स्मृति शेष कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ का स्मरण
वह दिन और महीना कौनसा था, अब ठीक-ठीक स्मृति में नहीं है। वैसे मैं जिस दिन और महीने में अभी पहुंचा हूं और जिस स्मृति तक आपको ले जाना चाहता हूं, वहां यह सूचना इतनी आवश्यक भी नहीं है। आवश्यक यह है कि मैं आज से करीब आठ साल पहले बारिश के बाद के किसी उजले दिन में कालीबंगा में कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ के साथ था।
राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में स्थित कालीबंगा ऐतिहासिक महत्त्व का स्थल है। इसी जिले के कवि कागद राजस्थानी और हिंदी के ही नहीं वरन भारतीय कविता के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर रहे हैं। आपका जन्म 05 जुलाई, 1957 को केसरीसिंहपुर (श्रीगंगानगर) में हुआ और 12 अगस्त, 2016 को इस संसार से विदा होना अंकित किया गया है। वे विदा जरूर हो गए हैं किंतु ऐसा बहुत कुछ है जो अब भी अहसास करता रहा है कि वे यहीं कहीं हमारे आस-पास है। यहीं हमारे आस-पास उनके होने की अनेक स्मृतियां है।
मैं स्मरण कर रहा हूं, उस दिन उन्होंने मुझे कहा कि कालीबंगा के इन थेहड़ों में वे अनुभूत करते हैं कि किसी विगत समय में वे यहीं आदिम जाति के संग-संग रहे हैं। जैसे वे समय के पार बहुत दूर विगत में धड़कते जीवन की धड़कनें अपनी सांसों में महसूस करते हुए कहीं दूसरे ही लोक में खो गए थे। मैंने उनके चेहरे पर अजीब से भावों को देखा था। उनके मन में ना जाने कैसी ऊहापोह चल रही थी।
हमारी तमाम तकनीकी उपलब्धियों के बाद भी मन के भावों और भीतर चलने वाली ऊहापोह की थाह बेहद मुश्किल है। साहित्य इस मुश्किल को आसान करता है। खासकर काव्य में ऐसे जटिल और गुंफित भावों की अभिव्यक्ति होती है। कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ का राजस्थानी कविता-संग्रह ‘आंख भर चितराम’ (2009) है, जो उन्हीं दिनों आया था। यह संयोग है कि इस कृति का ब्लर्ब मैंने लिखा था। इस संग्रह में ‘कालीबंगा’ शृंखला के अंतर्गत इक्कीस कविताएं हैं। सघन अनुभूतियों से इन कविताओं में कालीबंगा को कवि ने शब्दों में साकार किया है।
एक वरिष्ठ कवि ने कहा कि इस पुस्तक का नाम ‘आंख भर चितराम’ ठीक नहीं है। हथेली चित्रों से भरी हो सकती हैं, पर आंख का भरना तो रोना होता है। इस नाम का सुझाव भी मेरा था, जिसे कागद जी बड़ी सहजता से स्वीकार कर लिया था। इसलिए इसका यश-अपयश मेरा भी है। इस संग्रह में बहुत-सी कविताएं चित्रात्मक है, उन्होंने काफी कविताओं में शब्दों के माध्यम से जैसे अनेक चित्रों को प्रस्तुत किया है। हर आंख री सीमा है, पर हर आंख में असीम भाव भरे हुए हैं। आंख एक ऐसा आइना है, जिनमें ना जाने कितने चित्र समाहित हैं। हमारे जीवन के सभी चित्रों की आंख एक शरण-स्थली है। कठौती में गंगा कहने वाला राजस्थानी समाज क्या आंख को चित्रों का अक्षय-पात्र नहीं मान सकता है। शब्द के अर्थों को विस्तारित भावों के साथ लिया जाना चाहिए या संकुचित और रूढ़ अर्थों तक हमें रुक जाना चाहिए?
