16 जून, 2017

शराबी चूहे और पिनोकियो वाइरस

हने वाले झूठ कहते हैं कि संगत का असर होता है। जब बिहार के चूहों के साथ राजस्थान के चूहों की कोई संगत हुई ही नहीं, फिर बिहारी चूहों की तर्ज पर राजस्थानी चूहे शराब कैसे पीने लगे! काश कि राजस्थान का पड़ौस राज्य बिहार होता, तब संगत भी बात कुछ समझ आती। कोर्ट में वकीलों और न्याय के खेल, वहां के रंग-ढंग निराले है। हमारे सपनों में भी कुछ का कुछ उल्टा-पुल्टा होता रहता है। अभी कल की बात लो, मेरे सपने में मुझे चूहों की पार्टी देखने का सुख मिला। वे आपस में एक दूसरे को पीना-पिलाना कर रहे थे। पार्टी में मैंने देखा कि एक चूहा गीत गा रहा था। गीत भी कौनसा, फिल्म ‘लीडर’ का- ‘मुझे दुनिया वालों, शराबी ना समझो मैं पीता नहीं हूं, पिलाई गई है। जहां बेखुदी में कदम लडखडाए, वो ही राह मुझको दिखाई गई हैं।’ तो एक दूसरे चूहे ने ‘शराबी’ का फिल्म का गीत गाया। यह सच है कि नशा शराब में नहीं होता, अगर होता तो क्या बोलत नाचती नहीं? पीकर पीने वाले नाचते हैं और घरवालों को नचवाते हैं। बाहर पीते हैं तो बाहर वालों को नचवाते हैं।
बिहार में मुख्यमंत्रीजी ने पूर्ण शराबबंदी का फैसला किया तब लाखों लीटर शराब पुलिस ने जब्त की थी। कहते हैं कि करीब नौ लाख लीटर शराब मालखाने में जनता और इंसानों से तो बचा ली, पर कम्बखत इन चूहों का क्या करें.... जिन्होंने इतनी भारी मात्रा में शराब गटका ली। वहां पूरी की पूरी चूहों की बारात इस काम में लगी कि लगभग तेरह महीनों में सवा नौ लाख लीटर अल्कोहल, देशी और विदेशी शराब के क्राईम का माल हजम हो गया। कहने वाले कुछ भी कहें पर सच्चाई यही है कि शराबबंदी फैसले में सबसे अधिक फायदा बिहार के चूहों को हुआ और मुख्यमंत्रीजी ने चूहों के विषय में तो कोई फैसला किया नहीं था।
बात कोई कब तक छुपाएगा। चूहों ने शराब पी और पीकर दौड़े राजस्थान की दिशा में। राजस्थानी भाषा में तो पीने वालों के लिए जुम्ला है- ‘घोड़ै असवार।’ यानी पीया हुआ आदमी घोड़े पर सवार रहता है। वह किसी भी दिशा में गतिशील हो कुछ भी करने की क्षमता रखता है। यह मालला आठ साल पुराना है कि आबकारी निरोधक दल ने एक मकान से बड़ी मात्रा में अल्कोहल जबत की। शराब तस्करी के आरोपी को जब पता चला कि चूहे शराब पी रहे हैं तो उससे रहा नहीं गया, उसने अपने वकील से अदालत में सबूत पेश करने की गुहार की। यह न्याय की मंथर गति है कि जब तक शराब की बोतलें अदालत में पेश होती वे खाली हो चुकी थीं। लिहाजा अदालत के आदेश की पालना हुई और खाली बोतलें पेश की गई।
पुलिस कहीं की हो, यह बात तो पूरे दावे के साथ कही जा सकती है कि डरना उसका काम कभी नहीं रहा है। पुलिस ने सच्चाई जाहिर कर दी कि बोतलों से शराब चूहे पी गए। इसके अलावा शराब की कुछ मात्रा प्राकृतिक कारण से लुप्त हो गई। आबकारी जमादार ने बताया कि बारिश के मौसम में मालखाना में सीलन होने से शराब उड़ जाती है। अदालत ने इन बातों को रिकॉर्ड पर दर्ज कर लिया है।
पंच काका कहते हैं कि भारतीय पुलिस-भर्ती में कोई ऐसी तकनीक को अपनाया जाना चाहिए कि कानून व्यवस्था पुखता रहे और चूहे शराबी नहीं हो। भला चूहों को क्या गम हो गया, जिसे गलत करने के लिए उन्हें पीना-पिलाना पड़े। चूहे हमारी भाषा बोल नहीं सकते। जो बोल सकते हैं उनमें ‘पिनोकियो’ वाइरस का प्रयोग होना चाहिए। जिससे झूठ पकड़ा जा सके। झूठ बोलने वाले की नाक लम्बी होनी चाहिए। हमारे यहां तो लंबी नाक रुतबे का प्रमाण है। लंबी नाक के इस खेल में देखेंगे कि नेताओं की नाक लंबी अधिक होती है या पुलिस-वकीलों की।
० नीरज दइया
 

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