दिया जाना चाहिए कि आज तुम आराम करो। हो तो यह भी सकता है कि कर्मचारी दफ्तर आए और जैसे ही वह हाजरी रजिस्टर के हाथ लगाने के हो आप उसे कह दें- आज आपको छुट्टी दी जाती है।
हे अफसर देवता! छुट्टी देने अथवा नहीं देने का आपका फैसला सदा सुरक्षित है तो इसमें कर्मचारियों को भी हो-हल्ला नहीं करना चाहिए। यह कैसी लीला है कि अफसर देवता के ऊपर भी कोई दूसरा देवता या सरकार विरजमान है। यह तो जैसे को तैसा वाली बात हो गई। बिदाई संभाषण वाली तीसरी शक्ति अब भी सक्रिय है। सभी छोटे-बड़े सभी कर्मचारियों को अपने से ऊपर के अधिकारियों की अनुमति लेनी होती है। मैं तो अनुमति लेने का इतना आदि और अभ्यस्त हो गया हूं कि लघुशंका भी साहब को पूछ कर करता हूं। वे मना कर देते हैं तो इंतजार करता हूं, थोड़ी देर बाद फिर निवेदन करता हूं- साहब जोर की लगी है, आप का हुकम हो तो फारिग हो आऊं? ऐसे निवेदन पर साहब पसीजते हैं। वे मुस्कान के साथ पूरे दांत दिखाते हैं। उन्हें लगने लगता है कि सब से बड़ा साहब मैं ही हूं। मेरी भी इच्छा हुई कि कौन बनेगा करोड़पति कार्यक्रम में हिस्सा लूं, पर साहब ने रोक दिया और मैं रुक गया।
छत्तीसगढ़ का समाचार पढ़ कर मुझे बड़ा सुख मिला कि वहां की एक ट्रेनी डिप्टी कलक्टर अनुराधा अग्रवाल को 'कौन बनेगा करोड़पति' में भाग लेना की अनुमति नहीं है का पत्र देरी से मिला। यह तो अच्छा हुआ वे कार्यक्रम कर चुकी थी। कानून और अफसर दोनों को अंधा रहना चाहिए। संवेदनशीलता जाग्रत होने की जरा भी संभवना नहीं रखनी चाहिए। भले ही अनुराधा जी विकलांग हो और वॉकर के सहारे चलती हो। भले ही वे कार्यक्रम से जीती हुई रक़म से अपने भाई की किडनी का इलाज़ करना चाहती हो। वैसे यह उनके घर का निजी मामला है। और देखिए कार्यक्रम की शूटिंग के एक दिन पहले उनकी मां का निधन हो गया तो यह भी ईश्वर की मर्जी है, इसमें सरकार का कहां कोई दोष है। यह ईश्वर का संकेत था कि तुमको कार्यक्रम के लिए अनुमति नहीं मिलने वाली। पंगा होगा, रुक जाओ पर अमिताभ बच्चन के साथ हॉट सीट पर बैठना किसे अच्छा नहीं लगता। आप गई तो देखिए कितनी बातें हो गई ऊपर से लेकर नीचे तक।
पंच काका कहते हैं कि अमिताभ बच्चन के साथ हॉट सीट पर बड़े अफसर नहीं बैठ सके तो वे अपने से छोटे अधिकारियों को बैठने का भला अवसर क्यों देने लगे। नेताओं को मुद्दा मिलना चाहिए कि वे किस तरह किस को घेर सकते हैं। वैसे यह भी ठीक है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में शामिल होने की अनुमति प्रशासनिक अधिकारियों को बाकायदा अधिसूचना जारी कर दी जाती है और हॉट सीट को इतना हॉट कर दिया जाता है।
० डॉ. नीरज दइया
 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें