15 अक्तूबर, 2016

राजस्थानी कहानी : देश बिराना है

मूल : नवनीत पाण्डे
अनुवाद : नीरज दइया
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कहानीकार का परिचय : 
 नवनीत पाण्डे जन्म: 26 दिसम्बर, 1962 बीकानेर, राजस्थान। राजस्थानी और हिंदी में समान गति से लेखन। प्रमुख कृतियाँ : हेत रा रंग (कहानी संग्रह) माटी जूण (उपन्यास) और बाल साहित्य की कई पुस्तकें राजस्थानी में। सच के आस पास’, ‘छूटे हुए संदर्भ’ और ‘जैसे जिनके धनुष’ (हिंदी कविता संग्रह) प्रकाशित। राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी एवं राजस्थान साहित्य अकादमी से सम्मानित।
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    बात छोटी-सी है कि सरकारी कॉलोनी में क्वाटर आवंटित हो गया है। इस छोटी-सी बात को घर में बताना कितना कठिन है। पिताजी क्या सोचेंगे? बड़े भाई साहब क्या कहेंगे? और मां- वह तो बस.. जैसे सुनते ही रोने लगेगी। कोई रास्ता नहीं, कुछ तो करना ही होगा। सभी को खुश रखना भी जरूरी है। आज ही श्याम बाबू कॉलोनी जाकर आएं हैं, कितने सुंदर क्वाटर्स बने हैं। सभी तिमंजिले, किसी फिल्मी तिलस्म से लुभाते। हरेक में बॉलकोनी और सामने लंबी-चौड़ी सड़क। कितनी खुश होगी सुशीला। उनको सुशीला पर जैसे दया आई- बेचारी! क्या सुख मिला उसे। सुबह-सवेरे सब से पहले उठना, उठते ही चौका-बर्तन। मां-पिताजी, भैया-भाभी और विमला की चाकरी करना, उनको खुश रखना और सांझ ढले थक-हार कर सोने का इंतजार करना। ‘कितने दिन गुजर गए उसे मुझसे बात किए हुए..!’ यह सोच श्याम बाबू अनमने-से हो गए। सुशीला से बतियाए उनको पूरे दो सप्ताह हो गए। इस बीच एक रात को पूरा घर सो गया तो श्याम बाबू उसके करीब पहुंचे तो वह नींद में थी और अचानक किसी को आया देख बेहद डर गई, श्याम बाबू ने कितने मुश्किल से समझाया कि मैं तेरा पति हूं। सात फेरे लिए हैं साथ। उठाकर नहीं लाया। लेकिन वह पत्त्थर कहां समझी। बस- ‘मां उठ जाएगी, विमाला दीदी जाग जाएंगी’ की रट लगाए श्याम बाबू को दूर करती रही। गुस्सा तो बहुत आया पर क्या करते कोई रास्ता नहीं था। अगले ही दिन सरकारी क्वाटर के लिए आवेदन किया और हाथों-हाथ आवटंन भी करवाया। ऐसा कर इतनी खुशी हुई कि शायद ही पहले किसी दिन हुई होगी।
    - क्या बात है, आज गुमसुम कैसे बैठे हो? तबियत तो ठीक है? पिताजी ने पूछा।
    - नहीं कुछ नहीं। श्याम बाबू सवाल सुनकर हकबका गए। बात तो थी और कहना भी चाहते थे किंतु कैसे कहे? पिताजी जैसे स्थिति समझ गए या अपने बेटे का मन पढ़ लिया हो। बोले- कुछ तो है..।
    - बात यह है कि पिताजी.. । बाहर आते आते फिर बात कहीं भीतर अटक गई।
