07 फ़रवरी, 2017

जे.एल.एफ. में पंच काका

बीएसएनएल के लिए कुछ बंधु कहते हैं- इसका फुल फोर्म ‘भाई साहब नहीं लगेगा’ है। माना कि सही नाम ‘भारत संचार निगम लिमिटेड’ है, पर कुछ इन भाई-बंधुओं और बहनों का क्या करें जो इस लिमिटेड को अनलिमिटेड कर ऐसी घुसपैठ करते हैं। सच में ऐसी मेधा पर आश्चर्य होता है। नाम का संक्षिप्त रूप और उसका वितारित रूप कुछ का कुछ बनाना कोई बड़ी बात नहीं है। बड़ी बात है कि नाम का बंटाधार कर देना। यह कल्पना शक्ति का कमाल है कि कुछ का कुछ करना उनके लिए सहज होता है। जब जयपुर-साहित्योत्सव को एक लेखक ने ‘गधों का मेला’ कहा, मुझे उनकी अनलिमिटेड मेधा पर ईर्ष्या हुई। ऐसा उन्होंने जब सोचा और लिख कर बुद्धि-प्रदर्शन किया तो कुछ दूसरे लेखक भी कहां चूकने वाले थे। जो लेखक मेले में बुलाने से चूक गए, वे सभी बुलाए गए लेखकों को गधे कहने पर मुंडी हिलाने लगे। इसके साथ ही तीसरे किस्म के लेखकों का एक सवाल आया- जनाब, हजूरेआला आपको जब वहां बुलाया गया और आप गए भी थे, तब क्या वह गधों का मेला नहीं था। जाहिर है यह आपका पराक्रम रहा होगा कि सारे गघे उस समय घोड़े नजर आ रहे होंगे। इंसान आजकल रूप बदलने में माहिर है। वैसे कहा जाता रहा है कि इंसान असल में जानवर ही था और अनेक घटना-प्रसंगों के हवाले उसमें अब भी भीतर का जानवर यदा-कदा प्रगट होता रहता है। कभी-कभी इंसान कुत्ता-कुतिया बनता है, तो कभी-कभी भेड़िया और चींटियां। ये अलग अलग रंग-रूप धारण करने वाले इच्छाधारी इंसान है। ऐसा भी हो सकता है कि कोई ऐनक इजाद हो गया हो कि गधों वाले ऐनक को लगाने से सभी इंसान गधे दिखाई देने लगे। जे.एल.एफ. में पंच काका भी गधों की भीड़ में शामिल दिखाई दिए।
          गधे को गधा कहना चाहिए पर जो गधा नहीं हो उसे क्या गधा कहना चाहिए? गधे को इंसान अथवा इंसानों को गधा कहना दोनों का अपमान है। इंसान गधा कैसे हो सकता है, और गधा इंसान कैसे हो सकता है? जाहिर है कि नई ऐनकी-विद्या यानी आंखों पर ऐनक लगाए रखने की विद्या है, जिससे कोई ऊंट बन सकता है और कोई शेर-बिल्ला या फिर बिल्ली बन सकता है। कुता-कुत्तिया और गधा-गधी का असली रूप ऐनक उतार कर ही देखा जा सकता है। ऐसे बड़े बोल बोलने वाले बिल्ले और बिल्लियां जरा बरसात अथवा पानी से बच कर रहें। अगर वे बरसात में भीग गए तो उन्हें देखते ही सब भीगा बिल्ला या भीगी बिल्ली कहेंगे। इन जंतुओं का भीगना और किसी के सामने से आना-भागना अशुभ अपशुगन माना जाता है। पंच काका को जब किसी ने जे.एल.एफ. को गधों का मेला कहने का किस्सा सुनाया तो वे तपाक से बोले- ओह वह खुद तो ऊंट है। उससे खुद अपनी तो संभलती नहीं, संभली नहीं गई और अब काचर का बीज बना सौ मण दूध फाड़ना चाहता है। भैया, जे.एल.एफ की इतनी भीड़ सिद्ध करती है कि किंगफिशर और दोस्तों के साथ विश्व साहित्य से जुड़ने की गजब की चाहत युवाओं में है। वे अपने साथी और समूह के साथ विभिन्न रसों का आस्वाद लेते हैं। एक साथ समानान्तर चल रहे सारे सत्र तो कोई देख नहीं सकता, इसलिए सूंधने वालों की भरमार है। इंटरनेट फ्रेंडली है तो सब देखो घर बैठे और घर बैठे उपलब्ध नहीं है तो वह है सेल्फी और फोटो-सुख। सेल्फी का चसका ऊपर से लेकर नीचे तरफ यहां चमचमाता है। असल में फोटो में चमचमाना और नहीं चमचमाया ही जे.एल.एफ. की माया और चर्चा का कारण है।
 नीरज दइया

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