24 जून, 2017

राजस्थानी कविता / अर्जुनदेव चारण / अनुवाद : नीरज दइया

अर्जुनदेव चारण
उमादे  

मारवाड़ में रूठी रानी नाम से विख्यात उमादे जैसलमेर के राजा की पुत्री थी- उसका विवाह जोधपुर के राजा मालदेव से हुआ। विवाह के समय ही जैसलमेर के राजा मालदेव को मारने का षड्यंत्र किया, किंतु मालदेव को पहले ही षड्यंत्र की भनक लग जाती है और वह अपनी चतुराई से बच जाता है। विवाहोपरांत जब पहली रात मालदेव रानी उमादे से मिलने उसके महल पहुंचता है तब वह शृंगार कर रही होती है। राजा को आया देख उमादे अपनी सखी भारमल को कहती है कि मैं जितने तैयार हो कर आती हूं तुम राजाजी की खातरदारी करना। भारमली राजा मालदेव की आवभगत करती है- वह उनको शराब देती है। मालदेव शराब पीते-पीते भारमल को अपनी गोद में बिठा कर शराब पिलाने लगता है। ऐसे समय में उमादे वहां पहुंचती है- वह दृश्य देख उमादे क्रोधित हो जाती है और दीपक को ठोकर से बुझा कर वहां से वापस चली जाती है। उसके बाद वह जब तक जिंदा रही मालदेव से अनबन रखी और रूठी रानी के नाम से विख्यात हुई। वह मालदेव की पहली रानी से उत्पन पुत्र राम को गोद लेती है और जिंदा रही तब तक उसके साथ रही। अपने पहले पुत्र राम को मालदेव ने जोधपुर से निष्कासित कर दिया तो उसके ससुराल वाले उसे “कीरवै” की जागीर दे देते हैं। ताजिंदगी अपने पति से संवादहीनता के उपरांत उमादे को जब मालदेव की मृत्यु का समाचार मिलता है तब वह सती होती है। सती होने से पूर्व दुनिया के समक्ष अपनी पीड़ा प्रकट करती है- “औरतों अपने पति से अधिक समय रूठना मत और दूसरे के पैदा किए को गोद मत लेना, वह अपना कभी नहीं होता।“ प्रीत को तरसती रानी की पीड़ा को प्रकट करती हैं ये कविताएं-
 
(1)

 
जिंदगी के आह्वान में
अक्षरों का महत्त्व नहीं है उमादे
महत्त्व है मात्रा का
जिसके बल पर
सृष्टि रचती है
शब्दों का आवरण
और शब्दों के हिस्से में है-
उनका लघु या गुरु होना।
वह मात्रा ही होती है उमादे
जो ‘ना’र’ (नाहर) को ‘नार’ (नारी) बना कर 

                  
छीन लेती है नाखून और दांत।
किंतु इसमें भी
सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होती है
वह आधी मात्रा
जो सभी अक्षरों के अर्थ
कर देती है परिवर्तित
और उसी के बल पर
बदल जाते हैं-
अपनी जिंदगी के अर्थ।

तुम
सभी वर्णों को कर वशीभूत
करती रही जद्दोजहद
जिंदगी जीने की
परंतु वह आधी मात्रा
सदैव तुम्हारी पकड़ से बाहर
कोसों दूर खड़ी हंसती रही।
‘पीव’ और ‘प्रीत’ में
सिर्फ आधी मात्रा का ही
होता है अंतराल उमादे 


छंद तो इस आधी मात्रा को
बोलते समय अस्तित्वहीन मान नकार देता है
परंतु मनुष्य जीवन में
यह नाकुछ आधी मात्रा
मनों भार लिए स्थिर रहती है।
बड़े-बड़े गढ़पतियों की औकात
दिल्लगी में बिखरा जाती है
यही नाकुछ आधी मात्रा।

