26 जून, 2017

राजस्थानी भाषा और उसका समकालीन साहित्य

डॉ. नीरज दइया
    भविष्यवक्ता भले आने वाले कल के बारे में सकारात्मक अथवा नकारात्मक बातें करते रहें। लोग उन्हें सच-झूठ मानते रहें। किंतु यह सत्य है कि भविष्य में जो भी घटित होता है, वह हमारे वर्तमान का परिणाम होता है। वैसे हमारा वर्तमान भी हमारे बीते कल का परिणाम है। हम भूतकाल से सबक सीखते हुए अपने वर्तमान को गढ़ते हुए भविष्य को संवरते हैं। राजस्थानी भाषा और समकालीन साहित्य के बारे में बात करते हुए हमें इतिहास के कई पन्ने पलटने होंगे। राजस्थानी भाषा और समकालीन साहित्य आज जिस मुकाम पर है उस पर चर्चा होनी चाहिए। साहित्य अकादेमी नई दिल्ली से राजस्थानी भाषा और साहित्य को साहित्यिक मान्यता वर्ष 1974 में प्रदान हो चुकी। आज राजस्थानी भाषा और साहित्य विषय के रूप में उच्च माध्यमिक और विश्वविद्यालय स्तर पर पढ़ाया जा रहा है। राजस्थानी साहित्य के विषय में पहले हिंदी माध्यम से शोध किए जाते थे अब राजस्थानी माध्यम भी स्वीकृत किया जा चुका।
    देश के सभी शिक्षाविद और ‘हिंद स्वराज’ भी नई तालीम बच्चों को उनकी मातृभाषा में दिए जाने पर बल देती है। ‘इंडियन ओपिनियन’ पत्रिका में 19-8-1910 अंक में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के प्रकाशित लेख ‘शिक्षा का माध्यम क्या हो?’ में लिखा गया है– ‘हम लोगों में बच्चों को अंग्रेज बनाने की प्रवृति पाई जाती है। मानो उन्हें शिक्षित करने का और साम्राज्य की सच्ची सेवा के योग्य बनाने का वही सबसे उत्तम तरीका है। हमारा ख्याल है कि समझदार से समझदार अंग्रेज भी यह नहीं चाहेगा कि हम अपनी राष्ट्रीय विशेषता, अर्थात परम्परागत प्राप्त शिक्षा और संस्कृति को छोड़ दें अथवा यह कि हम उनकी नकल किया करें। इसलिए जो अपनी मातृभाषा के प्रति चाहे वह कितनी ही साधारण क्यों न हो इतने लापरवाह हैं, वे एक विश्वव्यापी धार्मिक सिद्धान्त को भूल जाने का खतरा मोल ले रहे हैं।’ मातृभाषा के महत्त्व को लेकर वे अनेक स्थलों पर हमें जागृत करते रहे। मसलन फरवरी, 1916 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के उद्घाटन समारोह में उन्होंने कहा– ‘इस महान विद्यापीठ के प्रांगण में अपने ही देशवासियों से अंग्रेजी में बोलना पड़े, यह अत्यन्त अप्रतिष्ठा और लज्जा की बात है। ….. मुझे आशा है कि इस विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों को उनकी मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा देने का प्रबंध किया जाएगा। हमारी भाषा हमारा ही प्रतिबिम्ब है और इसलिए यदि आप मुझ से यह कहें कि हमारी भाषाओं में उत्तम विचार अभिव्यक्त किए ही नहीं जा सकते तब तो हमारा संसार से उठ जाना ही अच्छा है। …… यदि पिछले पचास वर्षों में हमें देशी भाषाओं द्वारा शिक्षा दी गई होती, तो आज हम किस स्थिति में होते! हमारे पास एक आजाद भारत होता, हमारे पास अपने शिक्षित आदमी होते जो अपनी ही भूमि में विदेशी जैसे न रहे होते, बल्कि जिनका बोलना जनता के हृदय पर प्रभाव डालता।’
