10 फ़रवरी, 2017

बटज की गड़बड़ -हड़बड़

ब बजट आ रहा है। बजट का आना और जाना फिक्स है। देश में चुनाव भी होने हैं। चुनाव का होना और कब होना कोई फिक्स नहीं होता है। चुनाव और बजट का अपना-अपना समय होता है। दोनों ही लोकतंत्र के बड़े मेहमान हैं। समस्या तब होती है जब दोनों साथ-साथ आते हैं। वैसे अलग अलग आते हैं तो भी दूसरी समस्याएं होती हैं। समस्या से रहित ना चुनाव होता है और ना ही बजट। देश की त्रासदी है कि समस्याएं इतनी हैं कि कोई आए तो समस्या, नहीं आए तो भी समस्या। अगर देश में चुनाव नहीं आए तो बड़ी समस्या हो जाएगी विपक्ष वालों के लिए। अगर आ जाए तो उससे भी बड़ी समस्या है। क्या होगा क्या नहीं का चिंतन होता है। यही हाल बजट का है। फिलहाल समस्या यह सवाल है कि चुनाव से पहले बजट क्यों आ रहा है?
          बजट और चुनाव का सीधा संबंध है। कहने वाले कहते हैं इन दोनों का सीधा-संबंध गलत संबंध है। बजट के बिना चुनाव नहीं होता, और चुनाव इसलिए होता है कि बजट ठीक-ठाक किया जा सके। बजट का चुनाव में और चुनाव में बजट का खेल निराला है। चुनाव और बजट ही दो ऐसी बालाएं नहीं, बलाएं है जो पूरे देश को डांस करवाती है। इतना हो-हल्ला होता है कि सुस्त से सुस्त आदमी भी हाथ पैर मारने लगता है। देखने वालों को डूबता हुआ आदमी भी नृत्य करता हुआ दिखाई देता है। चुनाव के समय देश के डूबने और उसे बचाने की चिंता रहती है। कल की बात है कि श्रीमती जी ने बड़े प्यार से कहा- सुनो जी, ये जो इस बार बजट आ रहा है। इसे ध्यान से देखना। सब कुछ एक बार सस्ता हो जाएगा, क्यों कि चुनाव से पहले सरकार जनता को खुश करेगी। आप भी मुझे खुश करना। मैं ठहरा भोला-भाला कि पूछ बैठा कि क्या अभी तुम दुखी हो? खुश ही तो हो। सब कुछ है तुम्हारे पास। वह बोली- अरे आप तो बिल्कुल नहीं समझते। मेरे कहने का मतलब यह है कि जो जो चीजे सस्ती हो जाएं, वे सभी बिना देरी किए हम खरीद लेंगे। पत्नी के इस प्यार की केवल मेरी समस्या नहीं है, सभी ग्रसित हैं। अखिर भारतीय समस्या है कि पत्नियों की खरीददारी कभी खत्म नहीं होती। वे बार बार पतियों को बाजार ले जाती हैं, बाजार भेजती है और अब तो ले जाने और भेजने का झंझट ही खत्म हो गया है। ऑनलाइन ने ऐसी वला की गाज गिराई है कि सुबह अच्छा भला पति घर से बाहर कमाने जाता है और शाम को लौटता है तो देखता है कितनी क्या नई-नई खरीददारी हो गई है। बजट से पहले ही सरे बजट की टें बोल चुकी है।
          पंच काका कहते हैं कि इस बार बजट में ऐसा बाजा बजने वाला है कि दुनिया भर का बाजार भारतीयों का कचूमर निकाल कर ही दम लेगा। पहले बाजार जाते थे तो घर से तय करके निकलते थे कि क्या लेना है? कितनी हमारी औकात है? अब तो सारी औकात ऑनलाइन को मालूम है। ऐसा सुखी बनाया कि सारी कैशलेस दुनिया से पूरा बाजार घर में घुस आया है। ऐश ने नाम पर ऐश चौपट हो रही है। ऑनलाइन और कैशलेस दुनिया में दिन गिन-गिन के निकालने के सिवाय कोई चारा नहीं है। बटज की गड़बड़-हड़बड़ तो होगी तब होगी, यहां तो नित्य गड़बड़-हड़बड़ झेल रहे हैं।
नीरज दइया

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