09 जून, 2017

डुबाने और डूबने वाले

ह मेरी सज्जनता है कि वे घर आए तो मैंने उन्हें ससम्मान ड्राइंगरूम में बैठाया और चाय-पानी का ना केवल भी पूछा बल्कि अपनी सज्जानता को पूरा-पूरा बरकरार रखा। यह मेरी सज्जनता का दंड था कि मैं उनकी कविताई सुन रहा था। वे बोले- ‘रहीमन किताब राखिए, बिन किताब सब सुन। साहित्य गए ना ऊबरे, धोती-चोला-खून।’ मैंने सिर पकड़ लिया और मुस्कुरा कर बोला- ‘मैं तो व्यंग्य लिखता हूं। कविता की समझ जरा कम है। आप समझाएं मतलब क्या है?’ उनकी विजयी मुस्कान थी और मैं पराजित सा उनके यातना-शिविर में सिर झुकाएं सुन रहा था।
पहले तो वे मेरी समझ पर सकुचाए और फिर शर्म-संकोच छोड़ कर जैसे मैदान में उतर गए। वे बोले- ‘रहीम मेरा दोस्त है। यहां मैंने रहीम को संबोधित कर के हिंदु-मुस्लिम एकता को पहले ही शब्द में उजागर कर दिया है। रहीम को किताब रखने का कह रहा हूं क्यों कि रहीम मेरा दोस्त है। आप तो जानते ही हैं कि उनके परिवारों में साक्षरता दर कम है। इससे यह भी हो गया कि विकास के लिए पढ़ना बहुत जरूरी है। बिना किताब के सब कुछ सुना तो जा सकता है पर पढ़ना हो तो किताब को सुनना चाहिए। यहां लिखा तो सुन है पर इस सुन में सुना और सुनाओ का भाव भी भरा हुआ है। रहीम को किताब दो और वह किताब से पाठ याद कर के सुनाएगा। हम सब को यह पंक्ति संदेश देती है कि हम सब को रहीम का पाठ सुनना चाहिए। आगे की पंक्ति तो बहुत सरल है। आप जान ही चुके होंगे कि साहित्य में जो डूब गया समझो गया काम से। वह ऊबर नहीं सकता अर्थात साहित्य से कोई आज तक बाहर नहीं आया। अब देखिए मैं लिखने लगा तो लिखता ही गया हूं, क्या मेरा लिखना रुक सकता है। जो एक बार साहित्य का हाथ पकड़ लेता है तो आगे साहित्य ही उसका हाथ पकड़े रखता है।’
मैंने गर्दन हिला कर अपनी सहमति प्रकट की और ‘धोती-चोला-खून’ के विषय में जानने की जिज्ञासा प्रस्तुत की तब वे अपने आनंद को द्विगुणित करते बोले- यहां धोती गांधी का प्रतीक है। मैं खुद को ना तो संभाल सका और ना ही अपने मुख को रोक सका, बोल पड़ा- गांधीजी का प्रतीत यहां कैसे।
उन्होंने शंका का समाधान करते हुए कहा कि पहली बात तो गांधी जी भी चाहते थे कि राम रहीम पढ़े। एक साथ पढ़े। देश में अखंडता और एकता हो। यह धोती वाली बात साहित्य में डूबने वाले ही समझ सकते हैं। चोला और खून प्रतीक है हमारे देश की गरीबी और संघर्ष का। चोला शब्द के आते ही यहां धोती में ओ की मात्रा और चोला में ओ की मात्रा का सुंदर अनुप्रास देखिए और वैसे भी जब धोती है तो चोला भी जरूरी है। क्या कविता में बिना चोले के नग्नता मैं दिखा सकता हूं और वह भी रहीम के सामने! रहीम के घर पढ़ाई के संदेश में चोला हमारी सभ्तता की निशानी है। खून रहीम का और मेरा-आपका सबका एक है।
यह सब तो ठीक था और इतनी त्रासदी मैं झेल गया पर आगे की बात ने मेरे होश उड़ा दिए। वे महान कवि कह रहे थे कि उन्होंने इस रचना को फेसबुक स्टेट डाला और पंच काका ने लिखा- अच्छी कविता, सधि कविता। साधुवाद। आप कविता को बचाए रख रहे हैं, बाकी तो उसे डुबाने की जुगत में लगे हैं। वे सज्जन कह रहे थे कि उन्होंने वैसे तो फेसबुक पर काका का आभार प्रकट कर दिया फिर मन नहीं भरा तो उन्होंने सोचा कि व्यक्तिशः आभार दे दिया जाए और वे चले आए। मैंने उनका आभार लेकर रख लिया और कह दिया कि काका आएंगे तब दे दूंगा आभार। मेरी सज्जनता धोखा दे उससे पहले मैंने उन्हें विदा कर दिया। इस उच्च कोटी की कविता में मुझे डुबाने और डूबने वाले हे पंच काका! माफ करें, आपका व्यंग्य हर कोई समझ नहीं सकता।
० नीरज दइया

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