16 अक्तूबर, 2016

आलोचना में कोई मित्र नहीं होता : डॉ. नीरज दइया

 डॉ. नीरज दइया से राजेन्द्र जोशी की बातचीत (आधुनिक राजस्थानी साहित्य में कविता, आलोचना, अनुवाद, संपादन और बाल साहित्य आदि क्षेत्र में बहुत तेजी से उभते हुए लेखक के रूप में डॉ. नीरज दइया ने अपने काम के बल पर एक ऐसी स्थिति ला खड़ी कर दी है कि वे राजस्थानी साहित्य के एक जरूरी लेखक माने जाने लगे हैं। आपको बाल साहित्य पर साहित्य अकदेमी का बाल साहित्य पुरस्कार और अनुवाद कार्य पर राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी ने सम्मानित किया साथ ही अनेक संस्थाओं ने भी पुरस्कृत किया है। हाल ही में आपको आलोचना पुस्तक बिना हासलपाई पर इक्कीस हजार का पुरस्कार रोटरी क्लब द्वारा घोषित हुआ है। डॉ. नीरज दइया से पुरस्कृत पुस्तक और उनकी आलोचना प्रक्रिया पर कवि-कहानीकार राजेन्द्र जोशी ने लंबी बातचीत की है। जिसका संपादित अंश पाठकों के लिए प्रस्तुत है। ० संपादक )
आपकी आलोचना पुस्तक ‘बिना हासलपाई’ पर रोटरी क्लब का पहला-पहल राज्य स्तरीय पुरस्कार घोषित होने पर कैसा लगा?
इसका जबाब तो आप जानते ही हैं। अच्छा लगा। पुरस्कार किसे अच्छा नहीं लगता? खुशी की बात है कि मुझे आलोचना विधा की पुस्तक पर पुरस्कार मिलेगा।
कहा जाता है कि राजस्थानी में आलोचना विधा पर लेखन बहुत कम हुआ है और जो हुआ है उसमें भी बहुत बातें हैं। जैसे आलोचना के नाम पर जो लिखा जा रहा है वह आलोचना है भी या नहीं इस पर भी संदेह है।
केवल राजस्थानी आलोचना ही क्यों, क्या हम समग्र आधुनिक राजस्थानी साहित्य लेखन से संतुष्ट हैं? हम ऐसी बात करते हुए कटघरे में तो बीसियों को रखते हुए अनेक बातों में व्यर्थ समय बर्बाद कर सकते हैं पर मैं मानता हूं कि एक लेखक के रूप में अपने आप से सबाल करना चाहिए कि जो मैंने लिखा है वह पर्याप्त है क्या? साथ में यह भी कि यदि आप राजस्थान में रहते हैं और राजस्थानी भाषा आपकी आपनी है तो आपने क्या किया है इसके लिए? अपनी भाषा, साहित्य और संस्कृति के लिए हम सभी की साझी जिम्मेदारी है। क्या पाठक और लेखक के रूप में आपने राजस्थानी किताब को खरीद कर पढ़ाने की आदत डाल ली है? स्थिति बेहद दुखद है कि लेखक किताब भेंट करते हैं और मित्र लेखक पढ़ते भी नहीं है। ऐसे लेखक मित्रों को मैं अनपढ़ कहा करता हूं। संभवतः आलोचना के बारे में संदेह करने वाले ऐसे ही हमारे अनपढ़ लेखक मित्र हैं, उन्हें खुद जानने-पढ़ने की जरूरत है कि आलोचना क्या होती है। तथ्य और तर्क के बिना कही गई बात का कोई महत्त्व नहीं होता।
ऐसे अनपढ़ कहना हमारे लेखकों द्वारा शायद अपमान समझा जाएगा।
यदि इसे अपमान समझ कर भी वे कुछ पढ़ने-लिखने लगे तो राजस्थानी के लिए अच्छा होगा। अनपढ़ लेखक केवल बातें करते और बातें बनाते हैं। यह साहित्य का भला नहीं।
मेरा सवाल अधूरा रह गया कि आज जो आलोचना के नाम पर लिखा जा रहा है और आपने जो अपनी किताब में लिखा है उसमें बहुत लेखकों को शामिल नहीं किया है।
