18 अक्तूबर, 2016

‘सामान्य’ शब्द पर आपत्ति

वैसे तो ‘सामान्य’ शब्द इतना सामान्य है, कि इस पर कोई आपत्ति मान्य नहीं। आप सहृदय हैं। देखिए जब इस शब्द की आत्मा ‘मान्य’ में है, तो यह आपत्ति भी मान्य समझ कर सुनना मंजूर कीजिए। जानते हैं कि देश और दुनिया में बहुत सी बातों पर अनेक आपत्तियां है। हम लंबी-चौड़ी बात नहीं बस एक बार करने की अनुमति चाहता हूं। आपकी सदाश्यता होगी कि इस आपत्ति को सुनना स्वीकार करेंगे।लिजिए जनाब हुआ कुछ ऐसा कि सात बार प्रतियोगिता परीक्षा में फेल होकर आत्महत्या को उतारू एक युवा को पंच काका ने एक बार तो रोक लिया है। पर पंच काका कहां-कहां किस किस को रोकेंगे। इसलिए यह सुनना अधिक जरूरी है। उसके युवा के अंधकारमय भविष्य का श्रेय परीक्षाओं के ‘सामान्य ज्ञान’ के प्रश्नों को जाता है। आजकल सभी परीक्षाओं में सामान्य ज्ञान के कुछ ऐसे अति-विशिष्ठ प्रश्न पूछे जाते हैं। वह हतोत्साहित युवा कह रहा था कि हमारे माननीय प्रधानमंत्री से लेकर देश के सभी नेता हर दिन कुछ न कुछ करते हैं। तकलीफ उनके कार्य को हमारे सामान्य ज्ञान बना देने से। प्रधानमंत्री जी कब कहां गए, और उन्होंने कहां क्या-क्या किया-कहा? भला यह कोई सामान्य ज्ञान है। इतनी योजनाएं, इतना बड़ा देश और इतनी बड़ी जनसंख्या। हमारा पुराना इतिहास, भूगोल, विज्ञान, खेल-कूद सभी कुछ जब सामान्य ज्ञान है तो हद हो गई। सामान्य का अभिप्राय है ऐसा कि जिसमें कोई विशेष न हो। यहां तो बस सामान्य हम है हम पर लाद रहे हो विशेष। आपको जो मामूली बात लगती है वह हम रट-रट कर कितनी रटें। ग्रह कितने हैं, कौनसा छोटा और कौन बड़ा? कौन सा किस नंबर पर? सब याद रहता है भला। शरीर में हड्डियां कितनी और पसलियां कितनी? इन सब ने दिमाग खराब कर दिया है। कौनसा विटामिन और कौनसा खून किस-किस को दिया और नहीं दिया जा सकता है। क्रिकेट, हॉकी, फुटबाल के साथ सभी खेल सामान्य हैं। कौन जीता, कब जीता... कितने सवाल बना डाले इन किताबों में। सामान्य ज्ञान को प्रणाम।आम का मतलब फल होता है और आम मतलब हम यानी सामान्य। आज हर कोई सामान्य से निकल कर, किसी न किसी कोटे में फिट होने की अभिलाषा रखता है। देश की विकास दर बढ़ रही है। आम आदमी खुशहाल हो रहा है। पर असलित में इन आमों में कुछ आम बेहद सडे हुए हैं। सडते जा रहे हैं। इन सडे हुए आमों का रस निकाल कर पीने वाले पी रहे हैं। वे अपनी सेहत बना रहे हैं। बेरोजगारी में पांच हजार का काम पांच सौ तक में करने को विवश ये सामान्य जन पढ़े-लिखें है, पर ‘सामान्य ज्ञान’ के मारे हुए हैं। अगर पन्द्राह-बीस वर्षों तक किताबों में आंखों को उलझाए ये युवा ‘सामान्य ज्ञान’ के स्तर को भी प्राप्त नहीं हुए हैं तो इन स्कूलों और कॉलेजों ने इतने सालों क्या किया? जो पढ़ाया वह किस काम का? अरे जीवन भर पढ़ाते कुछ हो, परीक्षाओं में नौकरियों के लिए पूछते कुछ हो। यह क्या खेल है? पढ़ी हमने रामकथा और सवाल आया महाभारत से। बाजार का भी बुरा हाल है। एक परीक्षा के लिए लाखों की संख्या में आवेदन किए जाते हैं, और बाजार में रातों-रात अनेक किताबें पहुंच जाती है। कौनसी खरीदे और कौनसी नहीं? दो-चार खरीद कर दिन-रात पढ़ते हैं। पढ़ते क्या घोट घोट कर पीते हैं। खाना-पीना-सोना सब कुछ हराम। केवल और केवल पढ़ाई। सपना कि कोई छोटी-मोटी नौकरी मिल जाए। सामान्य जन की कोई बड़ी अभिलाषा नहीं है। ये पेपर बनाने वाले जनाब ना मालूम किस-किस जगह से प्रश्न बटोर कर सामने परोसते हैं कि सामान्य बस सामान्य ही बन कर रह जाता है। हर बार की तरह इस बार भी गई भैंस पानी में। अरे हम सामान्य को इतना गणमान्य बना दिया है हमारे उद्धार की तो सोचो।

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