05 जून, 2018

दो व्यंग्य संग्रह- डॉ. नीरज दइया / समीक्षा- रजनी मोरवाल

रजनी मोरवाल
पंच काका के जेबी बच्चे (व्यंग्य संग्रह) डॉ. नीरज दइया ; अवरण चित्र : के. रवीन्द्र ; संस्करण : 2017 ; पृष्ठ : 96 ; मूल्य : 200/- ; ISBN : 978-93-82307-68-6 ; प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर- 334003
पंच काका के जेबी बच्चे
    व्यंग्य का अभिप्राय अमूमन हास्य, ताना, उपहास, मजाक, तंज़, त्वरित टिप्पणी या प्रतिक्रिया से लगाया जाता है, जिसके प्रभाव स्वरूप तिलमिला देने वाली प्रतिक्रिया उत्पन्न की जा सके। जबकि पारिभाषिक अर्थों में देखें तो अभिव्यंजना शक्ति द्वारा निकलने वाला अर्थ ही व्यंग्य होता है। डॉ. नीरज दइया की व्यंग्य कृति “पंच काका के जेबी बच्चे” इन तमाम पारिभाषिक अर्थों पर पूर्णतया खरी उतरती है। संग्रह में कुल 39 व्यंग्य हैं जिनमें पंच काका के माध्यम से वर्तमान युग की सामाजिक विसंगतियों पर करारा प्रहार किया गया है।
    संग्रह के पहले व्यंग्य में पंच काका का सवला हैं- “व्यंग्य क्या होता है?” और अंत में वे स्वयं ही कहते है- “ये शरारतियों का काम है।” पंच काका एक पात्र इजाद किया गया है जो लगभग सभी व्यंग्य में अपनी उपस्थित दर्ज कराते हुए जैसे अंतिम स्टोक लगा कर किसी बात को पूरा करते हैं। पंच काका नामक यह अनूठा पात्र कभी-कभी अपने मन की बात तो अधिकतर व्यंगकार के मन की बात करता है, किंतु इतनी मार्मिकता और कलाकारी के साथ कि स्वयं को उसमें गौण रखते हुए भी सतत विद्यमान है। पंच काका के माध्यम से इस व्यंग्य-संग्रह में गज़ब की किस्सागोई उत्पन्न हुई है।
    ‘पंच काका के जेबी बच्चे’ संग्रह का शीर्षक प्रारम्भ से अंत तक उत्सुकता बनाए रखता है, मसलन प्राकृतिक बच्चे, परखनली बच्चे, सेरोगेट बच्चे तो सभी सुनते आ रहें हैं, किन्तु ‘जेबी बच्चे’ एक ऐसा अनूठा प्रयोग है जो संग्रह के अंत में जाकर अपना भेद खोलता है। दरअसल लेखक ने अपनी विचारशक्ति से इस अद्भुत शब्द का आविष्कार किया जो एक उपलब्धि के रूप में उनके नाम दर्ज किया जाना चाहिए। इस शब्द के साथ वे चुटकी लेते हैं कि जेब से उत्पन्न होने वाले बच्चे ‘जेबी बच्चे’ कहलाते हैं जो कि इस अवसरवादी, महत्वकांक्षी और पैसों की दुनिया में जेब से पैदा होते हैं।
    व्यंग्य ‘गुट, गुटका और गुटकी’ में नीरज दइया साहित्य की उठा-पटक पर तंज़ कसते हुए कहते हैं कि “गैर गुट वाले गुटका-गुटकी के नशे में लडखडाते हैं, साहित्य के ऐसे सूरमाओं के मुख पर ऐसे-ऐसे विशेषण और आप्त कथन आते हैं कि सुनने वाले दंग रह जाते हैं, दो-चार गुटकी भरते ही वे पीढ़ियों तक को सुशोभित करते हुए ज्ञान के घोड़े पर सवार हो जाते हैं।” विषयानुरूप सहज-सरल भाषा में डॉ. दइया पाठकों से सीधा संवाद करते हैं और यही उनका वैशिष्टय है जो पाठकों को जोड़ता है।
    व्यंग्यों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि दइया किसी बात में से बात निकालने की खूबी जानते हैं। वे यह भी जानते हैं कि हर बात से व्यंग्य नहीं निकालता और यदि व्यंग्य के लक्षण मिल भी जाएं तो उसे साहित्य के रूप में ढालने से पूर्व कठिन तपस्या करनी पड़ती हैं। वे तमाम बातों के सागर से उस सीप को खोज लाते हैं जिस में मोती होता है, फिर उसी मोती पर व्यंग्य केन्द्रित करते हुए सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार करते हैं। वे निरंतर इस विधा के अनुशासन में रहते हुए अपने मंतव्य पर दृष्टि गढ़ाए रहते हैं।