यदि आप मेरी किताब में बस लेखकों के नाम ही देख रहे हैं तो माफ करें आपको लेखक परिचय कोष देखना चाहिए। आधुनिक राजस्थानी कहानी को मैंने समझने का प्रयास किया है। इस प्रयास में कहानी विधा के विकास की बात बिना कहानीकरों और कहानियों के नहीं हो सकती थी। इसलिए पच्चीस कहानीकारों को प्रमुखता के साथ आधार बनाया है। इसमें आरंभ में दो आलेख अलग से है, जिनमें कहानी आलोचना और शिल्प-संवेदना के पक्षों पर चर्चा है। मेरा मानना है कि वर्तमान में आधुनिक कहानी पर यह पुस्तक पर्याप्त विवेक के साथ मैंने लिखन की एक कोशिस की है। 
कहानी आलोचना पर आप से पहले डॉ. अर्जुन देव चारण ने ‘आधुनिक राजस्थानी कहाणी : परंपरा विकास’ पुस्तक में सभी कहानीकारों की चर्चा की थी पर आपने सभी को नहीं लिया।
यदि आपने उस पुस्तक को देखा है तो यह भी कहिए कि डॉ. चारण ने पांच कहानीकारों पर विशेष आधार बना कर विवेचना की थी और अब जब मैंने पांच से पच्चीस कहानीकारों को आधार बनाया है। इस क्षेत्र में बहुत काम करने की आवश्यकता है। मैं मूलतः रचनाकार था और रचनाकार ही हूं, आलोचना का काम भी उसे रचना मान कर ही करता हूं। 
ऐसे में हम क्या यह समझे कि बिना हासलपाई में आलोचना की हासलपाई यह है कि आपने जानबूझ कर अपने मित्र कहानीकारों को ले लिया है और कुछ नामी गिरामी कहानीकारों को छोड़ दिया है।
‘बिना हासलपाई’ आलोचना पुस्तक की एक सीमा है, हर पुस्तक की होती है और मेरा मानना है कि आलोचना में कोई मित्र नहीं होता। इसमें शामिल बहुत से कहानीकारों से मेरा परिचय बस उनकी रचनात्मता से है। मैंने राजस्थानी के लगभग सभी कहानीकारों को पढ़ा है और इस आलोचना पुस्तक में छूटे हुए कहानीकारों से भी गहरे मित्रवत संबंध है। ऐसे मित्रों को मैं अपने पारिवारिक आयोजन में आमंत्रण भेज सकूंगा पर आलोचना लिखते समय जब मैं अपने पिता सांवर दइया को भी एक कहानीकार के रूप में पढ़कर ही आलोचना लिखने का प्रयास करता हूं, आप स्वयं इसका आकलन कर सकते हैं कि मैंने अपने पिता पर नहीं एक कहानीकार पर लिखा है, जो राजस्थानी के बड़े कहानीकर माने जाते हैं। असल में ‘बिना हालपाई’ में कहानीकारों के मेरे संबंधों को नहीं उनकी कहानियों के सभी पक्षों को उद्घाटित करने का उदाहरण बनाने का प्रयास है। केवल तारीफ ही तारीफ या फिर परिचय और सूचियां आलोचना नहीं हुआ करती। आदरणीय कवि पारस अरोड़ा ने एक दिन मुझे फोन किया और बोले- नीरज तुझे समीक्षा लिखनी नहीं आती। मैं हैरान रह गया। पूछा- ऐसा क्या लिख दिया मैंने? उन्होंने जो कहा अब वह मेरे लिए किसी बड़े पुरस्कार या प्रमाण-पत्र से कम नहीं है। वे बोले थे- तुम समीक्षा के नाम पर आलोचना लिखते हो। असल में किसी भी समीक्षा का धेय ही आलोचना हो जाना होता है। आलोचना रचना को गहरे अर्थों में स्वीकार करती है।
ऐसे में आपने शामिल पच्चीस कहानीकारों का चयन कैसे किया। किसे लिया जाए और किसे नहीं लिया जाए? इसका कोई तो आधार या बात आप ने ध्यान में रखी होगी?
