02 जुलाई, 2017

राजस्थानी व्यंग्य विधा के परसाई : बुलाकी शर्मा / डॉ. नीरज दइया

डॉ. नीरज दइया प्रख्यात व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा के साथ
राजस्थानी के प्रख्यात लेखक विजयदान देथा का कथन था कि बुलाकी शर्मा राजस्थानी का परसाई है। इसका कोई लिखित साक्ष्य नहीं है। मित्रों के बीच यह कथन चर्चा में रहा है। यह अभिधा में की गई कोई टिप्पणी है अथवा व्यंजना में? प्रश्न यहां यह भी किया जाना चाहिए कि क्या केवल दो राजस्थानी व्यंग्य संग्रह- ‘कवि, कविता अर घरआळी’ (1987) और ‘इज्जत में इजाफो’ (2000) यानी 32 व्यंग्य के आधार पर उन्हें परसाई कहना उचित है? माना कि बहुत रचनाएं उनकी प्रकाशित हुई हैं जो संग्रह के रूप में नहीं आ सकी है अथवा अनेक अप्रकाशित राजस्थानी व्यंग्य हैं फिर क्या यह अतिशयोक्ति जैसा नहीं लगता है?
संभवत: यहां अतिशयोक्ति इसलिए नहीं है कि राजस्थानी में व्यंग्य को विधा के रूप में स्थापित करने वालों में बुलाकी शर्मा का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। यह कथन उनके संख्यात्मक अवदान को लेकर नहीं व्यक्त हुआ है वरन इस क्षेत्र में उनके निष्ठा से सतत कार्य को देखते हुए विजयदान देथा ने कहा होगा। यहां मैं अपने हवाले से यह कह रहा हूं कि राजस्थानी व्यंग्य विधा के परसाई बुलाकी शर्मा हैं।
बुलाकी शर्मा ने व्यंग्य संग्रह ‘इज्जत में इजाफो’ के समर्पण में लिखा है- ‘राजस्थानी गद्य में व्यंग्य विधा नै ठावी ठौड़ दिरावणिया सांवर दइया री ओळूं नै’। यहां यह उल्लेखनीय है कि सांवर दइया और बुलाकी शर्मा ने व्यंग्य विधा में महत्त्वपूर्ण कार्य किया किंतु दइया के असामयिक निधन से उनकी व्यंग्य-यात्रा ‘इक्यावन व्यंग्य’ पुस्तक पर संपूर्ण हो गई।
राजस्थानी व्यंग्य विधा में बुलाकी शर्मा से बहुत अपेक्षाएं और उम्मीदें इसलिए भी हैं कि वे हिंदी के भी प्रमुख व्यंग्यकार हैं अत: निश्चय ही उनकी राजस्थानी व्यंग्य-यात्रा बहुत दूर तक जाने वाली है। जिस भांति परसाई ने व्यंग्य को विधा के रूप में स्थापित किया वैसे ही राजस्थानी में व्यंग्य विधा में गंभीरता से कार्य करने वालों में बुलाकी शर्मा का नाम अग्रिम पंक्ति में लिया जाता है।
बुलाकी शर्मा और अन्य व्यंग्यकारों में अंतर है कि शर्मा व्यंग्य की व्यापक प्रवृत्ति और भाषा से परिचित इसलिए रहे कि उन्होंने हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं का अध्ययन-चिंतन किया है। वे व्यंग्य अथवा व्यंग्य कहानी में प्रयोग करने का प्रयास करते रहे हैं। उन्होंने कई सफल प्रयोग शिल्प और भाषा के स्तर पर किए भी हैं। उन्होंने परंपरा को शक्ति के रूप में स्वीकार करते हुए आधुनिकता की दिशा को अपनाया। स्थानीयता और लौकिक सत्यों के साथ वे स्थिति के अनुसार कभी पाठक के पक्ष में और कभी विपक्ष में खड़े होने से गुरेज नहीं करते। उन्होंने अपनी स्थिति सदैव एक जैसी अथवा पूर्वनिर्धारित कभी नहीं रखी। उनमें जीवन के प्रति आकर्षण का भाव है। वे बचपन से लेकर बुढापे तक के जीवन में विनोद और विसंगतियों को ढूंढ़ लेने में सक्षम हैं। ऐसी अनेक विशेषताओं के रहते उन्हें राजस्थानी व्यंग्य के लिहाज से परसाई कहा जा सकता है। वे हिंदी में भी लिखते हैं किंतु हिंदी के संदर्भ में यह उक्ति विचारणीय नहीं है, हिंदी व्यंग्य का क्षेत्र व्यापक है और उसमें एक परसाई हुए हैं। वहां बुलाकी शर्मा को बस बुलाकी शर्मा ही होना है और वे हिंदी व्यंग्य के प्रमुख हस्ताक्षर हैं भी।
