25 जून स्मृति दिवस पर विशेष- स्मृति-शेष साहित्यकार श्री महेशचन्द्र जोशी
मैं अपने ही काम-काज में खोया था कि बहुत दिनों बाद मन्दा (मन्दाकिनी जोशी) का फोन आया। एक छोटे से संवाद ने मुझे समय के उस बिंदु तक पहुंचा दिया जहां से हमारे परिचय का स्मरण मैं करने लगा। मेरे बचपन के दिनों में कहानीकार महेशचन्द्र जोशी (1935-2012) को मैंने सबसे पहले बाल साहित्य के लेखकों के रूप में पहचाना था। वे मेरे पिता को गहरे दोस्त रहे और मेरे लिए ऐसे लेखक हैं जिन्होंने मुझे अपना बाल उपन्यास भेंट कर शब्दों की इस दुनिया के लिए प्रेरित किया था। जोशी की पुत्री मन्दा से मेरा परिचय कब हुआ यह अब ठीक-ठीक स्मरण नहीं आता। उसे मेरे पिता सांवर दइया ने उसे बेटी की तरह प्यार दिया और वह मेरे लिए सदा बड़ी बहन की भांति आदरणीय रही हैं। उसकी सादगी, सहजता और सरलता प्रभावित करती है।
मन्दा बचपन से ही नाटकों में काम करती थी, उसे मेकअप और बिना मेकअप दोनों रूपों में देखा है। उसे और उसकी छोटी बहन अनु (अनुपमा) में मैंने पाया कि एक छिपी हुई रहती थी और दूसरी मुझसे मेरे हाल चाल पूछा करती थी। आज सोचता हूं तो लगता है कि मैंने उसे कभी सीधी-सरल लड़की के रूप में तो देखा ही नहीं, वह तो सदा से मुझे एक परी जैसी लगती रही है। मेरे बाल मन में पंखों वाली परियों की जो कहानियां रहीं उसमें मन्दा बिना पंखों वाली एक ऐसी परी है जिसकी उडान को पर्याप्त मान-सम्मान मिला है। परियों तो हमेशा हंसती रहती है पर वह ऐसी परी है जो 25 जून, 2012 को बहुत रोई थी। उसने अपने पापा और हम सब के आदरणीय कहानीकार महेशचन्द्र जोशी को इसी दिन मुखाग्नि दी थी। उसने यह साबित कर दिया कि वह अपने पापा की बहादुर बेटी नहीं बेटा है। उसके संघर्ष और कार्यों को देखते हुए अगर मैं उसे परी कहता हूं तो गलत नहीं है। यह बिना पंखों वाली एक ऐसी परी है जिसकी उडान की कहानियां बरसों हम में प्रेरण और हिम्मत भरती रहेगी। वह नारी शक्ति और अदम्य जीजीविषा का एक उदाहरण है। पिछले दिनों बीमारी से लंबा संघर्ष कर फिर से अपनी अदम्य मुस्कान से साबित किया है कि वह सचमुच परी ही हैं जो कभी हारती नहीं है।
मन्दाकिनी जोशी इसका पूरा श्रेय अपने पापा को देती हैं। वह उन्हें याद करते हुए कहतीं हैं- ‘मेरे प्रेरक मेरे पापा रहे हैं। उनका सम्पूर्ण जीवन संघर्षमय रहा। एक संपन्न परिवार में जन्म लेने के बाद भी पापा आर्थिक संकटों से जूझते रहे, पर हमें कभी आर्थिक अभाव महसूस नहीं होने दिए। जब तक माँ रहीं, दु:ख क्या होता है, शायद हमने दोनों बहनों ने जाना ही नहीं। जब 31 मार्च, 1993 को मेरी माँ (हेमप्रभा) का असामयिक निधन हुआ पापा ने हमें हिम्मत बंधाई। उन्होंने हमें भरपूर प्यार दिया। हम दोनों बहनों को बेटों की तरह पाला। हमें जीने की, कुछ करने की पूरी आजादी दी। इसी आजादी की वजह से मैंने रंगमंच पर लगभग 15 वर्ष की लंबी पारी पूरी की। पापा अस्वस्थ होने के बाद भी मुझे कभी रंगकर्म के लिए नहीं रोकते थे, वरन् मेरी कला को सराहते हुए सदा प्रेरित-प्रोत्साहित करते रहे।’
मन्दा की इस यात्रा में मैंने उसके कुछ नाटक देखे हैं। महेशचन्द्र जोशी को अपने पुराने अजीज दोस्त सांवर दइया को याद करते हुए देखा है। वे बहुत भावुक इंसान थे और उनका गला भर आता था। वे बीमारी में भी जीवन से भरपूर उत्साहित रहते थे। उनकी बातों में पुराने किस्से और साहित्य की दुनिया के अलावा कुछ नहीं होता था। वे भी मन्दा को मन्दा कहते थे, मेरे पिता भी मन्दा कहा करते थे। शायद यही कारण रहा होगा कि हम घर में उसे मन्दा कहा करते थे। वह कविताएं लिखती है पर उसकी कोई किताब अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है।
किसी रचनाकार के जीवन में उसके माता-पिता का स्थान बहुत बड़ा होता है। वह बड़ा स्थान कुछ अधिक बड़ा हो जाता है जब पिता महेशचन्द्र जोशी जैसे हो। वरिष्ठ साहित्यकार महेशचन्द्र जोशी सन 1965 से अनवरत् लिखते रहे और वे राजस्थान ही नहीं राष्टीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने में सफल रहे । उनका जन्म 30 अगस्त, 1935 जसपुर (उत्तर प्रदेश) में हुआ। वे मूलतः कुमाऊँनी थे। उनके जीवन काल में सात किताबें- मोम का घोड़ा (बाल उपन्यास), नशा (उपन्यास 1985), अधूरी तस्वीर(1972), मुझे भूल जाओ (1996), तलाश जारी है (1998), आठवाँ फेरा (2001), मेरा घर कहाँ है (2004) प्रकाशित हुई और आठवी किताब ओल्ड डोक्यूमेंट (2013) उनके निधनोपरांत प्रकाशित हुई। इसमें बड़ी भूमिका मन्दा यानी परी दीदी की रही है।
आज महेशचन्द्र जोशी को इस संसार से विदा हुए 6 साल हो चुके हैं। वे अपने शब्दों के द्वारा अब भी हमारे बीच बने हुए हैं। उनकी ढेर सारी यादें और बातें अब भी हमें प्रेरित करती हैं। दुनिया की नजरों में वे चले गए हैं पर बहुत बार उनके जाने के बाद मुझे ऐसा लगता रहा है कि वे बीच-बीच में कभी कभार मुझे देखने आते हैं। मैं उन्हें मन्दा की आंखों से झांकता हुआ पाता हूं कि वे मुझे देख रहे हैं। उनका स्नेह और आशीर्वाद हमेशा हमेशा से बना हुआ है और इस बार जब वे झांक रहे थे तब कुछ कह भी रहे थे। उनका कहा मैंने मन्दा से कह दिया है कि वे चाहते हैं अभिनेत्री और रंगमंच की कलाकार अब कवयित्री के रूप में आए। शब्दों की दुनिया बहुत बड़ी है और इस बड़ी दुनिया में एक छोटी सी दुनिया मेरी है। मैं अपनी दुनिया में फैज अहमद फैज की पंक्तियां याद करता हुआ कहना चाहता हूं- कर रहा था गम-ए-जहां का हिसाब, आज तुम याद बेहिसाब आए।
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