02 जून, 2017

वीआईपी किस्म के लाइलाज भूत !

भूतकाल की कुछ घटनाएं ऐसी होती है कि वे वर्तमान में अपना स्थान भूत बनकर बनाएं रखती हैं। ये घटना भूलाए नहीं भूलती। ये बातें भूत बन कर हम में बसेरा करती है। हमारे और देश के वर्तमान पर छाई रहती है। ये वीआईपी किस्म के लाइलाज भूत है। पहले के भूत तो बातों से भाग जाते थे। और कुछ भूत लातों से अपना रास्ता लेते थे। पर मैं जिन भूतों की बात बता रहा हूं, उसके लिए बातें और लाते दोनों तरीके विफल हो चुके हैं। उत्तर प्रदेश चुनाव के बाद टोप लेबल से माननीय मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा हुई। घोषणा के साथ ही उनके अतीत के पन्ने भी अखबारों ने प्रकाशित किए। अतीत के महत्त्वपूर्ण कार्यों में सर्वाधिक प्रभावशाली और उल्लेखनीय बात कि ये भी पहले चाय बेचते थे। चाय बेचना अब कोई सामान्य बात नहीं है। हमारे कुछ नेता जो पहले सब्जी बेचा करते थे और जो कुछ जूते बेचा करते थे, वे सभी अब अपना-अपना परिचय बदल चुके हैं। खासकर यह पंक्ति कि भूतकाल में वे सब्जी अथवा जूते बेचा करते थे। अब इन जैसे शब्दों के स्थान पर सभी ने लिख दिया है कि वे चाय बेचा करते थे। चाय बेचने को राष्ट्रीय कार्य घोषित कर दिया जाना चाहिए। चाय ऐसा भूत बनकर देश पर छा गई है कि चाय का भूत उतर नहीं सकता है। प्रधान सेवक जी का इतना असर है कि उन्होंने गधे की तारीफ करवाई तो गधे को महत्त्वपूर्ण कर के छोड़ दिया। गधों को देखकर बेचारी जनता द्रवित हो गई है। द्रवित अवस्था होती ही ऐसी है कि उस समय कुछ का कुछ हो जाता है। कुछ खबर नहीं होती और सीधे ही बहुत बड़ी खबर आती है। जनता ने जनमत से सिद्ध कर दिया कि चाय बेचना और गधे की महानता के गीत गाना उसे लुभाता है। गधों का बुरा हाल हो गया है कि उन्हें भी भूत बन कर सब का पीछा पकड़ लेना है। गधे पहले भले प्यारे नहीं लगते थे पर अब तो हम सभी उन सभी को बेहद प्यार करते हैं। गधा छोटा हो या बड़ा, पतला हो या मोटा, गुजरात का हो या उत्तर-प्रदेश अथवा राजस्थान का हो सब के सब प्रमोशन पा गए हैं।
देश की आजादी का मतलब है कि सबको पूरी छूट है। शत प्रतिशत छूट। यानी सब कुछ फ्री। बातें फ्री। घातें फ्री। लातें फ्री। सब कुछ फ्री ही फ्री। शुल्क का तो कोई नाम ही मत लो। कीमती हो गए हैं तो बस चाय और गधे। चाय अब पहले वाली साधारण चाय नहीं रही। अन्य पेय पदार्थों को चाहने वाले और पीने वाले भी अब चाय पीना पसंद करने लगे हैं। ऊंटों और घोड़ों की सवारी करने वाले अब गधों की सवारी करने में अपनी शान समझने लगे हैं। समय समय की बात है। जब से चाय में चमत्कार आया है। लोग केवल चाय की नहीं उसे बेचने वालों की उससे भी अधिक इज्जत करने लगे हैं। कुत्तों से बातें और जी बहलाने वाले अब गधों से जी खोल कर बातें करते हैं। पंच काका कहते है कि भैया गधे का भूत इतना बड़ा बन गया है कि हमारे गांव तक पहुंच गया। पिछले दिनों एक शादी में दुल्हे ने घोड़ी पर बैठने से साफ इंकार कर दिया। कहा कि बैठना ही है तो गधी पर बैठूंगा। अगर गंधी नहीं मंगवा सकते तो मेरे लिए एक कप चाय मंगवा दो। मैं चाय पीकर पैदल चल सकता हूं। दुल्हे की बात भला कौन टालता, उसे चाय पिला कर गधी की सवारी स्वीकृत की गई।
- नीरज दइया
 

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