13 फ़रवरी, 2017

पूर्णता की तलाश है अलग-अलग विधाओं में लिखना : डॉ. नीरज दइया

साक्षात्कारकर्त्ता : देवकिशन राजपुरोहित
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हर रचना का जन्म सुख देता है। यह समय और मनःस्थितियों की बात होती है कि एक रचनाकार विविध विधाओं में लेखन करता है। लिखना और अलग अलग विधाओं में लिखना असल में किसी पूर्णता की तलाश है। जो बात एक विधा में नहीं है वह दूसरी में होती है और इस प्रकार बहुत सी विधाएं मिलकर ही एक रचनाकार का सुख निर्मित करती है। सब का अपना अपना महत्त्व है और निरंतर लिखना और सक्रिय रहना असल में किसी स्थाई सृजन-सुख की लालसा है। यह कहना है केंद्रीय साहित्य अकादेमी से बाल साहित्य में पुरस्कृत कवि, कहानीकार, अनुवादक, संपादक और आलोचक डा. नीरज दइया का। जो उन्होंने देवकिशन राजपुरोहित से बातचीत में व्यक्त किया।
- राजस्थानी की नई कविता परंपरागत कविता से अलग क्यों हो गई है?
० हरेक विधा और रचना का अपना एक युग और कालखंड होता है। परंपरागत कविताओं की जड़ें ही नई कविता को पोषित करने वाली रही है। समय के साथ प्राथमिकताएं और चुनौतियां बदले हुए रूप में सामने आती है। नई कविता में भी परंपरागत कविता का सौंदर्य नाद और शब्द विन्यास में देखा जा सकता है।
- आपकी आलोचक के रूप में पहचान बानने के क्या कारण रहे?
० मैं नहीं जानता और मानता भी नहीं कि आलोचक के रूप में मेरी पहचान बनी है या नहीं बनी है। यह मेरा काम नहीं है। मेरा उद्देश्य आलोचना में रचना की पहचान करना रहता है। मेरा काम तो बस आलोचना को सृजन जैसे रचना है। मैंने प्रयास किया है कि मैं प्रामाणिकता के साथ अपनी रचना का अहसास बटोरते हुए कुछ तथ्यात्मक और मूलभूत बातों को समझने का प्रयास कर सकूं। इस क्षेत्र में हमें बहुत काम करना होगा।
- मौलिक लेखन के साथ अनुवाद का कार्य कहीं मूल लेखन में बाधा तो नहीं बनाता ?
० अनुवाद से बहुत कुछ सीखने-समझने को मिलता है। असल में अनुवाद जहां भाषाओं में मध्य पुल का कार्य करता है वहीं अनुवादक को नए नए वितान और अनुभव प्रदान करता है। ‘सबद-नाद’ जैसी कृतियों से हम पूरी भारतीय कविता थोड़ा-सा अहसास पा सकते हैं। भारतीय भाषाओं के अलग अलग स्वरों को जानने-समझने के लिए अनुवाद ही एक मात्र रास्ता है।
- इन दिनों हिंदी में खूब व्यंग्य लेखन कर रहे हैं? ऐसा क्यों? क्या राजस्थानी लेखन से मन भर गया है, जो हिंदी में लिख रहे हैं।
० राजस्थानी म्हारै रगत रळियोड़ी है सो रक्त में घुली हुई भाषा से मन कैसे भर सकता है। राजस्थानी लेखन के साथ हिंदी में लिखना गलत तो नहीं है। हां गलत तब है जब लिखें तो हिंदी में और लाभ के लिए उसे ही अनुवाद कर मूल के रूप में राजस्थानी में प्रस्तुत कर दिया जाए। ऐसे लाभ लेने वाले हिंदी के कुछ रचनाकार हैं। मेरे लेखन में मुझे मेरा लाभ सृजन-सुख लगता रहा है। दैनिक नवज्योति ने मुझे व्यंग्यकार के रूप में लगातार प्रकाशित कर अब जब व्यंग्यकार बना दिया है तो कुछ इस क्षेत्र में भी बड़ा काम करने की अभिलाषा है।
- अंतिम सवाल राजस्थानी की मान्यता के बारे में।
० राजस्थानी के लिए बीकानेर में मुक्ति संस्था ने संकल्प यात्रा आरंभ की है। मुझे भरोसा है कि मान्यता राजस्थानी को मिल कर रहेगी। भाषा वैज्ञानिक और सभी शिक्षाविदों के साथ जन-जन का समर्थन इसे मिल चुका है।


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