23 अक्तूबर, 2016

दो कविताएं • नीरज दइया

तुम को संबोधित

कौन हो तुम ?
कौन हो सकते हो तुम ?
तुम को संबोधित है-
मेरी सारी कविताएं।

मैं खोजता हूं-
कविताओं में तुम को !
हमारे समय में
यह एक रहस्य है
जब कविताओं में तुम
खोजते नहीं खुद को...
खोजता हूं मैं जिसे
पा लेता हूं- तुम को।
तुम से जुदा
मैं स्मृतियों में खोया-
तुम को सामने पाकर
तुम को संबोधित हूं !
००००

जान से खेल जाती हैं

क्या चिंटियां घूमती हैं-
बस भोजन की तलाश में...
ऐसा क्यों सोचते हो तुम ?
जब भी वे आतीं है पास
बचते हैं हम और तुम
खुद को बचाते हुए
बचते हुए, दूर करते हैं
दूर हो जाना चाहते हैं
फिर भी वे, पास आती हैं
बार-बार आती हैं....
रास्ता बदल-बदल कर आती हैं
क्या हर बार वे आती हैं-
भोजन की तलाश में ?
जान से खेल जाती हैं
कभी-कभी जिद्दी चिंटियां
क्या चिंटियां घूमती हैं-
अपनी मृत्यु का सपना लेकर।
००००

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