मायड़ भाषा से अनजान रहकर अंग्रेजी में गिटपिट करके खुद को बड़ा आदमी होने का दिखावा करने वाले चाहे कितनी भी उन्नति कर लें, वे सदैव हीन ही रहते हैं। भाषायी ज्ञान अच्छी बात है, लेकिन मातृभाषा की कीमत पर कतई नहीं।
उदाहरण के लिए राजस्थानी में ‘ळ’ एक विशिष्ट ध्वनि है किंतु प्रत्येक ‘ल’ के लिए ‘ळ’ प्रयुक्त नहीं होता है। बल (ताकत) और बळ (जलना) इसके सहज उदाहरण हैं। अनेक लोकगीत ऐसे हैं जिनका स्वरूप बदलता जा रहा है। रिमिक्स और फ्यूजन के दौर में लोकधुनों की मीठास और परंपरागत कौशल धीरे-धीरे बिसरता जा रहा है। क्या अब भी हम ‘कान्या मान्या कुर्र, चलां जोधपुर...’ अथवा ‘आओ नीं पधारो म्हारे देस... ’ जैसे कर्णप्रिय गीत सुनकर भीतर तक रसविभोर नहीं होते हैं?
जीवन से मरण तक के लोकगीत वाले हमारे समाज में अनेकानेक भावों से हम मुदित और हर्षित होते हुए हमारी इस थाती पर इतराते हैं किंतु संकट मंडराता साफ देखा जा सकता है। असंख्य पांडुलिपियां और ग्रंथ संग्रहालयों की विरासत क्या भविष्य में नष्ट हो जाएगी? ऐसे अनेक मुद्दे हैं जिनके लिए राजस्थानी भाषा से युवा पीढ़ी और घर-परिवार से जोड़े रखना जरूरी है।
मातृभाषा का ऋण उतारना होगा
राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 और शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 में मातृभाषा के पक्ष में स्पष्ट प्रावधान होते हुए भी राजस्थान के विद्यार्थियों को उनके मातृभाषा में शिक्षा के अधिकार से वंचित रखना सर्वथा अनुचित और अनैतिक है। भाषा ही ऐसी जड़ें हैं जिससे हमारे भीतर संस्कार पोषित होते हैं और बालक-बालिकाओं को ऐसी त्रासद स्थिति में देखते हुए भी पूरा राजस्थानी समाज कब तक चुप्पी साधे रखेगा। हमारी भाषा को हमारे घर, परिवार और समाज ने हमें सौंपा है तो इस अपेक्षा के साथ कि इसे हम बचाएंगे और आने वाली पीढ़ियों को सौंप कर मातृभाषा के ऋण से मुक्त होंगे। यह संयोग है कि मेरे रक्त में घुली हुई भाषा राजस्थानी है, जो मुझे मेरी मां ने अपने स्तनपान के दिनों मुझे विरासत के रूप में दी थी। राजस्थानी मेरी आत्मा की भाषा है और हिंदी मेरे पेट का पोषण करती है।
हिंदी को ॠणमुक्त करना है
अगर राजस्थान से एक आवाज राजस्थानी के लिए उठती है तो दुगने जोश और उत्साह के साथ राजस्थानी समाज हिंदी का भी समर्थन करता रहा है। क्या मेरा मकान यदि पक्का बनता है तो किसी पड़ौसी अथवा मकान जहां स्थित है वह मकान अथवा स्थान कमजोर होने का कोई अंदेशा है? यदि नहीं तो फिर राजस्थानी भाषा की संवैधानिक मान्यता से हिंदी भला कमजोर कैसे होगी? अगर इतिहास के पन्नों में जाएंगे तो मिलेगा कि राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता देकर हिंदी को ऋण-मुक्त करना है।
म्हारी जबान रो ताळो खोलो
राजस्थानी मान्यता के इस संघर्ष में अनेक पीढ़ियों के अपना अपना योगदान दिया है। अब भी संघर्ष जारी है किंतु इसका रूप परिवर्तित होते नजर आने लगा है। युवा पीढ़ी के क्षोभ में यदि समय रहते यह मांग अब भी पूरित नहीं होती तो गांधी जी के सिद्धांतों पर चलने वाले राजस्थान की हवाओं में आंधी आने की संभवाना बनने लगी है। आज राजस्थानी भाषा की संवैधानिक मान्यता के लिए घर-गली-कस्बों और गांव-गांव से एक ही आवाज आने लगी है- ‘म्हारी जबान रो ताळो खोलो। राजस्थानी म्हारै रगत रळियोड़ी भासा है।’ पर जब अपने ही लोग इसे बिसरा रहे हो तो मान्यता मिलने के बाद भी क्या राजस्थानी खुश हो पाएगी?