    - बोलो-बताओ। मन पर कोई बोझ नहीं रहना चाहिए। पिताजी ने पीठ पर हाथ फिराते हुए हिम्मत दी।
    - मुझे सरकारी क्वाटर मिल गया है। श्याम बाबू ने जैसे एक ही सांस में भीतर धधकता लावा जैसे उगल दिया।
    - क्या? पिताजी का हाथ जहां था वहीं जड़ हो गया और श्याम बाबू तो जैसे उस बोझ से धरती में धसे जा रहे थे। बेबस थे कहना तो था ही, आज नहीं तो कल।
    - हां S.. पिताजी, कितनी तकलीफ होती है हमें यहां। इतने बड़े परिवार में देखिए इन तीन छोटे-छोटे कमरों से क्या होता है। ना तो ढंग से बैठ सकते हैं और ना रह सकते हैं। श्याम बाबू ने जैसे सफाई दी।
    - पर आज ही ऐसी कौनसी बात हो गई। हमारी तो पुश्तें कट गई यहीं इन कमरों में। क्या तकलीफ है तुम्हें यहां? अलग कमरा चाहिए तो बता, बनवा देता हूं। पिताजी शांत दबे स्वर में बोले।
    - नहीं-नहीं, मैं तो बस...। श्याम बाबू आगे कुछ बता नहीं सके।
    - लोग क्या कहेंगे? रिस्तेदार क्या सोचेंगे। पिताजी लड़खड़ाए स्वर में बुदबुदाए।
    इसी बीच मां और भैया भी आ गए।
    - श्याम अलग होना चाहता है। पिताजी लंबी सांस लेकर बोले।
    - श्याम अलग होना चाहता है। मां और बड़े भैया ने एक साथ दोहराया। भीतर कमरे में ऐसी ही फुसफुसाहट विमला और भाभी की सुनाई दी।
    - बता क्या कुछ बात हो गई? किसी ने कुछ कहा तो अभी फैसला हो जाएगा। बड़े भैया ने कहा।
    - हां कोई बात है तो बता .. । मां की आंखें डबडबा आईं।
    - बात कुछ नहीं, इतने जनों में यह दुखी हो रहा है। पिताजी के स्वर में व्यंग उभरा तो श्याम बाबू ने गर्दन झुका ली।
    - देख श्याम! मैं मानता हूं कि साथ रहने में थोड़ी-बहुत तकलीफ जरूर होती होगी पर अपनापन तो है। सब एक दूजे के सुख-दुख में शरीक हैं। जगह की तंगी जरूर है पर मनों में प्रेम का सागर उमड़ा रहता है। और तू तो जानता ही है कि एक जीव के सौ झंझट होते हैं उसका कौन मालिक होता है। भाई साहब समझा रहे थे।
    - पर मैं कोई लड़ाई कर के थोड़ी ना जा रहा हूं। आना-जाना लगा रहेगा। श्याम बाबू नाराज होते बोले।
    - किंतु घर तो दो हो गए ना। मां आगे बोली- सुशीला ने तो कुछ नहीं कहा। मां का दिमाग चकरा गया।
    - उसे तो कुछ पता भी नहीं। श्याम बाबू ने खीज कर कहा।
    - मुझे तो ये लच्छन उसी के लगते हैं। मां भीतर कमरे में जाती हुई क्या बोल गई कि कमरे से रोने की आवाज आने लगी। बेचारी सुशीला ने शायद मां की बात सुन ली।
    फिर किसी ने कुछ नहीं कहा और एक एक कर सभी इधर-उधर हो लिए। पीछे रह गए एक अकेले श्याम बाबू।