    समकालीन साहित्य के रचनाकारों की शिक्षा गांधीजी ने जो संकेत दिया ‘देशी भाषाओं द्वारा शिक्षा दी गई होती’ यानी राजस्थानी में दी गई होती तो विकास की दूसरी तश्वीर सामने होती। यह साधारण बात नहीं है कि ‘राजस्थानी’ भाषा को संवैधानिक मान्यता नहीं है, और यहां की बड़ी त्रासदी यह भी है कि प्राथमिक शिक्षा का माध्यम हिंदी-अंग्रेजी है। आजादी के इतने वर्षों के बाद भी अपनी भाषा, साहित्य और संस्कृति की जड़ों से कटते इस समाज की तरफ ध्यान नहीं दिया गया है। जब कि राजस्थानी समाज का ऋण पूरे हिंदी भाषा-साहित्य और देश के निर्माण में सर्वविदित है। हमारा हिंदी साहित्य राजस्थानी भाषा-साहित्य की नींव पर व्यवस्थित हुआ है। यह कोई अतिश्योक्ति नहीं कि बिना राजस्थानी के हिंदी आधी-अधूरी है। आचार्य शुक्ल ने आदिकाल को जिन रचनाओं के आधार पर वीरगाथाकाल नाम दिया, वे अधिकांश राजस्थानी की हैं। हम शेष रचनाओं को यदि छोड़ भी दें तो एकमात्र ‘पृथ्वीराज रासो’ के बल पर राजस्थानी भाषा-साहित्य की प्राचीनता, विशालता और विविधता के विषय में कोई संशय नहीं होना चाहिए है। भक्ति काल में मीरा पदावली और वेलि क्रिसन रूकमणी भी राजस्थानी भाषा-साहित्य के पक्ष में अकाट्य प्रमाण है। इसके अतिरिक्त भी अनेक अप्रकाशित, प्रकाशित रचनाएं इस संदर्भ में उल्लेखित की जा सकती है।
    डिंगळ की श्रेष्ठ रचनाओं में पृथ्वीराज राठौड़ जिन्हें पीथळ कहा जाता था की कृति ‘वेलि क्रिसन रूकमणी री’ के प्रसंग की चर्चा में ‘मुंहणोत नैणसी की ख्यात’ में भी उल्लेख मिलता है। पीथळ और अकबर के संबंधों को इन पंक्तियों में देखा जा सकता है- ‘पीथल सूं मजलिस गई, तानसेन सूं राग,/ रीझ बोल हंस खेलबो, गयो बीरबल साथ।’ डॉ. एल. पी. तैस्सितोरी ने राजस्थानी भाषा-साहित्य के विषय में बहुत कार्य किया वह और प्राचीन पांडुलिपियां यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि राजस्थानी भाषा-साहित्य का गौरवमयी अतीत रहा है। जैन साहित्य और विभिन्न संप्रदायों के साहित्य का आकलन भी राजस्थानी के पक्ष में जाता है। राजस्थानी के एक विद्वान ने आदि राजस्थानी की संकल्पना को वैदिक साहित्य से जोड़ते हुए अनेक प्रमाणों का उल्लेख किया है। इतना सब कुछ होने के बाद भी राजस्थानी को हम हिंदी की उपभाषा और बोली के रूप में पढ़ते आए हैं।
    आज राजस्थानी एक संपूर्ण भाषा है। अपनी भाषाई मान्यता के विषय में राजस्थानी के पक्ष में यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि भाषा वैज्ञानिक आधार पर इसे मान्यता मिलनी चाहिए। देश हित और हिंदी हित की बात करते हुए जिन्हें हिन्दी के चिन्दी-चिन्दी होने की चिंता है, उन्हें इसके इतिहास को भी जानना चाहिए। हिंदी प्रदेशों की हिंदी बोलियों के विषय में मतभेद हो सकते हैं किंतु यह सत्य है कि राजस्थान के एकीकरण के समय राजस्थानी ने देश हित में हिंदी के पक्ष में अपना बलिदान दिया है। आज हिंदी इतनी मजबूत और वैश्विक भाषा है कि प्रत्येक राजस्थानी इसे राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार करता है। हिंदी को राष्ट्रभाषा मानते हुए भी अगर राजस्थानी मातृभाषा की मांग जायज नहीं है, तो हिंदी समर्थकों को सभी मातृभाषाओं का विरोध करना चाहिए। संविधान में जिन भाषाओं को पूर्व में आठवीं अनुसूचि में शामिल किया गया है वे मानक यदि आज भारत की अन्य क्षेत्रीय भाषाएं पूरे करती हैं तो उन्हें भी जोड़ा जाना तर्कसंगत होगा अन्यथा पूर्व में जोड़ी गई भाषाओं को भी हिंदी के हित के मुद्दे पर पृथक कर दिया जाना न्याय संगत होगा?