दृश्य के रूप में एक चित्र हमारी आंखों के ठीक सामने उपस्थित होता है और दूसरा चित्र ऐसे किसी दृश्य की अनुभूति से कवि सृजित करता है। किनारों के रूप में ऐसे दोनों छोर मेरे सामने थे। कालीबंगा का वर्तमान अपने अतीत को लिए सामने था और कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ के काव्य-संग्रह ‘आंख भर चितराम’ की कालीबंगा पर केंद्रित कविताओं की अनुभूतियां अंतस में हिलोरे ले रही थीं। यह समय का ऐसा पुल था, जिस के पार कवि के साथ चहलकदमी करते हुए मैं पहुंच गया था। कवि के साथ ऐसे ही किसी पुल पर मैं खड़ा था। मुझे डर लगने लगा था।
कालीबंगा के उस सूने उजाड़ में कोई नहीं बस हम दो ही थे। कागद जी की भावुकता मुझे भीगने पर विवश कर रही थी। मैं कवि के व्यक्तिगत जीवन के कुछ पन्नों का अध्येयता था, इसलिए डरता था कि उनकी तबियत बिगड़ गई तो क्या होगा? मैं उस समय कहना तो बहुत चाहता था, पर मुझे मौन ने जकड़े रखा। मेरा मौन रहना ही उचित था, क्योंकि ऐसे समय में जो कुछ भी मैं कह सकता था उससे वे भली-भांति परिचित थे। फिर मैं कवि होकर किसी अग्रज कवि को यह कैसे कहता कि भाई साहब इतना भावुक होना ठीक नहीं है!
मैं तो हिरोशिमा और नागासाकी परमाणु बम के संदर्भ पर अज्ञेय जी की कविता- ‘एक दिन सहसा / सूरज निकला / अरे क्षितिज पर नहीं, / नगर के चौक / धूप बरसी / पर अंतरिक्ष से नहीं, / फटी मिट्टी से।’ में खोया हुआ था। साथ ही उनकी अनुभूति और अभिव्यक्ति की बात को ओम पुरोहित ‘कागद’ से जोड़ कर देख रहा था कि यह होता है किसी विषय में डूबना। कवि अज्ञेय जी की भांति ओम पुरोहित ‘कागद’ भी कालीबंगा को आत्मसात कर के कविताएं रच सके थे।
‘थेहड में सोए शहर / कालीबंगा की गलियां / कहीं तो जाती हैं / जिनमें आते-जाते होंगे / लोग / अब घूमती है / सांय-सांय करती हवा...’
कालीबंगा में मिले कितने ही अवशेषों को सुरक्षित कर लिया गया है। संग्रहालयों के लिए न जाने यहां से कितने अवशेषों को ले जाया जा चुका हैं। समय के लंबे अंतराल के बाद भी यहां की मिट्टी चुप नहीं है, वह बहुत कुछ बोलती है। उसे सुनने वाले कान चाहिए। कागद जी ने इसी मिट्टी का बोलना बहुत पहले सुना था और कविताओं के रूप में हमें अब सुनाया है। वे पारखी हाथ किसी इतिहासकार या भूगोलवेत्ता के नहीं वरन एक कवि के थे, जिन्होंने कुछ अवशेष बटोर लिए थे। कुछ ठीकरियां और चमकदार मिट्टी के अलग-अलग आकारों के पतले बरते जैसे कुछ अवशेष मेरी हथेली पर रख देते हैं। यह कोई जादू ही था कि वे अवशेष वे मेरे हाथ में किसी बड़े बर्तन और ढक्कनों के साथ छोट-छोटे गोल पहियों के रूप में मुझे दिखाई देने लगते हैं।
किसी वृत्ताकार घेरे को देखकर मुझे कालीबंगा में कागज जी की पंक्तियों का स्मरण होने लगता- ‘मिट्टी का / यह गोल घेरा / कोई मांडणा नहीं / चिह्न है / डफ का / काठ से / मिट्टी होने की / यात्रा का।’ इन कविताओं के माध्यम से कालीबंगा का जीवन हमारे भीतर प्राणवाना होता है और हम कवि की उन भावनाओं तक पहुंचने में सक्षम होते हैं तो यह कवि कागद की सबसे बड़ी सफलता कही जानी चाहिए। ‘कालीबंगा’ शीर्षक की राजस्थानी कविताओं का हिंदी अनुवाद डॉ. मदन गोपाल लढ़ा ने किया है।
