21 फ़रवरी, 2018

जाग, जाग! ओ धोरां वाला देश जाग / नीरज दइया

    विश्व प्रसिद्ध देशनोक की धरा के कवि मनुज देपावत ने वर्षों पहले एक गीत लिखा था- ’ओ धोरां वाला देश जाग.....’ किंतु छाती पर पड़े उस ‘पेणै नाग’ ने हमारी अनगिनत सांसें पी ली और अभी भी वह सांसें पीए जा रहा है। बिना भाषा, साहित्य और संस्कृति के मनुष्य पशु समान कहा गया है। यह हमारी पशुता नहीं तो भला क्या है कि हम हमारी मृत्य का समय भी नहीं पहचान पा रहे हैं। जो राजस्थानी भाषा हमारे रक्त में घुली हुई है, जिस भाषा के होने का अहसास हमारी सांस के हर स्वर में है। उसी भाषा के दुर्दिन हैं कि उसे संवैधानिक मान्यता देने में अब भी कोताही बरती जा रही है। क्या यह विचित्र बात नहीं है कि पूरे देश में ‘राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा’ 2005 और ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम’ 2009 को लागू किए जाने के उपरांत भी राजस्थान के बच्चों के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है। इस सत्य से भला कौन मुंह मोड़ सकता है कि यह बच्चों का अधिकार है, उनकी प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में ही होनी चाहिए। फिर क्यों राजस्थान के बच्चों को उनके इस अधिकार से अब तक वंचित रखा गया है? उन्हें अपनी मातृभाषा में शिक्षा के अधिकार से दिया ही जाना चाहिए। हमारा जागना इस संदर्भ में बेहद जरूरी है, नहीं तो आने वाला समय हमें कभी माफ नहीं करेगा। ‘यूनेस्को’ द्वारा पूरे विश्व में मातृभाषा दिवस मनाने का यही उद्देश्य है कि मातृभाषाएं फले-फूले और विकसित हों। बहुभाषाएं हमारी समृद्धि का प्रतीक है।
    हिंदी के हित में अपना उत्सर्ग करने वाली राजस्थानी जो राजस्थान में पटरानी थी उसे अब दासी बना दिया है, फिर भी हम धैर्य धारण किए हुए हैं। हमारे धीरज अथवा धैर्य यह अंतिम समय चल है, अब या तो हमारी भाषा को मान्यता मिलेगी नहीं तो हमें एक एक कर भाषा के लिए शहीद होना पड़ेगा। इसका आगाज राजस्थानी के प्रख्यात साहित्यकार देवकिशन राजपुरोहित ने किया है। उनका ‘मरणो-धरणो’ को इसी अर्थ में लिया जाना चाहिए कि हमारी बात गंभीरता से नहीं सुनी जा रही है। विगत वर्षों का इतिहास देखें तो राजस्थानी मान्यता के अनेक स्तरों पर कार्य हुआ है और हमने हमारी बात को बहुत शालीनता के साथ प्रस्तुत भी किया है। उदाहरण के लिए राजस्थानी की प्रसिद्ध पत्रिका ‘माणक’ के संपादक पदम मेहता ने केंद्र सरकार के अब तक के सभी प्रधानमंत्रियों से मान्यता के संबंध में अनुनय-पत्र और अनेक साक्ष्य समय समय पर प्रस्तुत किए हैं। यह तो महज एक उदाहरण है किंतु राजस्थान की विधान सभा तो पूरे राजस्थान खी जनता की तरफ से राजस्थानी के संबंध में निर्णय ले चुकी है। विधान सभा द्वारा पारित प्रस्ताव पर भी केंद्र सरकार अब तक आंखें नहीं खोल रही है। देश के एक शिक्षत नागरिक और शिक्षक के रूप में मेरा सविनय अनुरोध है कि मातृभाषा की बात बच्चों के हित में हम नहीं करेंगे तो कौन करेगा। यह हमारी जन-भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं तो भला क्या है? आश्चर्य है कि सत्ता में बहुमत से राजनीति करने वाली सरकारें ही बहुमत का सम्मान नहीं करती। क्या ऐसी स्थितियों में भी धोरा वाले देश में जागरण-गीत नहीं सुना जाएगा।