    रवीन्द्रनाथ टैगोर, पं. मदन मोहन मालवीय, जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन, डॉ. एल.पी. टैसीटोरी, डॉ. सुनीति कुमार चाटुर्जी, राहुल सांकृत्यायन, झवेरचंद मेघाणी, काका कालेलकर से लेकर कन्हैयालाल सेठिया जैसे विद्वान राजस्थानी को एक स्वतंत्र तथा बड़े समुदाय की समृद्ध भाषा मानते रहे हैं। राजस्थानी की अपनी खुद की बोलियां हैं। किसी भी भाषा का शृंगार बोलिया हुआ करती हैं। अंगेजी राज के विरूद्ध आवाज उठाने वाला कवि राजस्थान का राजस्थानी भाषा का है। याद करें 1857 के जन विद्रोह को जिस पर राजस्थानी कवि बांकीदास की पंक्तियां- ‘आयौं इंगरेज मूलक रै ऊपर, आहंस खेंची लीधां उरां...’ ऐसे अनेक प्रमाण है जिससे राजस्थानी भाषा के रूप प्रतिष्ठित होती है। राजस्थानी भाषा की मान्यता का प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास राजस्थान सरकार द्वारा वर्षों हुए भिजवाया जा चुका है।
    राष्ट्रीय भावना में अपनी आन, बान और शान के लिए विख्यात राजस्थान का यह अद्भुत साहस और धैर्य है कि वह राजस्थानी भाषा की मान्यता के लिए प्रतीक्षारत है। राजस्थानी को गांधी जैसा कोई सपूत नहीं मिला जिसने अपनी मातृभाषा गुजराती को एक संबल दिया और आज गुजराती देश की प्रमुख भाषाओं में शामिल है। राजस्थानी की लिपि देवनागरी होने की बात करने वाले वाले मराठी और नेपाली अथवा संस्कृत के विषय में कोई संदेह क्यों नहीं करते हैं। दूसरी तरफ यह भी त्रासदी है कि यदि राजस्थानी का अपना स्वतंत्र अस्थित्व नहीं है तो हिंदी के समानांतर इसे प्रयुक्त किए जाने की स्वतंत्रता क्यों नहीं है।
    समकालीन राजस्थानी के विषय में कहा जा सकता है कि भारतीय भाषाओं में राजस्थानी को पृथक कर यदि साहित्य की बात की जाएगी तो हमें बहुत सी विशेषताओं से वंचित होना पड़ेगा। राजस्थानी के समृद्ध लोक साहित्य और सांस्कृतिक वैभव से लकदक आधुनिक साहित्य की इस पूरी यात्रा में अनेक मुकाम है। यहां यह भी रेखांकित किया जाना आवश्यक है कि बिना राजकीय संरक्षण केवल लेखकीय उत्साह और मातृभाषा के प्रति अपरिमित प्रेम का यह उदाहरण है कि राजस्थानी का समकालीन साहित्य ध्यानाकर्षण का विषय है। यहां कुछ विधाओं पर संक्षेप में चर्चा करने से पूर्व स्पष्ट करना होगा कि इस आकलन में अनेक रचनाएं और रचनाकार स्थानाभाव और तत्काल स्मरण में नहीं आ पाने से रह जाते हैं तो उनका महत्त्व कम नहीं हो जाता। उनका अपना महत्त्व और अवदान भी उल्लेखनीय है और रहेगा।
    राजस्थानी का प्राचीन गद्य साहित्य ही भारतीय भाषाओं में गद्य साहित्य का प्राचीनतम प्रमाण है। आधुनिक काल में गद्य का पहला प्रारूप सूर्यमल्ल मीसण की रचना ‘वंश भास्कर’ में देखा जा सकता है। साहित्य अकादेमी ने इस विशालकाय ग्रंथ का प्रकाशन भी किया है। कुछ गद्य की विधाओं और कविता की चर्चा यहां अपेक्षित है।   

उपन्यास