‘रीस’ (क्रोध) और ‘रूस’ (रूठना) का
वजन तो बराबर ही होता है
मात्राएं भी होती हैं एक जैसी
लघु-गुरु-लघु
तो फिर
क्यों है इतना अंतर?
रीस मनुष्य को सदैव
लघु से लघूत्तर बना
खड़ी रहती है अकेली,
रूठने के संग
हमेशा दिखाई देती है- मनुहार
छुप्पम-छुपा का खेल खेलती
झुकने को प्रयासरत
करती हुई स्वयं की ही
मान मर्दना/यह आधी मात्रा
अपनी पूरी जिंदगी में
सातों रंगों को
पकड़ने में प्रयासरत रहती।

रीस तो
सिर्फ एक रंग ई जानती है
दूसरों को
स्वयं के पैरो में झुका कर
होती है खुश,
अपने बड़प्पन का
गर्व पोषित करता
यह लाल रंग
कब गहरा हो कर
बन जाता है किरमिचिया
और अंततः
अंधकार से सूत्र जोड़ता
हो जाता है अदृश्य।
फिर ऐसी आंखें
तुमने तुम्हारे चेहरे पर
क्यों चिपका ली?

झुकने का अर्थ
हार नहीं होता है उमादे!


इस आधी मात्रा के समक्ष
समर्पण
हमें सौंप देता है-
संपूर्ण दुनिया का साम्राज्य।
भारमली तुम्हारी सखी
जानती थी यह तथ्य
उसके पास था
इस आधी मात्रा का
अनमोल खजाना।
तुम्हारे ही तो
संग रहती थी वह।
तो फिर क्यों था
इतना फर्क।
वह प्रीत नगर की
नामचीन अमीर बनी
और तुम?
तुम सिर्फ एक मोती की आशा लिए
जीती रही जिंदगी
जिसकी चमक
समय-सागर में
अंततः उतर ही जानी थी।
तुम्हारे हिस्से तो
प्रीत-खजाने से
एक कण भी नहीं आया उमादे,
रानी होने का मद
तुझे ताजिंदगी
प्रीत की सीढ़ियां
चढ़ने से रोकता रहा।

बड़ा होने के लिए
लघुता का भेद जानना
जरूरी होता है जिंदगी में,
जो लघु होने की
जानता है कला
वही हो सकता है विराट
किंतु जब हम
दो लघुओं के मध्य बैठे गुरु को
दे देते हैं उतना सम्मान
तो यही गुरु
हमें लघु से भी लघूत्तर बना कर छोड़ता है।
इतिहास
काफी बार
इसी तरह से
मजाक करता है
मानवता से।
आने वाली पीढ़ियां
जब इस मजाक का
रहस्य समझ लेती हैं
तभी अक्षरों के बाजार में
उन ढाई अक्षरों का
मूल्यांकन हो सकता है।
समर्पण तो
समान अर्पण है
दोनों पक्षों का
इसलिए
दोनों ही पक्ष
आनंद के अंदर
झुके दिखाई देते हैं
तुम इतनी ऐंठ गई
कि झुकना ही भूल गई उमादे।
अपने अंतिम दिनों
तुम्हारे समक्ष खुला
इस आधी मात्रा का अर्थ
औरतों अपने पति से
अधिक समय रूठना मत
चिता चढ़ने से पहले
यही थे तुम्हारे अंतिम शब्द
यह था पूरे जीवन का सार
कि तुम्हें दिखाई दिए
आगामी सातों संसार
और तुम
जाग्रत करना चाहती थी
आने वाली पीढ़ियों को।
तुमने
अनावृत्त कर दिया
दुनिया की आधी आबादी के समक्ष
झूठ के कठोर दरवाजों में बंद
सच का
अनदेखा अक्श
कि यह आधी मात्रा ही
दुनिया की
पूरी आबादी का
मान वर्धन करेगी।
०००

(2)