‘बिना हासलपाई’ का कोई भी किताब जब प्रकाशन की राह आती है तो उसमें रचनाकार के मित्रों और सहयोगियों के साथ अग्रज साहित्यकारों की भी भूमिका होती है। मेरे साथ हमेशा ऐसा रहा है। ‘आलोचना रै आंगणै’ भाई साहब बुलाकी शर्मा और रवि पुरोहित को समर्पित थी और ‘बिना हासलपाई’ भाई साहब मदन सैनी और नवनीत पाण्डे को समर्पित है। इसका फ्लैप नंद भारद्वाज जी ने लिखा है। पहली पुस्तक से इतर जब दूसरी पुस्तक आने वाली थी तब हम सब ने तय किया कि पुस्तक विधा केंद्रित होनी चाहिए। बहुत से आलेखों को बिना हासलपाई में शामिल करने से पहले मैंने अनेक बार देखा परखा। आलोचना जब पत्र-पत्रिकाओं में किसी त्वरा में लिखी जाती है तब कुछ बातें और प्रसंग साथ होते हैं ऐसे में उनका वैसे का वैसा किताब में जाना ठीक नहीं होता है। पत्र-पत्रिका और अखबार का महत्त्व कुछ दिनों और महीनों तक होता है जबकि किताब को तो सालों-साल रहना होता है। ऐसे में उनकी भाषा और वस्तु-भाव सभी को परिमार्जित किया जाना जरूरी समझता हूं। बिना हासलपाई में उन कहानीकारों को लिया गया जिन पर पर्याप्त ध्यान आलोचना ने नहीं दिया है। शामिल कहानीकारों के अलावा भी ऐसे कहानीकार है जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए। पर कुछ ऐसे कहानीकारों को छोड़ दिया गया, जिन्होंने कहानियां तो बहुत कम लिखी है और बातें बहुत की है अथवा अपने कहानीकार होने को उन्होंने खूब प्रचारित करवाया है। आलोचना का काम अज्ञात बातों और बिंदुओं को सामने लाना होता है, ऐसे में कुछ प्रयास मैंने किया है। जो पसंद किया गया है तभी मेरी किताब के बारे में बात होती है। 
आलोचना लिखते समय आप विशेष क्या और किन-किन बातों का ध्यान रखते हैं?
लिखना आज के दौर में बेहद कठिन कार्य है और आलोचना तो उससे भी कठिन। मैं राजस्थानी साहित्य का पाठक हूं इसलिए लेखक हूं। कुछ किताबें और लेखक मुझे प्रभावित करते हैं और वे किताबें ही मुझे आलोचना लिखने की प्रेरणा देती है। ऐसा भी है कि संपादकों के आग्रह पर भी मैंने आलोचना लिखने का प्रयास किया है। आलोचना में समय के साथ नया दृष्टिकोण होना जरूरी है। मैंने आधुनिक कविता के संदर्भ में कवियों के सिलसिले में टोप टेन कवियों की अवधारणा बाजारीकरण के चलते प्रस्तुत की थी जिस पर भिन्न भिन्न प्रतिक्रिया हुई। मैं मानता हूं कि आजादी के बाद के मेरे बताए दस कवियों में से आप सात-आठ पर सहमत हैं तो मेरी आलोचना के मानदंड ठीक है। मैं यह उम्मीद भी नहीं करता कि आप शत प्रतिशत मुझसे सहमत होंगे। आपको सहमत होना भी नहीं चाहिए। यदि आप पूरे सहमत हो जाएंगे तो मैं अपने आप में सुधार क्या करूंगा। अंत में एक बात मन से कहता हूं कि साहित्य की कोई विधा हो बेशक वह आलोचना हो या कोई दूसरी हो, आलोचना का कोई तयशुदा फार्मूला नहीं होता। मैं क्या और किन-किन बातों का ध्यान रखता हूं आपके सवाल पर मेरा कहना है कि मैं लिखते समय बस लिखता हूं। जिस दिन यह क्या और किन-किन का ध्यान रखने लग जाऊंगा तब तो मेरा लेखन ही अवरुद्ध हो जाएगा। भीतर की प्रेरणा और विचार प्रवाह की कुछ ऐसे स्थितियों से मैं अपने भीतर धिर जाता हूं तब यह जानिए कि बिना लिखे रह नहीं सकता और मैं लिखता हूं। हां उसके प्रकाशन से पूर्व जरूर इन क्या और किन-किन के बारे में सोचता हूं। आलोचना में किसी लेखक के आत्म-सम्मान पर चोट नहीं हो यह ध्यान रखता हूं साथ ही मैं अपने लेखक को बड़ा मान कर ही उसके पीछे पीछे चलने का प्रयास करता हूं। मेरी भाषा और तर्क पर्याप्त सुसंगत हो यह भी दुबारा पढ़ते समय देखता हूं। असल में सभी कहानीकारों का अपना अपना ढंग है, इसिलिए सभी लेखकों-कहानीकारों का अपना-अपना महत्त्व है। इस महत्त्व के आलोक में आलोचक अपनी दृष्टि से समय और समाज के अनेक प्रश्नों के साथ किसी व्यापक परिदृश्य अथवा कहें साहित्य की विशाल परंपरा में उन्हें देखने-समझने का प्रयास करता है।
राजेन्द्र जोशी, तपसी भवन, नत्‍थूसर बास, बीकानेर - 334004

(दैनिक युगपक्ष 16-11-2016 रविवार को प्रकाशित)

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