    - कितना छोटा होता है मन। सुशीला सोच रही थी। पांच वर्षों से घर की प्यारी और लाडली बहू पांच सैकिंड में ऐसी हो गई। क्या कुछ नहीं किया-सहा इस घर के लिए। पांच वर्षों में मुश्किल से पांच मिनिट भी पति के साथ बैठकर बतियाई होंगी। घर से साथ निकलना तो जैसे सपना था। क्यों मैं इंसान नहीं। क्या मेरा कोई मन हीं। हम कब-कहां साथ बैठें! कब सुख-दुख की कोई बात की। विवाह का क्या मतलब है? घर में लड़ाई नहीं हो, बस यही सोचकर कि कोई यह ना कह दे कि घर में पत्नी के आते ही बेटा पराया हो गया। इसे कौन देखे कि हमने अपनी सभी इच्छाओं का गला घोंट दिया। कितना भी कर लो, मर-खप जाओ फिर भी दोष का भांडा औरत के सिर पर ही फूटेगा। औरत ही औरत की सबसे बड़ी दुश्मन। पहली बार सुशीला को मां जैसी सास डायन सरीखी लगने लगी।
    - रोते क्यों है? यह तो होता आया है। गनीमत समझ कि तेरा पति तेरे मुताबिक सोचता है। मुझे देख पन्द्राह बरस हो गए। पर कोई नहीं सोचता। जेठानी ने सुशीला के सिर पर हाथ फिराते हुए कहा। उसकी आंखें बरस रही थीं- टप टप। सुशीला के जी में जैसे जान आई।
    अगले पांच दिन घर में पांच युगों जैसे बीते। आपसी संवाद नपी-तुली बातों में सिमट गया। वे मीठे बोल, हंसी-मजाक और साथ उठना-बैठना-बतियाना जैसे हवा हो गए।
    सुशीला खुश थी। दूसरी मंजिल के क्वाटर में सारा सामान घर से दो-तीन चक्कर में यहां आ गया। वह काफी समय अपनी बॉलकोनी में खड़ी सामने के क्वाटर को देखती मन ही मन हर्षित होती रही। एक के अलावा सभी क्वाटरों के दरवाजे बंद थे। खुले दरवाजे के क्वाटर के बाहर टैंट लगा था। रंगीन लाइटों की सजावट टांगी जा रही थी। सुंदर गीत-संगीत बज रहा था। उसने सोचा जरूर कोई शादी होगी, पर अपने यहां तो कोई बुलावा आया ही नहीं। आ जाएगा। सुशीला को हंसी आ गई। उन बेचारों को क्या मालूम कि इस क्वाटर में कोई आया है।
    सुशीला पलंग पर लेट गई। वह बहुत खुश थी। उसे घर की याद आने लगी। सास-ससुर, जेठ-जेठानी, ननद सब थे घर में और यहां कौन है? कोई नहीं, अकेले में सूनापन जैसे काट खाने को दौड़ता। श्याम बाबू भी शाम ढले लौटेंगे। क्या वह इसी घड़ी के लिए कल्पनाएं किया करती थीं। पर इस में वह सुख कहां है। उस समय तो बहुत खुश हो रही थी और अब जैसे कोई आफत गले आ पड़ी हो। समय काटना ही मुसिबत हो गया। जितने बार भी दरवाजा खोले बाहर सामने बंद दरवाजे दिखाई देते। दिन काटना जैसे पहाड़ चढ़ना हो गया।
    - धीरे-धीरे सब आदत हो जाएगी। श्याम बाबू ने शाम को हंसते हुए समझाया।
    - सामने के क्वाटर में क्या है? सुशीला ने पूछा।
    - ए. ओ. साहब के यहां लड़की की शादी है। शाम को मुझे जान है।  श्याम बाबू ने कहा तो जैसे सुशीला की समझ में कुछ नहीं आया, उसने पूछा- और मैं?