कालीबंगा पर केंद्रित कविताओं पर मर्मज्ञ सामूहिक रूप से ध्यान देंगे तो पाएंगे कि इतिहास केंद्रित इतनी सांद्र संवेदनाओं से पूरित इन कविताओं की तुलना में बहुत कम कविताओं को हम रख सकेंगे। घरातल की बात करें तो कुछ कवियों की कुछ कविताएं स्वतंत्र रूप से भले अपना अस्थित्व नहीं बना पाती हो, किंतु उनकी शृंखला अथवा सामूहिक प्रारूप से जो काव्य-बोध होता है वह लंबे समय तक अपनी उपस्थिति का अहसास कराता रहता है।
वह दिन और महीना कौनसा था, अब ठीक-ठीक स्मृति में नहीं है। वैसे मैं जिस दिन और महीने में अभी पहुंचा हूं और जिस स्मृति तक आपको ले जाना चाहता हूं, वहां यह सूचना इतनी आवश्यक भी नहीं है। आवश्यक यह है कि मैं आज से करीब आठ साल पहले बारिश के बाद के किसी उजले दिन में कालीबंगा में कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ के साथ था।
राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में स्थित कालीबंगा ऐतिहासिक महत्त्व का स्थल है। इसी जिले के कवि कागद राजस्थानी और हिंदी के ही नहीं वरन भारतीय कविता के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर रहे हैं। आपका जन्म 05 जुलाई, 1957 को केसरीसिंहपुर (श्रीगंगानगर) में हुआ और 12 अगस्त, 2016 को इस संसार से विदा होना अंकित किया गया है। वे विदा जरूर हो गए हैं किंतु ऐसा बहुत कुछ है जो अब भी अहसास करता रहा है कि वे यहीं कहीं हमारे आस-पास है। यहीं हमारे आस-पास उनके होने की अनेक स्मृतियां है।
मैं स्मरण कर रहा हूं, उस दिन उन्होंने मुझे कहा कि कालीबंगा के इन थेहड़ों में वे अनुभूत करते हैं कि किसी विगत समय में वे यहीं आदिम जाति के संग-संग रहे हैं। जैसे वे समय के पार बहुत दूर विगत में धड़कते जीवन की धड़कनें अपनी सांसों में महसूस करते हुए कहीं दूसरे ही लोक में खो गए थे। मैंने उनके चेहरे पर अजीब से भावों को देखा था। उनके मन में ना जाने कैसी ऊहापोह चल रही थी।
हमारी तमाम तकनीकी उपलब्धियों के बाद भी मन के भावों और भीतर चलने वाली ऊहापोह की थाह बेहद मुश्किल है। साहित्य इस मुश्किल को आसान करता है। खासकर काव्य में ऐसे जटिल और गुंफित भावों की अभिव्यक्ति होती है। कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ का राजस्थानी कविता-संग्रह ‘आंख भर चितराम’ (2009) है, जो उन्हीं दिनों आया था। यह संयोग है कि इस कृति का ब्लर्ब मैंने लिखा था। इस संग्रह में ‘कालीबंगा’ शृंखला के अंतर्गत इक्कीस कविताएं हैं। सघन अनुभूतियों से इन कविताओं में कालीबंगा को कवि ने शब्दों में साकार किया है।
एक वरिष्ठ कवि ने कहा कि इस पुस्तक का नाम ‘आंख भर चितराम’ ठीक नहीं है। हथेली चित्रों से भरी हो सकती हैं, पर आंख का भरना तो रोना होता है। इस नाम का सुझाव भी मेरा था, जिसे कागद जी बड़ी सहजता से स्वीकार कर लिया था। इसलिए इसका यश-अपयश मेरा भी है। इस संग्रह में बहुत-सी कविताएं चित्रात्मक है, उन्होंने काफी कविताओं में शब्दों के माध्यम से जैसे अनेक चित्रों को प्रस्तुत किया है। हर आंख री सीमा है, पर हर आंख में असीम भाव भरे हुए हैं। आंख एक ऐसा आइना है, जिनमें ना जाने कितने चित्र समाहित हैं। हमारे जीवन के सभी चित्रों की आंख एक शरण-स्थली है। कठौती में गंगा कहने वाला राजस्थानी समाज क्या आंख को चित्रों का अक्षय-पात्र नहीं मान सकता है। शब्द के अर्थों को विस्तारित भावों के साथ लिया जाना चाहिए या संकुचित और रूढ़ अर्थों तक हमें रुक जाना चाहिए?
