29 जून, 2018

पैसे का चक्कर / नीरज दइया

पैसा एक वचन है और इसका बहुवचन जब भी होता है वह बहुत भारी होता है। अब इसके एक वचन से किसी को कोई मतलब नहीं रह गया है। जहां कहीं भी मुद्रा में पोइंट के बाद कुछ लिखा होता है उसे हमारे सिस्टम अपने आप अपग्रेड कर देते हैं। इस राउंट-अप करने की प्रक्रिया में अब वे दिन लद गए जब इसके एक वचन अथवा बहुवचन होने के भी कोई अर्थ होते थे। मुझे अपने बचपन के दिन याद आते हैं, जब हाथ में पैसे होते थे तब एक अजीव सी खुशी होती थी। अब यह हाल है कि जब कोई हाथ में पैसों की शक्ल वाले सिक्के खुल्ले के चक्कर में पकड़ा देता है तो लगता है कि कह दें कि भैया इन्हें तुम ही रख लो। नोट है तो दे दो पर ऐसे चिल्लर से जेब फटने और खन-खन होने का डर है। हाय रे हमारा वह जमाना जब हम पैसों की इसी खन-खन से हर्षित होते थे और अब यहीं खनखनाहट कानों को खटकने लगी है। अतः यह निर्विवादित सत्य के रूप में कहा जा सकता है कि पैसे का सिम्पल बहुवचन हमारे भीतर नफरत भरने वाला है। पैसे का सुपर डिग्री बड़े वाला बहुवचन जिसमें बहुत सारे बहुवचन मिले हो और वह भी पैसे की शक्ल में हर्गिज नहीं हो तब हमारे काम का है।
एक रुपया यानी सौ पैसे और सौ पैसे में अब कुछ नहीं आता है। बच्चों को मनी जिसे हम पुराने जमाने में बहुत बाद में हाथ खर्च के नाम से जानने लगे थे आजकल वह सब डिजिटल हो गया है। बच्चों को कार्ड चाहिए और उससे कुछ भी करने की छूट। अब पैसों की तो बात ही मत करो, कम से कम सौ रुपये को शून्य मानते हुए जो भी करना है स्टार्ड करो। आप को बच्चों की जरा-भी खुशी का ख्याल है या फिर उसकी एक झलक देखने की इच्छा है तो बात पांच सौ देने लेने से कम मत करना। यदि आपका पहला फिगर दो हजार हो तो कुछ बेहतर परिणाम देखने को मिल सकते हैं। अब ऐसी जनरेशन है कि बिना संकोच के सीधे कहती है- ‘पैसा पैसा क्या होता है पैसे की लगा दूँ ढेरी...’ भारतीय मुद्रा के विषय में यदि इस गीत के जैसे कि कहा ‘मैं बारिश कर दूँ पैसे की जो तू हो जाये मेरी’। किसी दिन यह तेरी मेरी वाला खेल सच में हो गया और किसी ने पैसों की बारिश करा दी शायद हमारे अच्छे दिन आ जाएंगे। पर इसमें अच्छे दिनों की तुलना में मुझे खतरा अधिक लगता है कि जिस किसी क्षेत्र में पैसों की बारिश होगी वह दिवानों और दिवानियों की संख्या के बल को देखते हुए होगी। खुदा ना करे कि हम सब उन्हीं पैसों के ढेर के नीच दब जाएं।
वैसे भी अभी हमारी हालत कुछ अच्छी नहीं है। सुनते हैं कि पूरा देश कर्ज के बोझ से दबा हुआ है। देश के दबे होने में आप अपने पर कितना दबाब महसूस करते हैं आप की आप जाने पर मैं तो मेरी ही कह सकता हूं। मेरे गणित के अध्यापक ने ढंग से गिनती में निपुण नहीं किया या कहें कि मेरी ही नालायकी थी कि बड़ी गणित देखकर जी धबराने लगता है। बात लाखों से पार होते ही केस किसी दूसरे को रेफर करना पड़ता है। रोज दाल-रोटी मिल जाए इसी में भारतीय जनता की भांति मेरी भी खुशी है। अपनी अक्षमता को मैं स्वाभिमानी हूं इसलिए ‘सादा जीवन उच्च विचार’ कह कर गौरव की अनुभूति करता हूं। हमारे बुजुर्गों ने पैसों को हाथ का मैल कहा था सो मैं तो इस मैले से हाथ की अधिक निकटता का पक्षधर नहीं हूं। पंच काका की बात भी ठीक है कि जिनको पैसों का असली सूत्र मालूम है वे चुप रहते हैं। नासमझ लोग ही ‘पैसे पैसे क्या करती है’ ऐसा शोर-शराबा करते हैं। ए मुनिया! इस पैसों की ढेरी के चक्कर में नहीं आना है।
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अट्टहास, जुलाई, 2018 में प्रकाशित



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