23 फ़रवरी, 2018

साहित्य अकादेमी पुरस्कार (राजस्थानी) 2017 नीरज दइया 13-02-2018

   खम्मा-घणी सा, राम-राम। आज अणमाप हरख री वेळा जीसा नीं है, पण म्हारो मन कैवै- बै अठै ई बिराजै। बां री आसीस अर ओळूं हरदम साथै रैवै। म्हनै तो इयां पण लखावै जाणै म्हैं बां री आंगळी पकड़्या ई अठै लग पूग्यो हूं। साहित्य अकादेमी पुरस्कार रै मौकै बां मान्यता री मांग राखी ही, अर म्हैं ई सागण बात कैय रैयो हूं- राजस्थानी भासा म्हारै रगत रळियोड़ी है... अबै हिंदी में म्हैं म्हारी बात राखणी चावूं।
    सभागार में उपस्थित भारतीय भाषाओं के सभी सुधीजनों और सम्मानित मंच को मैं प्रणाम करता हूं। अध्यक्ष महोदय, मैं अपनी बात कहने से पूर्व साहित्य अकादेमी परिवार, राजस्थानी भाषा परामर्श मंडल, पुरस्कार चयन समिति और भाषा-संयोजक वरिष्ठ कवि-आलोचक-नाटककार डॉ. अर्जुनदेव चारण का आभार ज्ञापित करता हूं। मेरे लिए यह अपरिमित हर्ष का विषय है कि मेरे पिता सांवर दइया को वर्ष 1985 का साहित्य अकादेमी पुरस्कार उनके कहानी संग्रह ‘एक दुनिया म्हारी’ के लिए अर्पित किया गया और मुझे राजस्थानी कहानी आलोचना की पुस्तक ‘बिना हासलपाई’ के लिए।
    आज अगर मेरे पिता संसार में होते तो इस पुरस्कार की सर्वाधिक खुशी उन्हें होती। पढ़े लिखे दिमाग की त्रासदी यह है कि उसे मन की सभी बातों पर यकीन नहीं होता। सच जो भी हो पर मुझे लगता है कि वे इस संसार में नहीं होकर भी यहीं मेरी दुनिया में है। मेरी पहचान बचपन में उनकी दुनिया से हुई, मुझे साहित्यिक वातावरण मिला। उनके मित्रों और घर में मिली अनेक पुस्तकों ने इस दुनिया के प्रति मेरे आकर्षण को बढ़ावा दिया। समान परिस्थितियों में हम दो भाई साथ रहे, किंतु साहित्यिक दुनिया का ऐसा असर मुझ पर हुआ कि आज सोचता हूं- मैंने अपने लिए साहित्य को चुना या साहित्य ने मुझे चुना? पिता के रहते मेरा एक लघुकथा संग्रह प्रकाश में आया था। पत्र-पत्रिकाओं में कुछ कविताएं भी छपी थी। लेखन के आरंभिक दौर में मैंने राजस्थानी के साथ देशी-विदेशी साहित्य को जानने-समझने का प्रयास किया। अनेक विषयों पर हमारी चर्चाएं और हमारा विमर्श होता था। वर्ष 1992 में मेरे पिता का असामयिक निधन 44 वर्ष की अवस्था में हो गया और 24 वर्ष के पुत्र यानी मुझे घर-परिवार की जिम्मेदारियां दे गए। मैंने मेरी सबसे बड़ी जिम्मेदारी उनके अप्रकाशित साहित्य को प्रकाश में लाना था और लगभग पांच वर्षों तक इसी कार्य में लगा रहा। इसी दौरान ‘नेगचार’ पत्रिका संपादन और पुस्तक-प्रकाशन कार्य आरंभ किया। पुस्तक प्रकाशन राजस्थानी में अब भी एक समस्या है। हमारे रचनाकारों का अपनी भाषा और साहित्य के प्रति समर्पण ही है कि वे बिना संवैधानिक मान्यता की मातृभाषा के सभी मोर्चों पर संघर्षरत हैं।
    ‘बिना हासलपाई’ एक गणितीय क्रिया-पद है, जिसका राजस्थानी लोक में अभिप्राय बिना लाग-लपेट के तथ्यपरक कहन से जुड़ता है। आलोचना से हम जिस वस्तुनिष्ठता की अपेक्षा करते हैं, उसे बिना हासलपाई यानी बिना लाग लपेट मैंने विश्लेषित करने का प्रयास किया है। मेरा मत है कि महानताओं के छद्म आवरण आलोचना से ही उजागर होते हैं। रचना की निरपेक्ष परख ही आलोचना का धर्म है। मैं आलोचना के नाम पर रचना का केवल सारांश लिखने का पक्षधर नहीं हूं। हमारी कोशिश रचनाशीलता के आयामों को मर्म के साथ उद्घाटित करने की होनी चाहिए। यदि प्रत्येक रचना एक नया अविष्कार है, तो उसके लिए आलोचना में भी नए-नए आयुधों का आविष्कार जरूरी है। हमें साहित्य के उतरोत्तर विकास के लिए परस्पर विचार-विमर्श को खुले मन से ग्रहण करना चाहिए, किंतु राजस्थानी में ऐसा बहुत कम है।