दृश्य के रूप में एक चित्र हमारी आंखों के ठीक सामने उपस्थित होता है और दूसरा चित्र ऐसे किसी दृश्य की अनुभूति से कवि सृजित करता है। किनारों के रूप में ऐसे दोनों छोर मेरे सामने थे। कालीबंगा का वर्तमान अपने अतीत को लिए सामने था और कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ के काव्य-संग्रह ‘आंख भर चितराम’ की कालीबंगा पर केंद्रित कविताओं की अनुभूतियां अंतस में हिलोरे ले रही थीं। यह समय का ऐसा पुल था, जिस के पार कवि के साथ चहलकदमी करते हुए मैं पहुंच गया था। कवि के साथ ऐसे ही किसी पुल पर मैं खड़ा था। मुझे डर लगने लगा था।
कालीबंगा के उस सूने उजाड़ में कोई नहीं बस हम दो ही थे। कागद जी की भावुकता मुझे भीगने पर विवश कर रही थी। मैं कवि के व्यक्तिगत जीवन के कुछ पन्नों का अध्येयता था, इसलिए डरता था कि उनकी तबियत बिगड़ गई तो क्या होगा? मैं उस समय कहना तो बहुत चाहता था, पर मुझे मौन ने जकड़े रखा। मेरा मौन रहना ही उचित था, क्योंकि ऐसे समय में जो कुछ भी मैं कह सकता था उससे वे भली-भांति परिचित थे। फिर मैं कवि होकर किसी अग्रज कवि को यह कैसे कहता कि भाई साहब इतना भावुक होना ठीक नहीं है!
मैं तो हिरोशिमा और नागासाकी परमाणु बम के संदर्भ पर अज्ञेय जी की कविता- ‘एक दिन सहसा / सूरज निकला / अरे क्षितिज पर नहीं, / नगर के चौक / धूप बरसी / पर अंतरिक्ष से नहीं, / फटी मिट्टी से।’ में खोया हुआ था। साथ ही उनकी अनुभूति और अभिव्यक्ति की बात को ओम पुरोहित ‘कागद’ से जोड़ कर देख रहा था कि यह होता है किसी विषय में डूबना। कवि अज्ञेय जी की भांति ओम पुरोहित ‘कागद’ भी कालीबंगा को आत्मसात कर के कविताएं रच सके थे।
‘थेहड में सोए शहर / कालीबंगा की गलियां / कहीं तो जाती हैं / जिनमें आते-जाते होंगे / लोग / अब घूमती है / सांय-सांय करती हवा...’
कालीबंगा में मिले कितने ही अवशेषों को सुरक्षित कर लिया गया है। संग्रहालयों के लिए न जाने यहां से कितने अवशेषों को ले जाया जा चुका हैं। समय के लंबे अंतराल के बाद भी यहां की मिट्टी चुप नहीं है, वह बहुत कुछ बोलती है। उसे सुनने वाले कान चाहिए। कागद जी ने इसी मिट्टी का बोलना बहुत पहले सुना था और कविताओं के रूप में हमें अब सुनाया है। वे पारखी हाथ किसी इतिहासकार या भूगोलवेत्ता के नहीं वरन एक कवि के थे, जिन्होंने कुछ अवशेष बटोर लिए थे। कुछ ठीकरियां और चमकदार मिट्टी के अलग-अलग आकारों के पतले बरते जैसे कुछ अवशेष मेरी हथेली पर रख देते हैं। यह कोई जादू ही था कि वे अवशेष वे मेरे हाथ में किसी बड़े बर्तन और ढक्कनों के साथ छोट-छोटे गोल पहियों के रूप में मुझे दिखाई देने लगते हैं।
किसी वृत्ताकार घेरे को देखकर मुझे कालीबंगा में कागज जी की पंक्तियों का स्मरण होने लगता- ‘मिट्टी का / यह गोल घेरा / कोई मांडणा नहीं / चिह्न है / डफ का / काठ से / मिट्टी होने की / यात्रा का।’ इन कविताओं के माध्यम से कालीबंगा का जीवन हमारे भीतर प्राणवाना होता है और हम कवि की उन भावनाओं तक पहुंचने में सक्षम होते हैं तो यह कवि कागद की सबसे बड़ी सफलता कही जानी चाहिए। ‘कालीबंगा’ शीर्षक की राजस्थानी कविताओं का हिंदी अनुवाद डॉ. मदन गोपाल लढ़ा ने किया है।
कालीबंगा पर केंद्रित कविताओं पर मर्मज्ञ सामूहिक रूप से ध्यान देंगे तो पाएंगे कि इतिहास केंद्रित इतनी सांद्र संवेदनाओं से पूरित इन कविताओं की तुलना में बहुत कम कविताओं को हम रख सकेंगे। घरातल की बात करें तो कुछ कवियों की कुछ कविताएं स्वतंत्र रूप से भले अपना अस्थित्व नहीं बना पाती हो, किंतु उनकी शृंखला अथवा सामूहिक प्रारूप से जो काव्य-बोध होता है वह लंबे समय तक अपनी उपस्थिति का अहसास कराता रहता है।


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