    - बेवकूप है तू.. यह अपना गली-मौहल्ला तो नहीं ना। यहां के अपने कानून कायदे हैं। यहां लोग आना-जाना, उठना-बैठना हिसाब से रखते हैं। अब तो शाम को बस हाजरी देनी है। श्याम बाबू समझाने लगे।
    - यह क्या बात हुई? गली में तो शादी वगैरा में लोग एक दूसरे को बड़े सम्मान मनुहार के साथ ले जाते थे ... फिर वहां अपनापन और लगाव। सुशीला सोचने लगी।
    जाते जाते श्याम बाबू बोले- यह अपनी गली नहीं है पगली। दरवाजा बंद कर ले। मुझे आते-आते थोड़ी देर हो जाएगी। रोटी बना कर खा लेना, मैं तो वहीं खाना खा कर आऊंगा।
    - क्या कॉलोनी के आदमी खाना खिला देते हैं? सुशीला व्यंग में बोली। श्याम बाबू हंसे और चल दिए।
    सप्ताह भर में ही सुशीला की समझ आ गया कि उसका यहां निबाह मुश्किल है। श्याम बाबू भी कुछ अनमने थे। उन्हें अचरज था कि यहां के लोग आदमी है या पत्थर। घरों के दरवाजे केवल दफ्तर आने-जाने के लिए ही खुलते और बंद होते थे। कोई किसी से मेल-मुलाकात चाहता ही नहीं। बैठना-बतियाना तो दूर की बात ठीक सामने मिल जाए तो बस नाम की दुआ-समाल। यहां का सारा हिसाब-किताब ही कुछ अलग लगा।
    आज तो हद हो गई। जरा-जरा सी बातों को यहां के लोग कितना बड़ा बना देते हैं। नीचे के क्वाटर से कोई आया कि बॉलकोनी में कपड़े वगैरह ना सुखाया करें, नीचे छींटें गिरते हैं। सुशीला के तो जैसे आग लग गई। श्याम बाबू भी गुस्सा हुए, पर क्या करें? कहा- ठीक है आगे से ध्यान रखेंगे।
    यह क्या बात हुई? कपड़े सुखेंगे कहां-कैसे? सुशीला को गुस्सा आया।
    - नहीं नहीं। यह बात नहीं। नीचे भी तो लोग रहते हैं, ध्यान तो रखना ही होगा। श्याम बाबू समझाने लगे।
    - नीचे लोग रहते हैं, ऊपर लोग रहते हैं। फिर कपड़े सुखेंगे कहां? कमरे में। सुशीला अभी तक गुस्से में थी।
    - मैं नीचे तार बांध दूंगा। श्याम बाबू ने रास्ता सुझाया।
    - मेरा मन यहां नहीं लगता। घर चलें। सुशीला घर की याद से घिर गई और आंखें भर आईं।
    क्या! क्या सुख है वहां, ना तो आराम से रह सकते हैं और ना ही साथ बैठकर दो घड़ी बतिया सकते हैं। थोड़ा धीरज रख। सब आदत हो जाएगी। श्याम बाबू का मन घर का नाम सुनते ही जैसे खट्टा हो गया।
    - मुझे घर में सब के साथ रहने के सुख के साथ सारे दुख मंजूर है। सुशीला की इस सीधी सच्ची बात का जबाब देना उनकी बस की बात नहीं थी।
    इस सूनेपन में सुशीला का मन अपनी जगह छोड़ चुका था। वह काफी देर तक अकेली सुबकती रही।
    - आंटी-आंटी। बाहर से आवाज आई।
    - क्या है? सामने ऊपर के क्वाटर से सोनीजी की लड़की को अचानक आया देख पहले तो सुशीला हर्षित हुई कि आज कोई तो आया, पर यह क्या लड़की ने पूछा- अंकल है क्या? पापा को ऑफिस से बुलाना है। दादाजी मर गए है। और लड़की रोने लगी।
    - क्या.. ! सुशीला की आंखें फटी की फटी रह गई। सारी खुशी गम में बदल गई। वह ताला लगाकर सोनीजी के क्वाटर में पहुंची। दोपहर के समय कोई आदमी नहीं था, सभी दफ्तर थे, खबर कैसे पहुंचाए। कोई साधन नहीं। बस तीन-चार औरतें थीं। उनके आते-आते शाम हो गई और रिस्तेदारों को खबर करते-करते रात हो गई। दाह-संस्कार अगले दिन हुआ और उसमें भी दूरी के रहते गिनती के लोग आ सकें।
    सुशीला के मन में जैसे युद्ध चल रहा था। वह घर में अकेली थी। बेचैन इधर-उधर टहल रही थी। मन में अशांति और उथल-पुथल। श्याम बाबू समशान गए हुए थे।
    दावाजे पर दस्तक सुनते ही एक निश्चय मन में कर उसने दरवाजा खोला। श्याम बाबू काफी देर तक उसको देखते रहे और फिर आहिस्ता से बोले- जल्द ही घर लौट चलेंगे।
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समकालीन भारतीय साहित्य के अंक 187 सितम्बर-अक्टूबर 2016 में प्रकाशित 
  
 
 
 

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