    लेखकीय प्रवृत्ति की बात करें तो हम जानते हैं कि अपनी प्रशंसा सुनना पसंद करने वाले आलोचना को महत्त्व नहीं देते हैं। आलोचना का अभिप्राय निंदा नहीं है, फिर भी बहुधा इसे इसी भाव में ग्रहण करने वाले साथी इसे समालोचना कहना पसंद करते हैं। समालोचना में भी रचना को सम्यक भाव से देखना जरूरी है। मैं रचना को रचनाकार के नाम से मुक्त कर उसे उसके मूल-पाठ में देखने की अभिलाषा रखता हूं। ऐसा नहीं है कि किसी रचना को पढ़ते ही मैं आलोचना को प्रवृत होता हूं। मेरा अध्ययन, मनन और चिंतन ही मुझे ऐसी स्थिति में पहुंचता है कि मेरे द्वारा आलोचना लिखी जाती है। यांत्रिक आलोचना मैं चाह कर भी नहीं लिख पाता।
    आलोचना पर भरोसा करने वालों का विश्वास बचाना मेरी पहली प्राथमिकता है। मेरा मानना है- प्रत्येक रचना में आलोचना के तंतु विद्यमान होते हैं। इसका कारण मैं रचनाकार में रचना-दृष्टि को मानता हूं, जिसमें प्रथम आलोचना अंतर्निहित है। अस्तु प्रत्येक रचना का पहला आलोचक स्वयं रचनाकार है। रचना को हम शरीर और आलोचना को उसकी छाया कहें तो समय, देश-काल और परिस्थितियों से उस छाया अर्थात आलोचना का प्रारूप निर्धारित होता रहता है। रचना और आलोचना के सत्य युगानुरूप परिवर्तित-परिवर्द्धित होते हैं। रचना के मर्म तक पहुंचने का प्रयास आलोचक और अनुवादक दोनों करते हैं। अनुवाद जहां दो भाषाओं के मध्य सेतु निर्माण है, वहीं आलोचना मूल लेखक और पाठक के बीच पसरी पगडंडियों का यात्रा-विकल्प है। मेरी रुचि आलोचना के अतिरिक्त कविता और अनुवाद आदि में भी रही है। साहित्य अकादेमी द्वारा मान्यता प्राप्त 24 भाषाओं से चयनित कवियों का अनुवाद राजस्थानी में संग्रह ‘सबद-नाद’ के लिए करते हुए मैंने अपने कवि और आलोचक मन को विस्तारित होते पाया है।
    आधुनिक राजस्थानी कहानी का प्रस्थान बिंदु वर्ष 1956 में प्रकाशित मुरलीधर व्यास ‘राजस्थानी’ के संग्रह वर्षगांठ को मानते हुए मैंने इस यात्रा को 15-15 वर्षों के चार कालखंड़ों में देखने का प्रयास किया है। दशक के रूढ़ विभाजन से इतर इस विभाजन के मेरे अपने तर्क हैं जिन्हें मैंने ‘बिना हासलपाई’ में विस्तार दिया है। अनेक कहानीकारों का पर्याप्त मूल्यांकन नहीं हुआ अथवा जिन पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया, मैंने अधिक उन्हें लिया है। मुझे कुछ ऐसे कहानीकार भी नजर आए जिन्होंने काम तो बहुत कम किया है, किंतु व्यक्तिगत प्रयासों से ‘पेड न्यूज’ की भांति ‘पेड रिव्यूज’ प्रकाशित-प्रसारित कर खुद को स्थापित और चर्चित करने में सफल रहे हैं।
    आलोचना रचनाकार को मोहभंग से बचाती है, तो कभी मोहभंग का कारण भी बनती है। रचनाकारों का समय पर सम्यक मूल्यांकन नहीं होने से उनकी सतत ऊर्जा का ह्रास और मोहभंग होना स्वाभाविक है। एक उदाहरण हमारे कहानीकार  भंवरलाल ‘भ्रमर’ के संदर्भ से देना चाहूंगा कि उन्होंने एक कहानी ‘बातां’ बहुत पहले लिखी, जिस पर चर्चा नहीं हुई.... किंतु बहुत बाद में वही कहानी बेहद चर्चित रही। समय रहते अगर किसी रचनाकार की मेधा का सम्मान आलोचना नहीं करती है, तो अनेक श्रेष्ठ रचनाओं के मार्ग अवरूद्ध हो जाते हैं। किसी महान रचना को लेकर आलोचना अन्य रचनाकारों को प्रेरित-प्रोत्साहित करती है, वहीं किसी निम्न कोटि की रचना पर रचनाकारों को सजग और सचेत करती है।
    मैंने विभिन्न अवसरों पर विभिन्न आलोचनात्मक आलेख लिखे। पहला संकलन वर्ष 2011 में ‘आलोचना रै आंगणै’ प्रकाशित हुआ। कहानी विधा पर समग्रता से मेरा कार्य ‘बिना हासलपाई’ है। मेरा मानना है कि प्रांतीय भाषाओं के साहित्य की आलोचना हिंदी और अंग्रेजी में भी होनी चाहिए। जिससे हमारे रचनाकारों का परिचय अधिक से अधिक लेखकों, पाठकों और शोधार्थियों तक पहुंच सके। हमें व्यक्ति केंद्रित आलोचना में अपने समकालीनों भी को लेना चाहिए। फिलहाल मैंने ऐसा प्रयास दो रचनाकारों बुलाकी शर्मा और मधु आचार्य ‘आशावादी’ के सृजन-सरोकारों को लेकर किया है। यह भी संयोग है कि ये दोनों रचनाकार बीकानेर के हैं और साहित्य अकादेमी द्वारा विगत वर्षों में पुरस्कृत हुए हैं।
    मेरी आलोचना दृष्टि से किसी की सहमति-असहमति हो सकती है, यह उनका अधिकार है। मैं अपनी आलोचना के विषय में बताना चाहता हूं- यदि मैं अपने स्वर्गीय कहानीकार पिता  सांवर दइया की कहानियों पर लिखने का मन बनाता हूं तो उनके स्नेह-संबंधों को भूलाकार उन्हें केवल एक कहानीकार के रूप में देखता हूं। मेरा आलोचक मुझे यह अधिकार नहीं देता कि राजस्थानी कहानी के संदर्भ में अपने पिता को प्रेमचंद अथवा गुलेरी साबित करने की अनाधिकृत चेष्टा करूं। वे जैसे हैं और जैसा मैं उन्हें अपने मूल्यांकन में पाता हूं मैंने वैसा ही उद्धाटित किया है। उदाहरण के रूप में कहूं तो मैंने अपने पिता की कहानियों पर चर्चा करते हुए प्रयोग के नाम पर विषय-शैली के प्रति उनकी रूढ़ता को उजागर किया है। इसी भांति उनके द्वारा संपादित कहानी-संग्रह ‘उकरास’ की आलोचना करते हुए लिखा है कि उन्होंने कहानीकारों के क्रम में उम्र को महत्त्व दिया है, जबकि कहानीकारों की रचनात्मकता और कहानी-लेखन ग्राफ को क्रम-निर्धारित का आधार बनाना था। परंपरा से आधुनिकता की यात्रा एक क्रमबद्धता का नाम है, जिसमें रचनाकारों के स्थान-निर्धारण का कार्य आलोचना करती है। ऐसा ही कुछ मैंने ‘बिना हासलपाई’ में प्रयास किया है।
    हमारे यहां लोककथाओं की समृद्ध परंपरा रही है। विजयदान देथा, लक्ष्मीकुमारी चूड़ावत, नानूराम संस्कर्ता, मूलचंद प्रणेश जैसे अनेक रचनाकारों ने राजस्थानी लोककथाओं को लिपिबद्ध कर भाषा और लोक साहित्य को समृद्ध किया है। वर्ष 1970-71 में आधुनिक कहानी के आरंभिक बिंदु को खोजते हुए मैंने एक संदर्भ में लिखा है कि आधुनिक कहानी का आरंभ विजयदान देथा से नहीं कर के हमें नृसिंह राजपुरोहित से करना चाहिए, क्यों कि बिज्जी वर्षों लोककथाएं लिखते रहे हैं। उन्होंने सिर्फ दो-चार मौलिक कहानियां लिखी हैं, इस कारण उन्हें हम गुलेरी तो मान सकते हैं, किंतु राजस्थानी कहानी के प्रेमचंद नृसिंह राजपुरोहित माने जाएंगे। इसमें किसी रचनाकार के कार्यों की अवमानना अथवा अवहेला नहीं है।
