26 जून, 2017

हेलमेट पर निबंध

    कल नासिक महाराष्ट्र से फन्नेखांजी का फोन आया। दुआ-सलाम के बाद उन्होंने अपनी समस्या रखी- एक अच्छा-सा निबंध हेलमेट पर लिख दूं। मैं उनकी इस अदनी सी फरमाइस से हैरान हुआ। पहले तो भाषा का गणित समझा कि वे हेलमेट पर निबंध लिखवाना चाहते हैं, या विषय हेलमेट निबंध का रखा गया है। जिज्ञास मनुष्य की सहजता को छीन लेती है। मेरी जिज्ञासा के रहते मैंने उनसे सवाल-जबाब किए। पूछा- क्या कोई निबंध प्रतियोगिता है? कहां है? कौन करवा रहा है? यह भी कि क्या बोगस सा विषय है, किसने दिया है। ऐसे सारे सवालों के जबाब जानकर पूरी कहानी समझ आई।
    नासिक पुलिस ने ‘हेलमेट’ न पहनने वाले लोगों से सड़क सुरक्षा सप्ताह में एक प्रयोग आरंभ किया। वहां के पुलिस आयुक्त ने टैफिक पुलिस और आर.टी.ओ. के साथ मिलकर एक अनोखी कार्रवाही अंजाम दी। जिसकी वजह से मुंबई के लोग हेलमेट निबंध का गीत गले में लटकाए घूम रहे हैं। बिना हेलमेट के बाइक सवारों को रोक कर कागज, पेन देकर और सीट पर बैठा दिया जाता है। उन की भाषा में निबंध ज्ञान टंटोला जाता है। जिनको निबंध लिखने अथवा बैठ कर इस परीक्षा में हेलमेट पर विचार प्रस्तुत करने में आपत्ति है, उनके लिए पांच सौ रुपए का फाइन रखा गया है।
    हेलमेट पर निबंध लिखने से पांच सौ रुपए बच सकते हैं। इस अनोखी प्रणाली का परिणाम फन्नेखांजी ने बताया कि करीब सवा हजार लोगों ने अपने जरूरी काम को दरकिनार कर निबंध लिखना स्वीकार किया। पांच सौ रुपये से अरुचि भी रुचि बन जाए तो क्या हर्ज है? वहीं कुछ लोग अचंभे में और कई हंसी-खुशी में पुलिस द्वारा उपलब्ध कार्रवाही हेतु कुर्सी-टेबल पर बैठ गए। सवा हजार में से केवल दर्जनभर लोग ऐसे मिले जिन्हें यह कार्रवाही बेकारी लगी।
    आखिरी विकल्प के रूप में चालान काटने को इतेमाल करने वाला यह तरीका वर्तमान परिस्थितों में एकदम माकू ल है। लोगों को भविष्यफल की पर्चियां भी दी जा रही है, जिसमें कुल मिलाकर हेलमेट लगाने की प्रेरणा ही आधार है। हमारे फन्नेखांजी की समस्या यह है कि वे तो अब से हेलमेट लगा कर सफर करेंगे, पर उनके साहेबजादे हेलमेल लगना पसंद नहीं करते। उनका मानना है कि हेयर-स्टाइल बिगड़ जाता है। ऐसे में जाहिर है कि उन्हें जब पकड़ा जाएगा, तो उन्हें फाइन भरना पड़ेगा अथवा निबंध लिखना पड़ेगा। दोनों ही स्थितियां उनके लिए दुखद है। एक तो जेब में रुपए नहीं हो तो क्या करें! फाइन क्या हर रोज भरा करेंगे! रोज रोज फाइन भी कहां से लाएंगे! वे निबंध लेखन में भी जरा तंग हाथ रखते है, लिखने बैठेंगे तो सोचते-सोचते शाम कर देंगे। इसलिए निबंध की नकल जेब में पहले से रख दी जाएगी। ऐसे बात बन सकती है। ऐसे में इस जनसेवा का इतना महत्त्वपूर्ण कार्य मुझे सौंपा गया।
    मैं निबंध लिखने बैठा तो सोचाने लगा- क्या लिखूं, कैसे लिखूं? यह विषय पहले से किसी किताब या गाइड में नहीं मिला, तो मेरी समस्या बढ़ गई। पंच काका की सलाह सदा कारगार होती है। मैंने काका को पूरी स्टोरी खुल कर सुना दी, तो पंच काका बोले- ‘हमारे समय के आठवी पास लड़के-लड़कियां आज के बी.ए.-एम.ए. पास लड़के-लड़कियों से अधिक होशियार होते थे। यहां असल समस्या निबंध लिखने की नहीं, नियम मानने-मनवाने की है। उन्हें बोलो- निबंध के चोंचलों को छोड़ कर, हेलमेल पहन कर सफर सुरक्षित करें।’   
० नीरज दइया

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