व्यंग्यकार के रूप में बुलाकी शर्मा ने सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार किए। राजनीति हो अथवा समाज-व्यवस्था उन्हें जहां कहीं गड़बड़-घोटाला नजर आया वे अपनी बात कहने से नहीं चूके। उनके व्यंग्य में उनके अनुभवों का आकर्षण उनकी भाषा और शिल्प में देखा जा सकता है। उन के व्यंग्य में शब्द शक्तियों का जादू इस रूप में साकार होता है कि वे अपने पाठ में कब अभिधा से लक्षणा और व्यंजना शब्द शक्ति का कमाल दिखाने लगते हैं पता ही नहीं चलता और जब पता चलता है तब तक हम उसमें इतने आगे निकल आए होते हैं कि पिछली सारी बातें किसी कथा-स्मृति जैसे हमें नए अर्थों और अभिप्रायों की तरफ संकेत करती हुई नजर आती है। ऐसे में विसंगतियों के प्रति संवेदनशीलता करुणा के रूप में हमारे भीतर प्रवाहित होती है।
‘कवि, कविता अर घरआळी’ शीर्षक व्यंग्य में कथात्मकता है तो संवादों का आनंद भी। यहां घर-समाज में कविता के अवमूल्यन की स्थितियां और विरोधाभास की व्यंजना प्रमुखता से देखी जा सकती है। साहित्य और खासकर कविता को लेकर कवियों के जीवन पर करारा प्रहार है। बुलाकी शर्मा इस सत्य को स्थापित करने में सफल हुए हैं कि कोई व्यक्ति हर समय कवि नहीं हो सकता है अथवा उसे हर समय कवि नहीं होना चाहिए। कवियों के कविताओं को लेकर किए जाने वाले जुल्म पर आपने हिंदी में भी कई रचनाएं दी हैंै।
उनके हिंदी व्यंग्य की बात चली है तो यहां यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि उनकी कुछ रचनाएं राजस्थानी से हिंदी और कुछ हिंदी से राजस्थानी में मौलिक रचनाओं के रूप में प्रस्तुत हुई है। जैसे इसी संग्रह की रचना ‘संकट टळग्यो’ को ‘दुर्घटना के इर्द-गिर्द’ नाम से दस वर्ष बाद इसी नाम से प्रकाशित व्यंग्य संग्रह में संकलित किया गया है। इसी भांति इस संग्रह का ‘ज्योतिष रो चक्कर’ व्यंग्य हिंदी में ‘अंकज्योतिष का चक्कर’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसी विषय को लेकर उनके राजस्थानी व्यंग्य संग्रह ‘इज्जत में इजाफो’ का शीर्षक व्यंग्य अखबार के राशिफल का रहस्य उद्घाटित करता है। वे अंधविश्वासों पर प्रहार करते हैं तो उसे कथात्मक उदाहरणों द्वारा पोषित करते हैं।
बुलाकी शर्मा अपने निजी जीवन में सरकारी नौकरी के तौर पर कार्यालयों से जुड़े रहे। अत: उनकी रचनाओं में दफ्तर के अनेक चित्र प्रस्तुत किए गए हैं। ‘दफ्तर’ नामक व्यंग्य में नए अफसर को काबू में करने की एक कहानी है तो ‘दफ्तर-गाथा’ में चार लघुकथाओं के माध्यम से चार चित्रों की बानगी कार्यालय में होने वाली अनियमितताओं की तरफ संकेत करती है। बुलाकी शर्मा के व्यंग्य में समय, समाज और देश छोटी-छोटी घटनाओं-प्रसंगों के माध्यम से अपने बदलते रूप में हमारे सामने आता है। वे बदलते समाज को जैसे शब्दों में बांधते हुए अनेक प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष संकेत करते हैं।
‘नेतागिरी रो महातम’ में बदलती राजनीति और राजनीति से पोषित होते छोटे-बड़े नेताओं को लक्षित किया है तो ‘मिलावटिया जिंदाबाद’ में जैसा कि व्यंग्य के शीर्षक से ही स्पष्ट है कि मिलावट पर व्यंग्य किया है। यहां मिलावट पर व्यंग्य लिखते हुए उन्होंने जिस पाचक घी को लक्षित किया है उससे भी सधे हुए शिल्प में उन्होंने हिंदी में एक व्यंग्य लिखते हुए पाचक दूध को लेते हुए मिलावट और बदलते समय पर करारा प्रहार किया है।