गद्य साहित्य की विधाओं में उपन्यास का महत्त्व सर्वविदित है। शिवचंद्र भरतिया के ‘कनक-सुंदर’ (1903) से आरंभ हुई इस यात्रा में श्रीनारायण अग्रवाल का ‘चम्पा’ (1925) और श्रीलाल नथमल जोशी का ‘आभै पटकी’ (1956) उपन्यास के आरंभिक रूप को दर्शाते हैं। अब तक सौ से अधिक उपन्यासों का प्रकाशन राजस्थानी में हो चुका है। मेवै रा रूंख (अन्नाराम ‘सुदामा’), उड जा रे सुआ (शांति भारद्वाज ‘राकेश’), घराणो (अब्दुल वहीद ‘कमल’), सांम्ही खुलतौ मारग (नंद भारद्वाज), जूण–जातरा (अतुल कनक), गवाड़ (मधु आचार्य ‘आशावादी’) आदि अनेक अनेक उपन्यास चर्चित रहे हैं। नंद भारद्वाज, अन्नाराम सुदामा और यादवेंद्र शर्मा आदि के उपन्यासों का हिंदी अनुवाद भी उपलब्ध है। अन्नाराम सुदामा, यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’, बी. एल. माली ‘अशांत’, पारस अरोड़ा, करणीदान बारहठ, देवकिशन राजपुरोहित, देवदास रांकावत, मधु आचार्य ‘आशावादी’ और नवनीत पाण्डे आदि अनेक राजस्थानी के चर्चित उपन्यासकार हैं।

कहानी
आधुनिक राजस्थानी कहानी भारतीय भाषाओं में अपना विशेष स्थान रखती है। लोककथा और बात से आरंभ हुई आधुनिक कहानी के विकास की बात करें तो शिवचंद्र भरतिया राजस्थानी के पहले आधुनिक कहानीकार कहे जाते हैं। आपकी कहानी ‘विश्रांत प्रवासी’ (1904) से आरंभ हुई इस यात्रा में गुलाबचंद नागौरी, मुरलीधर व्यास ‘राजस्थानी’, नानूराम संस्कर्ता, नृसिंह राजपुरोहित, बैजनाथ पंवार, रामेश्वरदयाल श्रीमाली, अन्नाराम सुदामा,  सांवर दइया अर यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’ तक पहुंचते पहुंचते कहानी ने भारतीय भाषाओं में अपना विशिष्ठ स्थान बना लिया है। विजयदान देथा ने जन जन में बिखरी लोककथाओं के लिपिवद्ध कर संकलित किया वहीं आगे चलकर लोककथाओं को अपने शिल्प में ढालते हुए साहित्यिक स्वरूप भी दिया। उल्लेखनीय है कि बिज्जी की ख्याति लोककथाओं के लिए है। चश्मदीठ गवाह (मूलचंद ‘प्राणेश’), जमारो (यादवेन्द्र शर्मा ‘चंद्र’), अधूरा सुपना (नृसिंह राजपुरोहित), एक दुनिया म्हारी (सांवर दइया), माटी री महक (करणीदान बारहठ), मरदजात अर दूजी कहाणियां (बुलाकी शर्मा) और सुन्दर नैण सुधा (रामपाल सिंह राजपुरोहित) जैसे कहानी संग्रहों से कहानी का विकास देखा जा सकता है। कहानी के इस विकास में रामेश्वरदयाल श्रीमाली, मनोहरसिंह राठौड़, भंवरलाल भ्रमर, मोहन आलोक, मदन सैनी, सत्यनारायण सोनी, रामस्वरूप किसान, दिनेश पांचाल, मीठेश निर्मोही, देवकिशन राजपुरोहित, माधव नागदा, नंद भारद्वाज, मंगत बादल, मधु आचार्य ‘आशावादी’, मनोज स्वामी, कन्हैयालाल भाटी, निशांत, नवनीत पाण्डे, मदनगोपाल लढ़ा, राजेन्द्र जोशी आदि अनेक कहानीकारों का भी योगदान रहा है। महिला कहाणीकारों में लक्ष्मीकुमारी चूंडावत, आनंदकौर व्यास, प्रकाश अमरावत, पुष्पलता कश्यप, कुसुम मेघवाळ और डॉ. जेबा रसीद आदि के नाम उल्लेखनीय है। पच्चीस राजस्थानी कहानीकारों की कहानी कला के हवाले से समकालीन राजस्थानी कहानी की दशा-दिशा को आलोचना पुस्तक ‘बिना हासलपाई’ (नीरज दइया) से देखा-समझा जा सकता है।

नाटक