    ‘सर्वश्रेष्ठ वाद-अवसरवाद’ व्यंग्य के बहाने समाज में बढ़ती अवसरवादी प्रवृति पर डॉ. दइया लिखते हैं- “अवसरवाद सिद्धांत के अनुसार दिल खोलकर दिखावा करो, दिखावा करने से ही अवसर मिलते हैं। किस अवसर के लिए तेल कौनसे ब्रांड का खरीदना है यह महत्त्वपूर्ण है। तेल, साबुन क्रीम से आपकी हैसियत का पता चलता है और गेंहू, दाल, चावल तो आपके पेट में चले जाते हैं।” बेहद सधा हुआ व्यंग्य और यथार्थवादी भी।
    ‘डिज़िटल इंडिया’ और ‘दाढ़ी रखूं या नहीं’ के माध्यम से उन्होंने सोशल मीडिया पर समय के दुरुपयोग पर कटाक्ष किया है तो वहीं देश में बिजली की समस्या को आधार बनाकर ‘डिजिटल इंडिया’ और विकास के नारे पर प्रश्नवाचक चिह्न लगाया है। सरकारी नीतियों के कारण स्कूलों में हर क्रियाविधि की सूचना कार्यालय को सबूतमय भेजनी पड़ती है, शिक्षक पढ़ाने से अधिक बच्चों के संग सेल्फी लेते नज़र आते हैं ‘बच्चे के संग सेल्फी’ व्यंग्य के द्वारा उन्होंने नई शिक्षा नीति पर बड़ी गंभीरता से करारा व्यंग्य ढूंढा है। ‘टारगेटमयी मार्च’ के द्वारा वे काम के बढ़ते बोझ से उत्पन्न तनाव पर निशाना साधते हैं कि कैसे एक निश्चित समयावधि में टारगेट और आंकड़ों की जद्दोजहद में फंसे कर्मचारी मानसिक व शारीरिक रूप से बढ़ते तनाव की वजह से जूझते हैं।
    ऐसे तमाम उदाहरण हैं जो संग्रह से दिए जा सकते हैं, हर रचना में पंच काका के पंच हैं, व्यंग्य के ये तीर दरअसल नीरज दइया द्वारा ही छोड़े गए हैं जो अपने गंतव्य पर पहुंचकर लोगों को गुदगुदाते तो हैं साथ ही बढ़ी गंभीरता से अपनी बात का असर भी छोड़ जाते हैं। वे बखूबी जानते हैं कि व्यंग्य महज़ हास्य बनकर न रह जाए इसीलिए वे अपने व्यंग्यों में बिम्ब, प्रतीक, वक्रता के साथ-साथ भाषा की सहजता व सरलता पर भी ध्यान देते हैं और यही विशेषताएं उनके लेखन को समृद्ध बनाती हैं।
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टांय टांय फिस्स (व्यंग्य संग्रह) डॉ. नीरज दइया ; अवरण चित्र : के. रवीन्द्र ; संस्करण : 2017 ; पृष्ठ : 96 ; मूल्य : 200/- ; प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर- 334003
टांय टांय फिस्स
    व्यंग्य संग्रह “टांय टांय फिस्स” अपने अनूठे शीर्षक से प्रभावित करता है। यूँ तो आम मायनों में इसका अर्थ होता है- जिसका परिणाम कुछ न निकले, किंतु व्यंग्य संग्रह की 40 रचनाओं को पढ़कर लगता है कि जैसे किसी खजाने की कूंची हाथ लग गई हो। लेखक नीरज दइया ने ऐसे-ऐसे वाक्यों का प्रयोग करते हुए कुछ नए मुहावरे भी गढ़े हैं कि व्यंग्यकार के रूप में उनकी छवि यादगार कही जा सकती है।
    व्यंग्य में अपनी उत्कृष्ट भाषा शैली से नीरज दइया छोटी से छोटी बात को भी वे इस ढंग से चुटीला बना देते हैं कि बात के नए अर्थ उभरकर पाठकों के सामने आते हैं। यह इसलिए भी है कि वे राजस्थानी भाषा और जिस लोक से जुड़े हैं उनका व्यंग्य में एक नया ‘फ्लेवर’ उन्हें अन्य व्यंग्यकारों से भिन्न और कुछ खास भी बनाता है। उनका विशद अध्ययन है जिससे समसामयिका के साथ अनेक प्रसंग और ब्यौरे उनकी रचनाओं को तो समृद्ध बनाते हैं। व्यंग्यों में जिस ‘पंच काका’ नामक अनोखे किरदार को गढ़ा है वे काका यहां भी अपने पंच छोड़ते हुए सतत विद्यमान हैं । इस संग्रह में कुछ नए पात्र- फन्ने खां, स्वामी चेतानानंद, आदि आचार्य श्री बैगनाचार्य आदि हैं जो व्यंग्य को आगे बढाने में सहायक प्रतीत होते हैं। 