 
क्या प्रीत से पगी देह
हो जाती है अबोली?
तो फिर
यह रस
रूठने में
और रूठना क्रोध में
क्यों और कैसे हो जाता है परिवर्तित
तुम्हें पहचानते हुए
मैं पहचानना चाहता हूं उमादे।

प्रीत की जबान
किस प्रकार बंद कर देती है द्वार
कि सिर्फ रूठना ही दिखाई देता है
दिखाई देता है क्रोध
परंतु बहुत दूर
छिपी हुई प्रीत
दुनिया को दिखाई क्यों नहीं देती।
क्या हर बार
ऐसे ही
प्रीत को प्रगट करने के लिए
जाग्रत करनी होगी अग्नि
लपटों का रंग तो
प्रीत के रंग से
बेहद अलहदा होता है उमादे
तो फिर
स्वय़ं को पहचान के लिए
तुमने यह रंग क्यों स्वीकारा?
युगों-युग
आने वाली पीढ़ियों को
सुनाने के लिए एक कहानी?
शायद पीढ़ियां
इसी को इसी बहाने
प्रेम-कथा कहकर पहचानेगी?
छल
सिर्फ छलावा है तुम्हारा जीवन उमादे,
पिता का
पति का
सखी का
और गोद लिए
किसी दूसरे के पुत्र का।
प्रीत को स्वीकारने
खड़े होने की जिद
और ऐसी कठोर सजा?

तुम कितनी बार मरती रही
उसी एक जीवन में
बचाए रखने को
अपनी प्रीत को स्वच्छ
तो फिर
छल करने वाली इस दुनिया में
तुमने प्रीत रचने के स्वप्न क्यों देखे?
प्रीत कहां बसती है
संबंधों के उन तंतुओं के मध्य?
किस प्रकार पहुंचती है वह
अपने उस दूसरे स्वरूप तक?
उन तंतुओं को
अपने से दूर
 

विकसित होने की कल्पना करने वाला
हर बार क्यों मारा जाता है बेमौत?
क्या प्रीत इसी प्रकार फैलती है
एक देही से दूसरी देही तक?
वह स्पर्श
उष्मित होता है या राख कर देने वाला?
या कि होता है
हिमालय से भी बड़ा?
इस विशालता को
चेतनावान बनाने के प्रयास करती जिंदगी
प्रीत की अग्नि को
संपूर्ण सृष्टि को
प्रकाशवान करने का स्वप्न देखती है।

फिर ऐसा क्यों हुआ
कि वह विशालता ले बैठी
तुम्हारे अधर
क्यों उसने पकड़ ली
तुम्हारी गर्दन
क्यों उतर आई गहरे
तुम्हारे अंतस तक
अब यह रहस्य
कौन बताएगा?
भारमली?
या कि मालदेव?
पूछें उस दरवाजे से
कि पूछंे उस दीपक से
जिसे तुमने
पैर की ठोकर से बुझाया और
तुम वापस लौट गई।
उस ठोकर की धमक
यह संसार
आज तक सुन रहा है उमादे
तुमने किसकी जिंदगी में
किया अंधेरा?
मालदेव के महलों तो
उसके बाद भी
सदा-सदा रही
जगमगाहट,
जगमगाती ही रही
भारमली
बिना किसी कांकण-डोर
बिना चंवरी-फेरों के भी
वह राज करने को बैठी
गढ़ जोधांण,
और तुम
‘कीरवा’ की सीमाओं में खड़ी
सहलाती रही अपना मान।
घर तो तुम्हारा था उमादे
परन्तु उस एक ठोकर के बल
बिखर गया वह घर।
उस रात्रि
कपाट रंग-महल के
तुम्हीं ने बंद किए थे
परंतु तुम्हारे भाग्य-कपाट के
हमेशा-हमेशा के लिए
लग गए हांे जैसे ताले
जिनकी चाबियां
न मालूम किस अबूझ कुएं में
ले जाकर गिराई उस रात ने
जो तुम्हारी बैरन बन
आई थी।