राजस्थानी के आधुनिक नाटकों की जड़े लोकनाट्यां से पोषित हुई है। आधुनिक उपन्यास-कहानी की भांति नाटक के आरंभ का भी श्रेय शिवचंद्र भरतिया के नाटक ‘केसर विलास’ को है। भगवती प्रसाद दारूका और नारायण अग्रवाल आदि ने भी इस कालखंड में अनेक नाटक लिखे। भरत व्यास, सूर्यकरण पारीक, आज्ञाचंद्र भंडारी, गिरधारी लाल शास्त्री, बद्रीप्रसाद पंचोली, अर्जुनदेव चारण, निर्मोही व्यास, लक्ष्मीनारायण रंगा और ज्योतिपुंज आदि राजस्थानी के चर्चित नाटककार हैं। ‘धरमजुद्ध’ (अर्जुनदेव चारण) और ‘कंकू कबंध’ (ज्योतिपुंज) जैसे नाटक अपने रंगप्रयोग द्वारा सराहनीय माने जाते हैं।

कविता

राजस्थानी कविता के आधुनिक काल में समकालीन कविता तक कविता के पहुंचने के अनेक पड़ाव देखे जा सकते हैं। जागरण काल के कवियों में सूर्यमल्ल मीसण, बांकीदास, शंकरदान सामौर, ऊमरदान लाळस, महाराज चतुरसिंह अर केसरीसिंह बारहठ आदि प्रमुख कवि हुए, जिन्होंने अपनी कविता को जन-जागरण का हथियार बनाया। आजादी की अलख जगाने वाले कवियों में सूर्यमल्ल मीसण की ‘वीर सतसई’ का यह दोहा मातृभूमि पर कुर्बान होने का संदेश आज भी देता है- ‘इळा न देणी आपणी, हालरियै हुलराय। / पूत सिखावै पालणै, मरण बड़ाई माय॥’ यह वीर भूमि राजस्थान के सांस्कृति गौरव का प्रमाण है कि अनेक वीरों ने मातृभूमि के लिए यहां प्राण होम दिए तो स्त्रियों की अस्मिता का जोहर भी इसी धरा पर हुआ।
    आजादी के बाद कवि गणेशलाल व्यास ‘उस्ताद’, सत्यप्रकाश जोशी, कन्हैयालाल सेठिया, गिरधारी सिंह पड़िहार, चंद्रसिंह बिरकाळी, मेघराज ‘मुकुल’, रेवतदान चारण आदि अनेक कवियों की कविताओं में शिल्प और कथ्य की नवीनता मिलती है। ‘लोग कैवै सोने रो सूरज ऊग्यो, पण कठै गयो प्रकाश’ जैसी पंक्तियां लिखने वाले गणेशीलाल व्यास की कविता यात्रा में आजादी से पूर्व और पश्चात की मनःस्थितियों को देखा जा सकता है। राजस्थानी में प्रकृति काव्य के अंतर्गत मनुष्य और प्रकृति के गहरे संबंधों की अभिव्यंजना विविध रूपों में कवि चंद्रसिंह बिरकाली ने ‘बादळी’ और ‘लू’ के माध्यम से की, जिसे पर्याप्त ख्याति मिली है। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ तक ने बिरकाली की रचनात्मकता की सराहना की। उदाहरण के लिए यह दोहा देखें- ‘नहीं नदी नाळा अठै, नहीं सरवर सरसाय। / अेक आसरो बादळी, मरु सूकी मत जाय॥’ कवि ने ‘लू’ में यहां की प्राकृतिक विड़रूपता को वाणी दी- ‘काची कूंपळ, फूल-फळ, फूटी सा वणराय। / वाड़ी भरी वसंत री, लूटी लूवां आय॥’ प्रकृति काव्य धारा में नानूराम संस्कर्ता की ‘कळायण’, नारायणसिंह भाटी की ‘सांझ’, सुमेरसिंह शेखावत की ‘मेघमाळ’, उदयवीर शर्मा की ‘सूंटो’ और कल्याणसिंह राजावत की ‘परभाती’ आदि रचनाओं का विशेष महत्त्व है। कवि कन्हैयालाल सेठिया, रेंवतदान चारण आदि अनेक कवियों ने आधुनिक काल में प्रकृति के विविध रूपों को अपनी कविताओं में चित्रित किया। विख्यात कवि कन्हैयालाल सेठिया जीवन पर्यंत राजस्थानी भाषा की मान्यता का स्वर लिए कविता में सक्रिय रहे। आपकी कविताओं में गहन चिंतन और दर्शनिकता राजस्थानी कविता की थाती है। कविता के विषय में सेठियाजी ने लिखा- ‘भाषा री खिमता नै / तोलणै री ताकड़ी है कविता / सबदां रै भारै में / चन्नण री लाकड़ी है कविता।’
    राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्यधारा के अंतर्गत मंचीय कविता और सुरीले गीतों का योगदान रहा। मेघराज मुकुल की ‘सेनाणी’ को हिंदी कविता के बीच राजस्थानी कविता के रूप में पर्याप्त ख्याति मिली। वहीं कन्हैयालाल सेठिया की- ‘आ धरती गोरा धोरां री, / आ धरती मीठा मोरां री। / ईं धरती रो रुतबो ऊंचो, / आ बात कवै कूंचो-कूंचो॥’ ने राजस्थान के गौरव का गुणगान किया। इस धारा को आगे बढ़ाने वाले कवियों में रेवतदान चारण, नारायणसिंह भाटी, रघुराजसिंह हाड़ा, गिरधारीसिंह पडिहार, भीम पांडिया, कल्याणसिंह राजावत, मोहम्मद सदीक, कानदान कल्पित, ताऊ शेखावाटी, भागीरथसिंह भाग्य आदि अनेक कवियों के नाम जुड़ते गए।
    ऐतिहासिक मिथकों को कविता में प्रयुक्त कर समकालीन व्यंजनाओं के लिए ‘बोल भारमली’ (सत्यप्रकाश जोशी) चर्चित कृति रही तो नवगीत के लिए ‘ग–गीत’ (मोहन आलोक) को विशेष ख्याति मिली। कवि मोहन आलोक ने राजस्थानी में लिकरिक छंद के अतिरिक्त सॉनेट भी लिखें जिन पर पर्याप्त ध्यान दिया गया है। सांवर दइया हाईकू और गजल में प्रयोग के साथ अपनी लघु कविताओं के लिए याद किए जाते हैं। कवि अर्जुनदेव चारण ने पौराणिक चरित्रों को लेकर लंबी कविताएं लिखी हैं, जिनमें स्त्रियों के चरित्र में नई व्यंजनाओं की पड़ताल करने का उल्लेखनीय कार्य हुआ है। म्हारी कवितावां (प्रेमजी प्रेम), म्हारो गांव (रामेश्वर दयाल श्रीमाली), अणहद नाद (भगवतीलाल व्यास), आंख हींयै रा हरियल सपना (आईदान सिंह भाटी), आंथ्‍योई नहीं दिन हाल (अम्बिकादत्‍त), मीरां (मंगत बादल) आदि अनेक कविता संग्रह राजस्थानी कविता यात्रा के विविध स्वरों को विकसित करते हुए भारतीय कविता के प्रंगाण में राजस्थानी कविता के लिए पर्याप्त स्थान के अधिकारी हैं। आधुनिक कविता परंपरा में अनेक कवियों और स्वरों का योगदान रहा है जिससे समकालीन कविता की जमीन निर्मित हुई। 
     यहां संक्षेप में कुछ ही विधाओं पर चर्चा हुई है। राजस्थानी साहित्य में अन्य विधाओं में भी खूब कार्य हुआ है एवं अनुवाद के अंतर्गत कई विधाओं की अनेक रचनाओं के परस्पर अनुवाद से भारतीय साहित्य का एक व्यापक वितान सामने आता है। गर्व से कहा जा सकता है कि राजस्थानी साहित्य भारतीय साहित्य परंपरा में अपना अलहदा स्थान रखता है। इस छोटी सी साहित्यिक झांकी में अनेक विधाओं और रचनाकारों का उल्लेख समाहित नहीं है। यहां केवल राजस्थानी भाषा और साहित्य के विषय में इस प्रस्तावना से यह विश्वास है कि राजस्थानी भाषा को मान देने के हमारे आग्रह पर आपकी सहमति साथ जुड़ेगी। आप सभी साहित्य के गुणीजनों से यह अपेक्षा है कि हिंदी के विकास और उत्थान में राजस्थानी भाषा को मान्यता प्रदान की जाती है तो इसके अनेक पक्ष प्रकाश में आ सकेंगे। इन सभी पक्षों से अंततः भारतीय साहित्य और हिंदी साहित्य का विकास होगा। समकालीन साहित्य में युवा पीढ़ी को मान्यता के लिए संघर्ष करना नहीं पड़ेगा तो ऊर्जा सृजन में लगेगी और निश्चय ही भारतीय साहित्य में युवा साहित्य के अंतर्गत अन्य भाषाओं के साथ राजस्थानी का विशिष्ट अवदान रेखांकित किया जा सकेगा। समकालीन युवा साहित्य के पोषण से भविष्य के साहित्य का निर्माण संभव है।
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