    समय पर राजस्थानी को मान्यता नहीं देकर हमारी युवा पीढ़ी को उनकी जड़ों से कटने का कुचक्र है, जो लंबे समय से चल रहा है फिर भी हम सोए हुए हैं! हमारी मां की भाषा ही हमारी मातृभाषा है, किंतु अब जिस पीढ़ी को हम युवा पीढ़ी कहते है, उस युवा पीढ़ी की मां और उनकी भाषा के साथ तो अत्याचार हो चुका है। उन्हें अपने अधिकारों से वंचित कर हिंदी और अंग्रेजी को थोपा गया था। ऐसे में कुछ आधुनिकता के कुचक्र में आए और अपनी भाषा को ही छोड़ कर दिखावे की इस दुनिया में बहक गए। इस पूरे खेल का असर यह हुआ कि राजस्थानी समाज भी अपनी मातृभाषा राजस्थानी से कटता जा रहा है। क्या ऐसी रणनीति से हम हमारी मातृभाषा हिंदी को मानने लग जाएं तो दोष किसका है? यदि हमारे देश की आजादी का यही अर्थ है कि हमारी भाषा को जड़ों से ही उखाड़ दिया जाएगा फिर तो यह गुलाम बनाने की दोहरी नीति है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम जानें कि हमारी भाषा, साहित्य और संस्कृति की वह विरासर है जिसे हम हमारी असली हेमाणी कह सकते हैं। इस का संरक्षण हमें ही करना है। इन सब का यह अर्थ अनजाने में भी नहीं लिया जाए कि हम हिंदी अथवा किसी अन्य भाषा के विरोध में है। हमारा बस इतना कहना है कि राजस्थानी हमारी मां है और हिंदी मौसी। हमारी मां राजस्थानी ने ही हमें ऐसे संस्कार दिए हैं कि हम हमारी मौसी अथवा अन्य किसी भी पारिवारिक भाषाओं का सदा सम्मान ही करेंगे। यह सर्वविदित सत्य है कि क्षेत्रीय भाषाओं के पोषण से हिंदी का पोषण होगा और वह समृद्ध होगी।
    हिंदी के कुछ विद्वान पढ़े-लिखे होकर भी अनपढ़ों सा व्यवहार करते हैं। भाषा विज्ञान के स्पष्ट प्रावधानों के उपरांत भी वे भाषा और बोली का विभेद नहीं समझ पा रहे हैं। सभी शर्तों को पूरा करने वाली राजस्थानी यदि अब भी बोली है और उसको मान्यता नहीं दी जा सकती है तब भी यह यक्ष प्रश्न है कि इसके विकास और हमारी धरोहर के संरक्षण के लिए पर्याप्त व्यवस्थाएं क्यों नहीं हुई है। रोड़े अटकाने वाले यह भी कहते हैं कि राजस्थानी में अनेक बोलियां है। भाषा की आंचलिकता तो प्रत्येक भाषा में विद्यमान है। राजस्थानी जितना विशाल शब्द-कोश अन्य भाषाओं में नहीं है। लोक व्यवहार में ऐसे-ऐसे शब्द और उक्तियां है कि उनका अनुवाद के माध्यम से भाव और अभिप्राय व्यंजित नहीं किया जा सकता है। राजस्थानी ने ही हिंदी को पृथ्वीराज रासो और मीरा पदावली जैसी अनेक अनुपम कृतियां प्रदान की है। राजस्थानी के आधुनिक साहित्य के बिना भारतीय साहित्य की चर्चा असंभव है। राजस्थानी भाषा, साहित्य और संस्कृति का रंग हमारी भारतीयता से अलग करना असंभव है। इस रंग से ही सभी रंग सुशोभित हैं।
    इस धरा के वीरों का स्मरण कीजिए जो अपना सीस कट जाने के उपरांत भी युद्ध-भूमि में अपने शत्रुओं का नाश करने की क्षमता रखते थे। यहां की मिट्टी के कण-कण में इसकी गौरव गाथा अब भी धड़क रही है। जिस दिन यह मिट्टी आवाज लगाएगी, उसी दिन पूरा राजस्थान उठ खड़ा होगा। गांधी और अहिंसा के हम पुजारी हैं। यहां लूण यानी नमक की आन रखने वाले धरा के कोने-कोने में मिलेंगे, किंतु साथ ही प्रश्न यह है कि अपने बच्चों और परिवारों के लिए राणा प्रताप की भांति प्रधानमंत्री जी को पाति लिखने वाले हम राजस्थानी किसी कवि की प्रतीक्षा में हैं जो हमें जग जाने को कहे? कवि मनुज देपावत बहुत पहले कहता हुआ इस संसार से विदा हो चुका है, अब बस हमें हमारी आत्मा की आवाज सुननी है। देखिए आत्मा से क्या आवाज आ रही है? यदि भाव सुंदर शब्दों में प्रगट करना चाहें तो जनकवि कन्हैयालाल सेठिया के शब्द हैं- ‘खालीधड़ की कद हुवै चैरे बिना पिछाण, मायड़ भाषा रै बिना क्यां रो राजस्थान।’
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