20 सितंबर, 2017

घूमाते रहें दिमाग

जार्ज बर्नार्ड शा ने कहा था कि जो अपना दिमाग नहीं बदल सकत वे कुछ भी नहीं बदल सकते। वे बड़े लेखक जरूर थे पर यह नहीं जानते थे कि इस पृथ्वी पर ऐसा समय आएगा जब दिमाग बदलना बाएं हाथ का खेल होगा। वे यह जानते भी होंगे तो उन्होंने निश्चित तौर पर यह तो सोचा नहीं होगा कि इक्कीसवी सदी में दिमाग बदल कर भी कुछ नहीं बदल सकेंगे। चुनाव में हम बहुत बार दिमाग बदलते हैं। फिर पता चलता है कि हम कुछ भी बदल नहीं पाए। अब देखिए ना हमारे कुछ मित्र कहते हैं- अच्छे दिन दिन आ गए। कुछ कहते हैं- नहीं आए। मित्रों के इस मतभेद को हल कौन करेगा?
सरकारी दावा है कि सब कुछ बदल गया है। देश तेजी से विकास कर रहा है। जब सब कुछ बदल गया है तो हमें दिखाई क्यों नहीं देता। क्या बदलाव से हमारे आंखें चुंधिया गई है कि हम कुछ देख नहीं पा रहे। जब हम रेलगाड़ी में बैठते हैं तो खिड़की से बाहर स्थिर पेड़ और जमीन भागती हुई दिखाई देती है। आंखें जो देखती है, मन जिसे महसूस करता है वह गलत कैसे हो सकता है। मरा यह दिमाग इस सत्य को स्वीकार क्यों नहीं करता। आंखों देखे सत्य को जो नकार रहे हैं वे विपक्ष के आदमी हैं। हमने देश को विकास की गाड़ी में रवाना कर दिया है और आप अपना पुराना-बासी दिमाग लिए चल रहे हैं। विकास की गाड़ी द्रुत गति से चला रही है। आप कहते हैं कि नहीं-नहीं कुछ नहीं बदला। आपको बस अपने वाला बदलाव और विकास दिखाई देता है। यह सारासर गलत है कि आप अपने विकास को विकास मानें और हमारे विकास को पप्पू। पप्पू तो अपा है कि सब कुछ आपको स्थिर और गर्त में जाता हुआ दिखाई दे रहा है।
हमारे माननीय और माननीय इतनी दौड़-भाग कर रहे हैं। उनकी गतिशीलता आपको निर्थक लगती है! अब समझ आ गया है कि आप राष्ट्रविरोधी हैं। सांप्रदायिक हैं। आतंकवादी है। राष्ट्रद्रोही है। ऐसे जितने भी जो कुछ हो सकते हैं, वे सब आप हैं। हम आप के कार्य-व्यवहार और हर बात-बात पर टांग खींचने की आदद से परेशान हो गए हैं। अब एक प्रस्ताव पारित होगा। देश में जिन जिन नागरिकों को बदलाव दिखाई नहीं दे रहा है उन्हें अनिवार्य रूप से अपने दिमाग के बारे में घोषणा-पत्र देना होगा। आप लिखकर देंगे कि आपने अपने दिमाग को बदला है अथवा अभी बदलना शेष है। यदि बदलना शेष है तो आप कब तक दिमाग बदल लेंगे। आपका खुद का दिमाग देश की प्रगति में बाधा है। आपको इक्कतीस दिसम्बर तक एक अंतिम अवसर दिया जाता है।
पंच काका कहते हैं कि हम सभी के पास दो दिमाग होते हैं। एक लेफ्ट और दूसरा राइट। यह सारा झगड़ा लेफ्ट-साइट का है। लेफ्ट वाला कहता है कि मैं सही हूं और राइट वाला कहता है मैं। दोनों मत एक नहीं है। जरूरत इस बात कि है अब हम सकारात्मक सोचें। स्थिर दिमाग अपनी स्थिरता के कारण अवरूद्ध हो जाता है। दिमाग को स्थिर रखना गलत है। दिमाग को स्थिर अथवा खाली नहीं रखें, उसे घुमाते रहें। आप खुद घूमते रहें और दिमाग भी घूमाते रहें। यही एक कारगर तरीका है जिससे कुछ बदल सकते हैं और कुछ बदला हुआ देख सकते हैं। यह भूल जाएं कि कोई आएगा और आपका दिमाग बदलेगा, यदि बदलाव चाहते हैं तो आपको अपना दिमाग बदलना होगा।
डॉ. नीरज दइया 

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