बुलाकी शर्मा को आरंभिक प्रसिद्धि व्यंग्य ‘बजरंगबली की डायरी’ से मिली जो उनके हिंदी व्यंग्य संग्रह ‘दुर्घटना के इर्द-गिर्द’(1997) में संकलित है। इसी व्यंग्य का परिवर्तित-परिवद्र्धित रूप उनके व्यंग्य संग्रह ‘इज्जत में इजाफो’ (2000) में भी देखा जा सकता है। इसी क्रम में यहां उल्लेखनीय है कि उनकी प्रसिद्ध व्यंग्य-कथा ‘प्रेम प्रकरण पत्रावली’ व्यंग्य और कहानी दोनों रूपों में संकलित है। दो विधाएं हैं तो इनके दोनों के अपने अपने अनुशासन भी हैं किंतु बुलाकी शर्मा इन दोनों के मध्य के यात्री हैं। वे अक्सर कहानी में व्यंग्य लिखते हैं और व्यंग्य में कहानी। इस का अनुपम उदाहरण उनका व्यंग्य ‘पूंगी’ है। वे आरंभ तो इसे निबंध के रूप में करते हैं-‘साब अर सांप री रासी एक है, बियां ई दोनां री तासीर ई एकसरीखी हुवै।’ किंतु बहुत जल्द वे इसे साहब और उनके चापलूस कर्मचारी की कहानी में बदल देते हैं। अत: कहना चाहिए कि कहानी उनके अनुभव में है और व्यंग्य उनके विचार में है। उनका यह रूप किसी पाठक को नहीं अखरता। जब उन्हें विधाओं के खानों में स्थिर करने का प्रयास किया जाता है तब भी वे वहां स्थिर नहीं किए जा सकते हैं। कहानी उनसे व्यंग्य-निबंध के प्रभाव से मुक्त होने की अभिलाषा रखती है और व्यंग्य की यह अपेक्षा है कि वे कथात्मकता से मुक्त होकर निबंध में हाथ आजमाएं। फिलहाल वे इन दोनों ही स्थितियों से परे स्वयं को कहानी और व्यंग्य के साझा क्षेत्र में स्वयं को पाते हैं।
कहानीकार मालचंद तिवाड़ी ने लिखा है- ‘पूंगी अपने समग्र प्रभाव में एक बेधक और मारक व्यंग्य होते हुए भी अपनी रोचकता आख्यानात्मकता के बल पर कहानी के शिल्प में बुलाकी शर्मा की गहरी पकड़ का साक्ष्य है। बुलाकी शर्मा की राजस्थानी रचनाएं पढ़ते हुए रूसी कथाशिल्पी अंतोन चेखव और हिंदी के कालजयी व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई याद आते हैं तो उसका कारण यही है कि विडम्बना या ‘आयरनी’ की पहचान और उसके रचाव का प्रत्यक्ष विकास बुलाकी शर्मा छोटे-छोटे आख्यानों के जरिये सामने रखते हैं।’
‘इज्जत में इजाफो’ में राजस्थानी भाषा, साहित्य और साहित्यकारों पर व्यंग्य लिखे गए हैं। बुलाकी शर्मा के लेखन-संसार में किसी को कोई माफी नहीं है वह भले वे खुद हों या अन्य कोई। ‘थे चिंता करो’ में राजस्थानी भाषा की मान्यता से जुड़े मसले को लेखक ने तटस्थता से देखा है और जहां कमियां और न्यूनताएं हैं उन पर बेबाकी से जैसे अपना मत भी प्रस्तुत किया है। यह सारी चिंता और चिंतन व्यंग्य के स्तर पर उनका अपनी भाषा और साहित्य के प्रति प्रेम ही है। ‘सियाळो अर साहित्यकार’, ‘गुपतज्ञान’, ‘टाळवीं रचना भेजूं !’ अथवा ‘साहित्य सूं सरोकार’ व्यंग्य हों, वे अपने और समकालीन लेखकों की प्रवृत्तियों को जिस भाषा में एक एक कर उधेडऩा आरंभ करते हैं, वह देखते ही बनता है। व्यंग्य ‘सियाळो अर साहित्यकार’ की इस पंक्ति को देखें- ‘अबकी तो थांरी लाऊ-झाऊ टक्कर में है।  लागै बाजी मार लेसी।’ एक लेखक दूजै रै काळजै रो ऑपरेशन करर साची बात काढण सारू मिठास री सूंघणी सुंघावै।
यहां बुलाकी शर्मा का भाषिक चमत्कार है कि वे पुस्तक का नाम लाऊ-झाऊ और फिर आगे पांगळी जैसे प्रस्तुत करते हुए प्रवृत्ति की सांकेतिकता को जोड़ देते हैं। एक लेखक ने दूसरे लेखक के कलेजे से सच निकालने के लिए मिठास की सूंघनी और ऑपरेशन जैसे घटक व्यंग्य की मूल व्यंजना को जैसे द्विगुणित कर देते हैं। उनकी अन्य व्यंग्य रचनाओं में गुरु-टीचर, पुरातन-नवीन संस्कार, भक्ति-दर्शन-पुराण आदि के साथ बुद्धिजीवियों का चिंतन भी केंद्र में रहा है।
संपादक-कवि नागराज शर्मा सच ही कहते है- बुलाकी शर्मा व्यंग्य विधा के महारथी, राजस्थानी के सारथी और मानव-मनोविज्ञान के पारखी हैं।
०००००

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें