13 अक्तूबर, 2016

जुगाड़ू लेखक का सम्मान

जुगाड़की महिमा निराली है। ऐसे ऐसे जुगाड़ सामने आते हैं कि देख-सुन कर आश्चर्य होता है कि ऐसा तो हमने कभी सोचा नहीं था। आज जब चारों तरफ जुगाड़ तो फिर साहित्य में क्यों नहीं? साहित्य का रोल वर्तमान में समाज ने गोल कर दिया है। साहित्य को समाज का पथप्रदर्शक और मशाल समझने का समय अब गया। अब तो इतने पथ है कि किसी पथ की कमी नहीं, फिर पथप्रदर्शक की जरूरत ही क्या? और ये मशाल वशाल तो पुरानी चीजें है। लाइट की जरूरत हो तो बहुत है हमारे पास और जुगाड़ के रूप में मोबाइल में लाइट है हरदम हमारे साथ। ऐसा पहले नहीं अब भी है कि साहित्य विशाल सागर है। जिसमें अनेक मछलियां और अनेक मगरमच्छ रहते हैं। साहित्य के कुछ तालाब भी है जहां मेढ़कों की एक पूरी फौज है। कुछ बाबाओं का रूप धारण कर खुद को आयोजनधर्मी बनाते हुए इतने चेलों का मुंडन कर दिया है कि पूछिए मत। हर तरफ बस उनकी ही जय-जयकार है। इन आयोजनधर्मी बाबाओं ने इतना जुगाड़ कर दिया है कि रात को किताब लिखो, सुबह पुरस्कार घोषणा। पुरस्कार और सम्मान किसे नहीं भाता? जो पुरस्कार और सम्मान के बारे में नकारात्मक बोलते हैं वे उनका बाहरी दिखावा होता है पर मन में भीतर तो यह लालसा ऐसी घर किए होती है कि वे कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। ऐसे ही एक जुगाड़ू लेखक का सम्मान होने जा रहा था और मुझ से उस पर आलेख मांगा गया। मैंने देखा कि छोटी उम्र में उसने कमाल तो कर दिया था, पर कमाल इतना भी नहीं था कि ऐसा धमाल किया जाए। जुगाड़ू लेखक के पास एक संस्था थी और वह पत्र-पत्रिकाएं भी निकालता था, तिस पर यह कि संस्था से पुरस्कार-सम्मान के आयोजन भी करता था। ऐसे आदमी को सीधे सीधे नाराज करना भला किसे अच्छा लगाता है। हमारे पूरे देश का यह मूल मंत्र है- ‘कोई कुछ भी करें, हमें क्या?’ फिर साहित्य और मैं भला देश-विरोधी थोड़े ही हूं कि इस मंत्र के बाहर कोई आचरण करने लगूं।
       लिखना बहुत आसान है। आप किसी पर लिखें कुछ बातें तो वर्षों पुरानी ही काम आती है। इस क्षेत्र में हमारी प्रगति यह भी है कि ऐसे कुछ आलेख भी तैयार है कि बस आप नाम बदल लें और वह किसी के भी काम आ जाएगा। फलां की जगह फलां नाम आजकल तो कंप्यूटर के तेज युग में पलक झपते ही हो सकता है। कटिंग-पेस्टिंग के इस दौर में जुगाड़ के पौ-बारह पच्चीस हो रहे हैं। कंप्यूटर का यह कमाल कि इतना सारा मैटर भर दिया है कि कहीं झोली फैलाने की जरूरत नहीं। किसी के मान-मनुहार में बीस नखरे उठाएं, इससे तो बेहतर है कि सर्च इंजन पर लिखिए कि आपको क्या चाहिए। और जिन्न की तरफ कंप्यूटर-स्क्रीन पर सब कुछ हाजिर हो जाता है। इसमें शर्म-संकोच करने की जरूरत नहीं है। आपके मन की दबी हुई सभी लालसाएं भी यहां फलीभूत हो सकती है। हुआ यह कि मैंने भी जुगाड़ू लेखक के सम्मान में प्रकाशित होने वाली स्मारिका के लिए आलेख का जुगाड़ कर लिया और जैसे ही भेजने वाला था कि मेरा अंतर्मन जाग उठा। मेरा अंतर्मन वैसे तो सदा सोया रहता है पर जब से घर में पंच काका आ गए हैं तब से वे कभी-कभार ऐसा कुछ कह देते हैं कि अंतर्मन की नींद खुल जाती है। बात नुकसान-फायदे की नहीं, बस मन की बात है कि मेरा मन जाग गया है। पंच चाचा ने कहा- ‘जुगाड़ू-सम्मान में आपने नाम को जोड़कर क्यों खराब करते हो। जो कुछ तुम्हारी गरिमा है, उसे बचाए रखो। जुगाड़ू के लिए तो तुमने नहीं लिखा तो वह तुम्हारा भी जुगाड़ कर लेगा।’

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