20 अक्तूबर, 2016

मुझे ‘भूत’ बना दो

सुबह-सुबह कॉल-बेल बजी तो लगा कोई आया है। देखा तो एक सज्जन कुर्ता-पायजामा धारण किए चप्पल पहने और झोला लटकाए बाहर खड़े थे। देखते ही बोले- ‘पंच चाचा।’ मैंने कहा- ‘हां अंदर है, आएं।’ वह होले-होले कदम बढ़ते मेरे पीछे-पीछे कमरे तक पहुंचे और कमरे में पंच चाचा को देखते ही उनके चरणों में झुक गए। पंच चाचा बोलो- ‘अरे बैठो-बैठो।’
      मैं कमरे से बहार निकलने वाला ही था कि ‘मुझे भूत बना दो।’ उस झोलाछाप के शब्दों को सुन वहीं रूकने का निश्चय किया। सोचा यह कौन पागल है जो भूत बनना चाहता है। पंच चाचा ने कभी ऐसा भी नहीं बताया था कि वे किसी को भूत बनाने की कला भी जानते हैं। मैं वहीं पास बैठ गया देखें अब चाचा क्या कहते हैं? पंच चाचा बोले- ‘क्यों भाई तुम भूत क्यों बनना चाहते हो?’
      वह आदमी बोला- ‘जीवन में जो कुछ नहीं कर सका, वह अब भूत बन कर करने की इच्छा हो गई है। घर-परिवार और बीबी-बच्चों से परेशान हूं, कोई कहना नहीं मानता। भूत बन कर सब को सीधा कर दूंगा।’ पंच चाचा मुस्कुराए, बोले- ‘अच्छा। ऐसे कैसे सीधा कर दोगे? तुम्हें पता है भूत तो खुद ऊलटा होता है और जब तुम भूत बन जाओगे तुम्हें सभी जो यहां ऊलटा है सीधा दिखेगा और जो सीधा है वह ऊलटा दिखेगा।’
      ‘चाचा अच्छा किया जो आपने पहले बता दिया। वर्ना मैं भूत बन कर सब ऊलटा-पुलटा कर देता। अब ठीक है। जो सीधा दिखेगा, उसी को मैं सीधा करूंगा।’ उस आदमी के कहते ही चाचा अपने स्थान से उठ खड़े हुए और उसका हाथ पकड़ करा अपने हाथ में ले लिया। मैं हैरान कि चाचा को क्या हो गया। ऐसा पहले तो कभी हुआ नहीं था। वे देर तक चुपचाप उसके हाथ को थामे मौन साधे रहे फिर बोले- ‘अभी तुम्हारा भूत बनने का समय नहीं आया है।’ उसका हाथ छोड़ चाचा अपने स्थान पर जाकर बैठ गए और मेरे तरफ देख कर बोले- ‘पानी तो पिलाओ।’
      मैं बेमन से उठा यह सोचते हुए कि न जाने पंच चाचा उस से क्या कुछ मेरी अनुपस्थिति में कह डाले और मैं सुनने से वंचित रह जाऊं। मैं जल्दी-जल्दी पानी लाने की फिराक में यह गया और यह आया की स्थिति पाना चाहता था। सच में अब तो मेरी भी इच्छा हो रही थी कि पंच चाचा से कहूं- ‘मुझे भूत बना दो।’ अगर मैं भूत होता तो वहीं बैठे-बैठे हाथ लंबा करता और पानी की व्यवस्था कर देता। मैं भूत नहीं था फिर भी भूतों सी जल्दबादी तो मेरे भीतर थी। मैं जब पानी लेकर वापिस आया देखा कि वह आदमी जोर-जोर से रो रहा था और पंच चाचा जोर-जोर से हंस रहे थे।
      मैंने दोनों को जैसे टोकते हुए कहा- ‘पानी।’ दोनों यकायक चुप हो गए। पानी पीकर वह आदमी और पंच चाचा मेरी तरफ देखने लगे तो मैंने कहा- ‘क्या? आप हंस और यह भाई साहब रो क्यों रहे थे?’
      पंच चाचा बोले- ‘देखा, मैंने कहा था कि नहीं। यही तो भूत है जिसे हम पाना चाहते हैं। तुम यहां नहीं थे तो तुम्हारा भूत था यहां। उसने सब देखा-सुना पर वह तुम को नहीं बता सकता। मैं कहता हूं हम सब के अपने अपने भूत है जो हमारे भीतर-बाहर रहते हैं। हम सब हमारे अपने भूतों के साथ रहते हैं। हम सब की समस्या यह है कि हम उल्टे को सीधा करने की सोचते रहते हैं। उल्टे को सीधा करना सरल नहीं है। सरल है सीधे को सीधा करना। मतलब अगर हर कोई उल्टे को सीधा करने में लग गया, तो सीधा हमारे हाथ से चला जाएगा और वह भी उल्टा हो जाएगा। सीधों को सीधा रखो भैया।’

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें