17 फ़रवरी, 2017

खाने-पीने की शिकायत

बिना खाए-पीए कोई जिंदा नहीं रह सकता। जिंदा रहने के लिए खाना-पीना बेहद जरूरी है। अब यह बात अलग है कि कोई आटे में नमक जितना खाता-पीता है और कोई नमक को छोड़ कर केवल आटा खाता है। आटे और नमक का रिस्ता ही कुछ ऐसा है कि इनके कुछ ऐसे भी दिवाने हैं कि आटा और नमक दोनों ही खा जाते हैं। किसी के लिए कुछ नहीं छोड़ने पर समस्याएं आरंभ होती है। कहते हैं कि कोई आटे में नमक जितना खाए तो जायज बात है और जो खाने का अनुपात बिगाड़े यानी आटे जितना खाए तो वह बड़ा हिम्मत वाला शेर दिल होता है। उसके फसने की संभावनाएं अधिक रहती है। यह तो पूरे मरने जैसा काम है कि सब कुछ खा जाएं। बुजुर्ग कह गए कि खाना-पीना सदैव छिप कर होना चाहिए। सभी चुपचाप खाने में विश्वास रखते हैं। अपने-अपने नियम है कि कोई खाने से पहले पीता हैं तो कोई खाने के अंतराल को बीच-बीच में पी कर भरता है। कुछ ना खाने के पहले, ना बीच में और ना ही बाद में पीते हैं। पीने से दूर रहने वाले बहुत है, तो ऐसे भी हैं कि कुछ पीने को मिल जाए तो खाने की छुट्टी। जो भी हो किंतु खाना और पीना सार्वजनिक क्रियाएं नहीं है अथवा नहीं होनी चाहिए।
            पीने के छूट हर किसी को नहीं होती, किंतु जवानों को तो पीने का परमिट मिला होता है। सेना में नियम इतने कठोर है कि सभी का हाजमा दुरुस्त रहता है। जहां सभी पेच कसे हुए हो तो मशीन कम खराब होती है। अगर वहां किसी का हाजमा खराब हो जाए, तो पुखता इंतजाम है। बी.एस.एफ. का एक जवान अपना तेज फेसबुक पर वीडियो के जरिए जगजाहिर कर देता है। सारी आंखें खुल जाती है। जय जबान और जय किसान का सच सामने आ चुका है। किसानों की तो पहले से ही दाल पतली थी। वे तो दाल को खाते हैं और जहां पीने का मन हुआ तो दल को ही पी लेते हैं। सभी ऐसा सोचते थे कि जवानों तो खाने-पीने की ऐश है। वे मजे से है। देश के रक्षक और सुरक्षा-प्रहरी या हमारे अन्नदाता किसान दोनों ही मोर्चे बेहद जरूरी है। आजाद देश में कोई कुछ भी करता है तो उस पर नियम-कानून और अनेक धाराएं हैं। अब अगर आपका दिल कमजोर है और काबू में नहीं रहता तो अपराधियों को अच्छा खाना दे दिया। ऐसा नहीं करना था यह तो शिकायत का मामला बनता है।
            ना खाने की शिकायत होनी चाहिए और ना खिलाने की। ना पीने की शिकायत होनी चाहिए और ना पिलाने की। यानी खाने-पीने की शिकायत नहीं होनी चाहिए। खाना-पीना तो सब जगह चलता रहता है। सरे-आम नहीं तो चोरी-छिप्पे। जिनको खाना-पीना है, वे खाएंगे-पिएंगे और जिनको रोना-धोना है वे रोएंगे-धोएंगे। दुष्यंत ने माकूल लिखा था- “न हो कमीज तो पांवों से पेट ढक लेंगे, ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफर के लिए।” पर अब लगता है कि जो लोग मुनासिब थे कूच कर गए। अब समय बदल गया है और लोग अपना पेट ऐसे-वैसे नहीं ढकते। पंच काका कहते हैं कि अपना देश अजीब है। यहां खाने-पीने पर भी पहरे हैं। लोग पीने की शिकायत करते हैं। अरे ये तो कुदरत का दिया हसीं इनाम है। इस इनाम को दो नाजुक होंठों से छू लेने दो एंड सिंग विथ मी- छलकाए जाम, आईये आप की आंखों के नाम, होठों के नाम।
नीरज दइया

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