    यहां यह उल्लेख भी जरूरी है कि मैं कहानी आलोचना का विधिवत आरंभ वर्ष 1998 में आलोचक डॉ. अर्जुनदेव चारण की पुस्तक ‘राजस्थानी काहणी : परंपरा विकास’ से मानता हूं। उन्होंने आधुनिक कहानी की विशद चर्चा करते हुए अपने अध्ययन को पांच कहानीकारों पर केंद्रित किया था। वर्षों तक इस दिशा में व्यवस्थित कोई कार्य प्रकाश में नहीं आया। इस बीच आधुनिक कहानियां भारतीय कहानी में अपनी उल्लेखनीय उपस्थिति लगातार दर्ज करवा रही थी, जिसे विस्तार से रेखांकित करते हुए मैंने अपने अध्ययन का मुख्य आधार 25 कहानीकारों को बनाया। आलोचना के लिए किसी रचना को आधार बनाए बिना कुछ कहना अथवा मान्यताओं को देशी-विदेशी उदाहरणों से पुष्ट करने की तुलना में मुझे अपनी भाषा के रचनाकारों को लेना अधिक उचित जान पड़ता है। ‘बिना हासलपाई’ मेरा एक विनम्र प्रयास रहा है, जिसे अकादेमी ने सम्मान देकर मुझे भविष्य में आलोचना के क्षेत्र में काम करने का हौसला, हिम्मत और समर्थन दिया है। कहानी की भांति राजस्थानी उपन्यास विधा में भी उल्लेखनीय कार्य हुआ है। कहानी की तुलना में उपन्यास का कैनवास विशद और व्यापक होता है। ऐसे में आलोचना कुछ संकेत यानी कुछ दिशाओं की तरफ देखने का आग्रह करती है। इसी भावबोध से जुड़ी मेरी आगामी पुस्तक का नाम है- ‘आंगळी-सीध’।
    इस अवसर पर मुझे प्रेरित-प्रोत्साहित करने वाले अनेक नाम स्मरण में आ रहे हैं। जैसे मोहन आलोक, भंवरलाल ‘भ्रमर’, नंद भारद्वाज, कन्हैयालाल भाटी, बुलाकी शर्मा, मधु आचार्य ‘आशावादी’, नवनीत पाण्डे, मदन सैनी, मीठेश निर्मोही, मंगत बादल, राजेन्द्र जोशी और डॉ. मदनगोपाल लढ़ा आदि ऐसे रचनाकार हैं जिन्होंने समय-समय पर अपने सकारात्मक सुझाव दिए। इन सभी और ऐसे अनेक मित्रों-पाठकों के प्रति मैं हृदय की अतल गहराई से आभार ज्ञापित करता हूं। आभार के इस क्रम में मैं अपनी जीवन-संगिनी वर्षा दइया, दोनों पुत्रियां रौनक, प्रांजल और पुत्र रचित को भी यहां याद करता हूं, हालांकि मैं जानता हूं कि मुझ से आभार-ज्ञापन की अपेक्षा उन्हें कभी नहीं रही है। मुझे लगता है कि मेरे भीतर के लेखक ने अगर कुछ भी बेहतर किया है तो वह इन कारकों-उत्प्रेरकों ने संभव बनाया है।
    अंत में एक बेहद जरूरी मुद्दा साझा करना चाहता हूं। भारतीय भाषाओं के इस विशाल प्रांगण में राजस्थानी का सतत अवदान रहा है। राजस्थानी भाषा मेरे रक्त में घुली हुई है...। आज जब पूरा विश्व मातृभाषाओं के पक्ष में है, तो ऐसा कोई कारण नजर नहीं आता कि मेरी अथवा किसी अन्य मातृभाषा के साथ अन्याय हो। भारत की तमाम भाषाओं के साथ हिंदी का भरपूर सम्मान करते हुए इस मंच से मैं अपनी मातृभाषा राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता प्रदान करने की गुजारिश करता हूं। मेरा यह सम्मान सही अर्थों में तभी पूरा सम्मान होगा जव संवैधानिक मान्यता के लिए वर्षों पहले राजस्थान विधान सभा के पारित प्रस्ताव को केंद्र सरकार अविलंब मंजूर करें।
जय राजस्थान। जय राजस्थानी। जय हिंद। जय हिंदी।
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