    इन रचनाओं से गुजरते हुए लगता है कि नीरज दइया जानते हैं कि देश के माहौल, परिवार, साहित्यिक गतिविधियों, लेखकों, स्कूल, समसामयिक घटनाओं, चर्चाओं, बातों, कार्यस्थल व भिन्न-भिन्न स्थानों पर किस तरह अपनी सहमति-अहसमति के द्वंद्व में व्यंग्य का मौका मिल सकता है। उनकी अनेक रचनाओं में व्यंग्य के साथ कोई न कोई गंभीर संदेश होता है जिसे वे शब्दों की आड़ लेकर बेहद करीने से पाठकों के सामने प्रस्तुत करते हैं। उनके व्यंग्य हास्य तो उत्पन्न करते ही है, साथ ही नैतिक मूल्यों की पैरवी भी करते हैं।
    नीरज दइया विभिन्न विषयों से पाठकों को हतप्रभ करते चलते हैं। कागज के दुश्मन, कुंवारे-कुंवारियों की धमाचौकड़ी, हम सबकी गति एक, वी.आई.पी. कल्चर, बाबाजी के चेलों खूब खाओ बैंगन, खुल्ले मिलेंगे क्या, काला धन देश में पकड़ा, ई-होली हुडदंग आदि अनेक ऐसे व्यंग्य हैं जहाँ वे समसामयिक समस्याओं पर करारा प्रहार करते हैं। पूरा संग्रह ही व्यंग्य से सराबोर है किन्तु कुछ उदहारण जो मुझे निजी रूप से सुंदर पंच लगे उनमें से चयनित पांच पंच प्रस्तुत है-
कागज के दुश्मन- ई-युग ने डाक-डाकिया को परमानेंटली फ्री कर दिया।
हम सबकी गति एक- जहाँ बूढे दादाजी के मरने पर परिवार वाले फूट-फूटकर रोते हैं, वहीँ घर में कन्या के जन्म पर रोनी सूरत बनाए रखते हैं, बेटा हो या बेटी सबकी गति और दिशा एक ही होनी चाहिए।
जाकेट की सर्दी-गर्मी- साहित्यकारों वाली जाकेट सर्दी-गर्मी बारह महीनों चलती है, ये त्रासदियाँ भोगने के लिए नहीं दिखाने के लिए भी होती है , क्या जाकेट साहित्यकारों का कोई ड्रेस कोड बन गई है ?
होमवर्क, स्कूल और पेरेंट का त्रिभुज– यह एक गणित है और इस त्रिभुज में टोटल तनाव वही का वही रहता है अब यह आपकी मर्ज़ी है कि इसे कब, कहाँ व कैसे भोगना है ?
वी आई की खान भारत- ये सब नाटक है ढकोसला है, दुनिया एक रंगमंच है और हम इसकी कठपुतलियाँ, कब-कौन-कैसे उठेगा ये कोई नहीं जानता...बाबु मोशाए ...वी आई पी की खान भारत तो गया...अब मुठ्ठी भर पूर्व वी आई पी सारे नवजात वी आईपियों को मारेंगे।
    डॉ. नीरज दइया की भाषा की कलात्मकता और कसावट के साथ वैविद्ध्यपूर्ण विषयों पर लिखते हुए गुणवत्ता से व्यंग्य का मंतव्य साधते हैं। अपने गंभीर-चिंतन सूक्ष्म सर्वेक्षण, व्यंजनामूलक विशिष्ट जीवन दृष्टि द्वारा समाज में फैली विद्रूपताओं पर चोट करने के निर्भीक प्रयास में वे शत-प्रतिशत खरे उतरते हैं। पंच काका का आशीर्वाद तो उनके साथ है ही। कृति “टांय टांय फिस्स” में उनकी पहचान को और अधिक पुख्ता धरातल मिलता है। आशा है वे एक प्रखर व्यंग्यकार के रूप में नए-नए आयाम गढ़ते रहेंगे।
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रजनी मोरवाल, 
23/97 “आर्ष”, स्वर्ण पथ, मानसरोवर, जयपुर 302020
मोबाइल-09824160612

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