05 जून, 2018

नहाना-धोना / डॉ. नीरज दइया

पको जानकर बिल्कुल हैरानी नहीं होगी कि हमारे जीवन का सार बस ‘नहाना-धोना’ ही है। आप तो मुझे ऐसे देखने लगे हैं, जैसे आपको हैरानी हो रही है। चलिए मुझे अपनी बात को बदल कर कहना चाहिए- आपको जानकर बहुत हैरानी होगी कि हमारे जीवन का सार ‘नहाना-धोना’ है। कमाल हो गया साहब, जब मैं कहता हूं कि हैरानी नहीं होगी तब हैरान होते हैं और जब हैरानी होगी कहता हूं तो हैरान होना छोड़ देते हैं! आप तो यह भी नहीं जानते कि कब हैरान होना है और कब नहीं होना है। बेशक आप जानते होंगे पर मैं तो यही कहूंगा कि नहीं जानते हैं। किसी के जानने या नहीं जानने या फिर होने या ना होने से भी ज्यादा जरूरी मेरा कहना है। जब मैं खुद ही मेरे कुछ कहने को जरूरी नहीं मानूंगा तो दूसरे भला क्यों मानेंगे? क्यों मैं ठीक कर रहा हूं ना?
    पहले आप मन में अच्छे से यह फैसला करें कि आपको हैरानी है अथवा नहीं है। अरे यह बात भी भूल गए, मैं पूछ रहा हूं कि नहाने-धोने की बात पर आपको हैरानी है अथवा नहीं है? वैसे आपके हैरान होने अथवा नहीं होने के अतिरिक्त भी एक तीसरी स्थिति है आपकी संवेदनहीनता। यानी आपको कुछ पता चल रहा है अथवा नहीं चल रहा इसका कोई फर्क नहीं पड़ता। आप ही से मैं पूछ रहा हूं- क्या आप अब भी जिंदा है? यह कोई बेहूदा सवाल नहीं है। जीवन और मृत्यु के विषय में अब भी बहुत सारी भ्रांतियां हैं। इसका कारण हमारा होना और नहीं होना दोनों का बहुत पास-पास होना है। इतना पास-पास कि क्षण भर में और कहें उससे भी कम समय में हम कभी भी इधर से उधर जा सकते हैं। ‘गीता’ कहती है कि जीवन बार-बार वस्त्र बदलता है। अभिप्राय यही है कि जीवन का सार ‘नहाना-धोना’ ही है। कुछ को नहाने-धोने की जल्दी लगी रहती है। जब फिर फिर नहाना-धोना है तो डरना कैसा!
    कुछ लोग चिंतन करते हैं कि जीवन इतने वर्षों से चल आ रहा है और चलता जा रहा है। यहां इतने लोग जन्में और मरे, पर नतीजा क्या निकला? सभी इधर से उधर और उधर से इधर चले आ रहे हैं। यह कोई निरा उपदेश नहीं है भैया। मैं आपसे बतियाने के चक्कर में पंच काका के बारे में बताना ही भूल गया। अगला-पिछला जीवन तो याद नहीं पर इस जीवन को तो याद रखना है। मैं घर में हूं और मेरे काका-काकी मुझे बहुत प्यार करते हैं। काका आज सवेरे से ही गार्डन में खोए हैं। मैंने सोचा लौट आएंगे पर बहुत देर लगा दी तो मुझे चिंता होनी चाहिए कि नहीं। मैं उन्हें देखने पहुंचा तो वे घास-फूस में कुछ ढूंढ रहे थे।
    मैंने पूछा- काका, यहां क्या खोजने लगे हो? उन्होंने गर्दन उठाई और बोले- कोई जड़ी-बूंटी खोज रहा हूं। तुझे बताया था ना कि तेरी काकी को जवान करूंगा और फिर हनीमून। इतने में भीतर से काकी चिल्लाई- अरे इतनी देर कर दी, आज नहाना-धोना नहीं है क्या?
    देखिए आप को फिर से थोड़ी हैरानी हुई है। नहीं हुई तो आप ठीक से खुद को समझ नहीं पा रहे हैं। आप को पता ही नहीं चलता कि आपके भीतर-बाहर क्या हो रहा है। आप वही है जो मैंने कहा- संवेदनहीन। आपको संवेदनहीन कहने से आपकी संवेदनाएं जाग गई है और मुझ पर गुस्सा होने लगे हैं। अपना गुस्सा कंट्रोल कीजिए। सेहत के लिए गुस्सा अच्छा नहीं होता है। पता नहीं कितनी-कितनी बीमारियों ने आपको घेर रखा है। ऐसे गर्दन हिलाने से कुछ नहीं होगा। आप बीमार हैं या नहीं, आपको कहां पता है। आपके कहने से कुछ नहीं होता। पांच सौ रुपये देकर चैक-अप कराओ। देखिए कितनी कितनी बीमारियां हैं आपको। पांच हजार के कुछ टेस्ट कराने की फीस बड़ी है या आपका जीवन? पैसा तो क्या है, आपके हाथ का मैल ही है। आप तो जानते हैं- मैल बीमारी की जड़ है। इसी जड़ को हम खत्म करना चाहते हैं। नहाना-धोना भी असल में मैल-मुक्ति है और हमारी काकी जी इसके लिए चिल्ला रही हैं। अब आप मुस्कुराने लगे...... तो क्या आप सही में संवेदनहीन नहीं है? आपमें संवेदनाएं बची हुई है। अरे वाह, आप अब भी जिंदा है!
    अब तो मेरा आपको बस यह बताना शेष है कि पंच काका पागल है। उनसे यह कहना नहीं कि मैंने उन्हें पागल कहा है। लोग क्या बस इधर-उधर ही करते रहते हैं। वे सोचते हैं जीवन का असली आनंद इधर-उधर करने में है। यहां सब कुछ देखा-भाला है और पुरानी चीजों को नए-नए ब्रांड के रूप में बेचते हैं। नया कुछ भी नहीं है। आप और हम सभी, नहा-धो कर फिर से फिर फिर कर आएं हैं। यह जो गार्डन में जड़ी-बूटी ढूंढ़ने का नाटक कर रहे हैं, बहुत पहुंचे हुए आदमी है। कहते हैं कि जवान करने का नुस्का ढूंढ़ रहा हूं, तेरी काकी को जवान करूंगा... ठीक कहा था ना इन्हें मैंने पागल, अरे अगर काकी जवान हो गई तो लोग कहेंगे- बूढ़ा घोड़ा लाल लगाम। नहीं कहेंगे क्या? और हां, मैं यह कहना तो भूल ही गया कि आप संवेदनशील हैं।
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