20 फ़रवरी, 2017

पत्नियां, पार्टियां और पटरियां

त्नियां, पार्टियां और पटरियां की राशि एक है। पत्नी के विषय में किसी को क्या संदेह हो सकता है कि वे जानदार होती हैं। पार्टियों में जान फूंकनी पड़ती है। पटरियां ना जानदार होती हैं और ना ही उन में जान फूंक कर जानदार बनाया जा सकता है। वे बेचारी बेजान होती है। हर फूंक से बेअसर रहती हैं। पत्नियों और पार्टियों के पटरियों पर चलने के विषय में आपका क्या मत है? मैं समझता हूं कि पटरियों पर पत्नी हो या पार्टी, किसी को भी चलना-चलाना सरल बात नहीं होती। दूसरी तरफ अगर आप ने अगर अपनी या किसी की भी पत्नी के विषय में पटगरियों के संबंध में कोई भी बयान दे दिया तो आपकी खैर नहीं है। बेहतर यह है कि पत्नियों और पर्टियों के विषय में पटरी पर होने या उतारने की घोषणा गोपनीय रखी जाए। इसी में लाभा है कि ऐसी किसी भी प्रकार की गतिविधि को देख कर भी अनदेखा किया जाए। आपने भूल कर अपनी पत्नी को कह दिया- तुम पटरी पर चल रही हो, अथवा कह दिया- तुम पटरी पर नहीं चल रही, तो दोनों स्थितियों में कलह का प्रबल योग है।
          मैं केवल पतियों की बात नहीं कर रहा, इसे आप अपने या दूसरे के पति पर प्रयोग के रूप में अजमा कर देख लें- तुम पटरी पर चल रहे हो अथवा तुम पटरी पर नहीं चल रहे, कहना मूर्खता है। पति-पत्नी दोनों शब्दों की राशि एक है और ऐसे संवाद दोनों को बिदकाते हैं। अस्तु यह संबाद कहना-सुनना खतरनाक और हानिकार समझा जाए। सोचिए कि जब खुद के घर में नहीं कहा जा सकता, तो बाहरी सदस्य के लिए प्रयोग कर लिया गया तो बड़ा चक्कर चल जाएगा। पटरी पर होने या न होने से भी खतरनाक है- पटरी पर नहीं होना पाया जाना अथवा पकड़े जाना। आज ऐसा कौन है जो दावे के साथ कह सके कि मैं पटरी पर हूं। न पति पटरी पर है और न पत्नियां, फिर पार्टियों की तो बात ही छोड़ देनी चाहिए। पार्टियों के लोग पार्टियां बदलते रहते हैं और कभी जब ऐसा संभव नहीं होता, तो अपनी ही पार्टी का नाम बदल लेते हैं। बदलाव की मांग से ही कुछ बदलने की प्रक्रिया आरंभ होती है।
          आगरा के चौधरी बशीर और गजाला लारी बसापा में थे तो मायावती ने शादी कराई थी और सपा में आने के बाद तलाक हो गया। पति-पत्नी और पार्टी बदलने वाले बार बार सोचते हैं कि अब हम पटरी पर हैं, पर पटरियों की माया इतनी सरल कहां होती है। पटरियां भले बेजान हो किंतु वे उन्हीं लोगों के लिए होती हैं जो खुद चलते हैं। राजा भोज की लोककथा की भांति ये पटरियां कहीं नहीं जाती पर इन पर चलने वाले भले इन पे चले या इनके आस-पास चलें, और चलते रहें तो मंजिल पा सकते हैं। जो पटरियों से उतर कर बहुत दूर चले जाते हैं, उसका राम ही मालिक होता है। चौधरी बशीर जी का बीएसपी से समाजवादी पार्टी, उसके बाद कांग्रेस, फिर राष्ट्रीय समानता दल और आखिर में लौटकर फिर बीएसपी में पहुंचना विदित है। विधायक रहे बशीर चौधरी के पास अब न तो पत्नी है और न ही कोई पार्टी।
          पंच काका कहते हैं कि पति-पत्नी को पार्टी कहना ही गलत है, फिर भी वकील इनको दो पार्टियां मानते हैं। इनकी जब आपस में पटरी नहीं बैठती तो ये पार्टियां रेल की पटरियों की तरह जुदा होकर भटकती-भटकाती हैं। 
 ० नीरज दइया

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