‘कीरवा’ की सीमाओं से
जोधपुर बहुत दूर था उमादे
परंतु वह हमेशा
तुम्हारे अपनापे
तुम्हारे भरोसे को
ठोकरें मारता हुआ
करता रहा लहूलुहान।

तुम जब कभी
करती थी याद उस रात को
जो छौंकती रही
तुम्हारे क्रोध को
और अबोलेपन की
वह घुलगांठ
अधिक मुश्किल में घिर जाती।
‘कीरवा’ के छोर पर ही तो
बैठा था चारभुजाधारी
प्रीत को मान देने वाला
राधा का, मीरा का
और लाखों लाख अनाथों का नाथ
तो फिर तुम्हें
वह क्यों याद नहीं आया उमादे?
तुम्हारी यादों में तो
बसता था फकत मालदेव
तुमने उसे
जितना खुद से दूर किया
वह उतना ही
बींधता रहा कलेजा तुम्हारा।
प्रीत में
मान-अपमान कहां होता है उमादे?
यदि होता है मान
तो फिर कहां रहती है प्रीत?
प्रीत की सीढ़ियां चढ़ने की
पहली शर्त है
मान को बिठाए रखना
कभी पूछना राधा से
या फिर मीरा से
आभल को पूछ लेती
या फिर पूछती नागवंती को
‘‘सोए खूंटी तान,
बतलाएं, बोलते नहीं।
कभी पड़ेगा काम,
मनुहार करोगे नागजी।’’
प्रीत के पास तो सिर्फ मन होता है
आंखें कहां होती हैं?
वह तो हमेशा जिंदा रहती है
कबंध-शरीर
शायद इसी लिए अंधी कहलाती है।
तुम्हारी जिंदगी की कामना
सहेजना चाहती थी
प्रीत के पुहुपों की
पहली-पहल सुवास
परंतु तुम्हारे हिस्से
किसने डाल दी
कांटों भरी भारी
यदि नहीं होती भारमली
तो कोई दूसरी होती
तुम्हारे जीवन में
दूसरी का योग
ताजिंदगी बना रहता।

अपने क्रोध में
तुम भूल बैठी
कि तुमने ही तो भेजा था उसे
करने खातरदारी अपने पति की,
एक दासी
कैसे करे खातरदारी राजा की?
रानियों का मान
यह बात
क्या नहीं जानती थी?
क्या तुमने जानी कभी
भारमल की पीड़ा?

अपनी पीड़ा का पर्वत
बड़ा और बड़ा करती रही तुम
और सारा दोषारोपण
भारमल के हिस्से मंड दिया।

तुम दोनों छली गईं
अपनी-अपनी जगह
तुम दोनों को तो
मिल कर करना था प्रतिकार
बचाने के लिए खुद की अस्मिता
अपनी पहचान।
शायद इसी से बच जाता
तुम्हारा और उसका
दोनों का मान
और उस मान के खूंटे
तुम बांध देती
भोग की गंदगी में कुलबुलाते
वहां खड़े उस जीव को
जिसने झूठा हाथी बना कर
खड़ा कर दिया था
आसानंद ने तुम्हारी तुलना में।
‘‘मान रखे तो पीव तज,
पीव रखे तज मान।
दो हाथी बंधते नहीं,
एक ही खूंटे-ठान।।’’
झूठा था कवि
पीव और मान
दोनों को हमेशा चाहिए
एक पहनावा
जिसको पहन कर वे धारण करते हैं
अपना-अपना स्वरूप
पिता-भाई-पति
इनके पास होता है
सिर्फ अपने पैरों में
झुकाने का आदेश
इनके हाथों में होती है
नियमों की ताजा बैंत
परंतु
प्रीत कोई नियम नहीं मानती उमादे।
सड़ाक-सड़ाक-सड़ाक के सरड़ाटे
पड़ते रहते कमर पर
वह जमी हुई लील
उन मानधारियों का यश गाती है
तुमने वहां
मान रखने की जिद क्यों की?
०००००

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