25 जून, 2018

जय प्रकाश मानस : गूगल से भी आगे / नीरज दइया

जयप्रकाश मानस से मेरा परिचय बहुत पुराना है। कोई जान-पहचान दो दशक को छूने लगे तो उसे पुराना कहा जा सकता है। समय परिचय को प्रगाढ़ करे अथवा नहीं करें किंतु किसी व्यक्ति आकलन में मदद जरूर करता है। इस दौरान हम अपने संबंधों को ठीक-ठीक समझ और परिभाषित कर सकते हैं। मैं मेरे और मानस जी के विषय में कुछ लिखने से पहले उस दिन का स्मरण करना चाहता हूं जब जयप्रकास जी ने मेरे मानस में एक दस्तक दी। बात उन दिनों की है जब मैंने राजस्थान सरकार की अपनी मास्टरी छोड़कर केंद्रीय विद्यालय, राजकोट में पी.जी.टी. हिंदी के रूप में वर्ष 2003 में कार्यग्रहण किया था। वहां मुझे उच्च माध्यमिक स्तर की कक्षाओं में हिंदी अध्यापन के साथ राजभाषा हिंदी और अन्य कार्य भी मिले थे।
किसी तारीख, दिन और महीने के चक्कर में पड़े बिना सीधे-सीधे कहना यह है कि जयप्रकाश मानस मेरे मानस गुरु उन्हीं दिनों बने थे। ऐसे गुरु जिन्हें वर्षों तक खबर नहीं हुई कि उनका कोई शिष्य नीरज दइया राजकोट गुजरात में बैठा है। भले उस समय मैं अपने इस संबंध को परिभाषित नहीं कर सका पर अब यह पक्का है कि वे मेरे गुरुजनों की श्रेणी में हैं। मेरे कुछ मित्रों को मुझ से शिकायत है कि मेरे गुरुजनों की संख्या अधिक है। मैं मानता रहा हूं जिससे हम कुछ सीखते हैं, जो हमें कुछ सीखाता है वह आदरणीय गुरु ही होता है। उन्होंने मुझे कंप्यूटर के भीतर छुपी हुई राजभाषा हिंदी लेखन से परिचित होने की प्रेरणा दी। उन दिनों मैं कंप्यूटर द्वारा देवनागरी हिंदी में लिखने का प्रयास बेबदुनिया के की-बोर्ड से किसी प्राथमिक स्तर के विद्यार्थी जैसे कर रहा था। मेरे पास एक ई-मेल आया। ऐसा मेल जिसे मैं अपने याहू आई-डी पर पढ़ नहीं पा रहा था। जानकार मित्र ने बताया कि यह फोंट की समस्या हो सकती है, यहां खुल नहीं रहे हैं। मित्र के सुझाव दिया और वह मेल जीमेल एकाउंट मैं पढा गया। सृजनगाथा संपादक के रूप में जयप्रकाश मानस के मेल से पता चला कि उन्होंने मेरे दो अनुवाद प्रकाशित किए हैं।
यह किसी के प्रति सम्मान और श्रद्धा की बात है। कुछ बातें हम कह देते हैं और कुछ मनों में रह जाती है। मैं शब्दों के माध्यम से जयप्रकास मानस जी मिलता रहा हूं। उनसे संवाद का भी लंबा सिलसिला रहा हैं। बीकानेर में हमारी पहली रू-ब-रू मुलाकात वर्ष 2017 में हुई। जब वे अपने दल-बल के साथ ‘द्वितीय अंतराष्ट्रीय लघुकथा हिन्दी सम्मेलन’ के दौरान मेरे शहर में आए थे। मैंने उन्हें अपनी इन भावनों से अवगत कराया तो वे हंसने लगे और ‘अरे नहीं’ शब्द उनके मुख से निकले। उनके ‘अरे नहीं’ कहने और हंसने से मैं अपना शिष्य पद छोड़ने वाला नहीं था और नहीं छोड़ा है। वे भले मुझे मित्र, छोटा भाई या एक लेखक जैसा जो कुछ समझे उनका अपना दृष्टिकोण है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने जिस श्रद्धा-भक्ति का पाठ पढ़ाया है उससे मैंने बहुत कुछ सीखा है। मैं तो जय, प्रकाश और मानस तीनों से शब्दों के गहरे अर्थों से प्रभावित होता रहा हूं, फिर ऐसे दुर्लभ संयोग को कैसे छोड़ सकता हूं।
मेरा उनसे संबंध कवि-अनुवादक के रूप में भी रहा है। मैंने उनकी कुछ कविताओं के राजस्थानी अनुवाद किए थे। जो पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुए हैं। आप और हम उन्हें फेसबुक पर लंबे समय से सक्रिय देख रहे हैं। वे किसी एनसाइक्लोपीडिया की भांति इतनी जानकारिया और स्रोत का भंडार है कि उन्हें प्रणाम करने का मन करता है। खैर मैं तो उन्हें अपना गुरु मान चुका हूं और उनकी इन सभी सेवाओं के लिए उन्हें हार्दिक वंदन करता ही हूं। अंत मैं मेरा बस इतना सा आग्रह है कि जो तटस्थ रहेगा, समय लिखेगा उसका भी इतिहास, फैसला आपका है कि आप अपना इतिहास कैसा चाहते हैं। मुझे तटस्थ की भूमिका से बेहतर स्नेह और आशीष का आकांक्षी होना बेहतर लगता है। मैं अपने गुरु जयप्रकाश रथ के रथ के साथ हूं और रहूंगा।
व्यक्ति का स्वभाव है कि वह थोड़ा बहुत स्वार्थी होता है। मैं कुछ अधिक हूं और जयप्रकास रथ यानी मानस जी के संदर्भ में इतने लंबे समय में मुझे उनके कार्य, व्यवहार और अदम्य उत्साह में अनेकानेक स्वार्थ नजर आते हैं। वे एक सक्रिय रचनाकार के साथ गहरे अध्येता हैं। अपने समय और परिवेश से जुड़ कर वे जैसा जो कुछ कर चुके हैं अथवा अब भी कर रहे हैं बहुत उल्लेखनीय है। किसी एक व्यक्ति में इतनी क्षमताएं और योग्यताएं होना अद्वितीय है। उन्होंने साहित्य लेखन के साथ संपादक और हिंदी के प्रचार-प्रसार-विकास के लिए अतुलनीय कार्य किए हैं। यह सब उनके परिचय में विस्तार से देखा जा सकता है। अगर आपको यह सब पता नहीं तो गूगल जिंदाबाद तो आप जानते ही हैं। गूगल के साथ मेरे गुरुजी मानस जी को भी जिंदाबाद इसलिए कहना है कि वे बहुत सी बातों में गूगल से भी आगे हैं।
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