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मायड़ भाषा को युवा पीढ़ी में लोकप्रिय बनाने की आवश्यकता
भारत की संस्कृति में राजस्थानी का अपना अनूठा रंग है और इसके बिना सभी रंग फीके हैं। राजस्थानी भाषा का सांस्कृतिक रंग इतना अनूठा है कि किसी के आने और जाने दोनों क्रियाओं के लिए एक ही शब्द 'पधारो सा' को बोलने का अंदाज निराला है।
दीया बुझता नहीं ‘बड़ा’ होता है
हमारे यहाँ दूकान को बंद नहीं मंगळ किया जाता है और दीपक को बुझाने के स्थान पर 'बड़ा करना' शब्द इसकी विशिष्टता दर्शाता है। यहाँ मरण को भी मंगल माना गया है। किसी के निधन के लिए "सौ बरस" कहना अपने आप में हमारे यहां निराला है। लोक की यह धरोहर बची और बनी रहे। बिना राजस्थानी की आत्मा को समझे अनजाने में कुछ लोग भूल करते हैं। जैसे बढ़ना और बढ़ाना क्रिया-पद यहां हिंदी-अर्थ से इतर अर्थ के हैं। राजस्थानी में ये काटना क्रिया से संबधित है, जबकी इनके हिंदी-भाव को 'बधावां' शब्द प्रयुक्त होता है।
इसी भांति राजस्थानी भाषा की सामासिकता भी बेजोड़ है। उदाहरण के लिए 'बासी मूंढै' में जो अर्थ बिना कुछ खाए सुबह सुबह उठने के बाद की स्थति और मनोभावों की व्यंजना है वह हिंदी अथवा अन्य भाषा सहज सुलभ नहीं है। एक एक शब्द के अनेक पर्यायवाची और विभिन्न भावों अर्थों के लिए विशाल शब्द भंडार भी राजस्थानी भाषा की एक अद्वितीय विशेषता है।
इसी भांति राजस्थानी भाषा की सामासिकता भी बेजोड़ है। उदाहरण के लिए 'बासी मूंढै' में जो अर्थ बिना कुछ खाए सुबह सुबह उठने के बाद की स्थति और मनोभावों की व्यंजना है वह हिंदी अथवा अन्य भाषा सहज सुलभ नहीं है। एक एक शब्द के अनेक पर्यायवाची और विभिन्न भावों अर्थों के लिए विशाल शब्द भंडार भी राजस्थानी भाषा की एक अद्वितीय विशेषता है।
कोस-कोस पर बदले वाणी
राजस्थानी भाषा की आंचलिकता उसकी बोलियों में समाहित है। कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी बदलने की बात राजस्थान के लिए हमेशा से कही जाती है, किंतु किंतु संप्रेषण की कहीं कोई समस्या यहाँ नहीं है। कुछ शब्दों और वर्तनी को लेकर जो भिन्नताएं हैं वे मान्यता मिलने और स्कूली शिक्षा में पूर्ण राजस्थानी के लागू होने पर स्वतः हल हो जाएंगी।
राजस्थानी भाषा की आंचलिकता उसकी बोलियों में समाहित है। कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी बदलने की बात राजस्थान के लिए हमेशा से कही जाती है, किंतु किंतु संप्रेषण की कहीं कोई समस्या यहाँ नहीं है। कुछ शब्दों और वर्तनी को लेकर जो भिन्नताएं हैं वे मान्यता मिलने और स्कूली शिक्षा में पूर्ण राजस्थानी के लागू होने पर स्वतः हल हो जाएंगी।
युवा वर्ग का राजस्थानी से कटाव
राजस्थानी को अब तक संवैधानिक मान्यता नहीं प्रदान किए जाने की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि युवा पीढ़ी की भाषाई जड़े ही कटती जा रही है। बढ़ती शिक्षा और बदलती संस्कृति से हमारी नई पीढ़ी एक ऐसे दौर में पहुंचा दी गई है जहां अब उनकी स्मृति में तो मातृभाषा है किंतु वे लोक-व्यवहार में अंग्रेजी और हिंदी के अभ्यस्त होने लगे हैं। किसी भी भाषा में कोई खराबी या कमजोरी नहीं है किंतु बात हमारी मातृभाषा राजस्थानी की विशाल धरोहर को बचाने की है।
राजस्थानी को अब तक संवैधानिक मान्यता नहीं प्रदान किए जाने की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि युवा पीढ़ी की भाषाई जड़े ही कटती जा रही है। बढ़ती शिक्षा और बदलती संस्कृति से हमारी नई पीढ़ी एक ऐसे दौर में पहुंचा दी गई है जहां अब उनकी स्मृति में तो मातृभाषा है किंतु वे लोक-व्यवहार में अंग्रेजी और हिंदी के अभ्यस्त होने लगे हैं। किसी भी भाषा में कोई खराबी या कमजोरी नहीं है किंतु बात हमारी मातृभाषा राजस्थानी की विशाल धरोहर को बचाने की है।
यूनेस्को द्वारा इसी उद्देश्य से 21 फरवरी को ‘अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस' मनाना आरंभ किया गया, जो विश्व में भाषाई एवं सांस्कृतिक विविधता का संरक्षण करना प्राथमिकता मानता है। आवश्यकता बहुभाषिता को बढ़ावा देने की है। एक सर्वेक्षण के अनुसार दुनिया में लगभग 2500 भाषाएं ऐसी हैं, जो खत्म होने के कगार पर पहुंच गई है। आंकड़े यह भी बताते हैं कि लगभग 25% भाषाएं तो विश्व में ऐसी हैं जिन्हें बोलने वालों की संख्या एक हजार से भी कम है।
संपूर्ण और समृद्ध भाषा
सवाल यह है कि क्या राजस्थानी भाषा को लुप्त होने दिया जाए या इसे बचाया जाना जरूरी है। भाषा विज्ञान में बोलियों और भाषाओं के क्रमिक विकास पर व्यापक विवेचन मिलता है। यह विज्ञान हमें बताता है कि कोई बोली भाषा कब, कैसे और क्यों बनती है। इसके साथ ही वैज्ञानिक और तार्किक आधार भी विद्वानों ने नियत किए हैं। उन सभी आधारों पर खरी उतरने वाली राजस्थानी भाषा के विषय में अब भी भाषा-बोली को लेकर भ्रामक स्थिति फैलाई जा रही है।
सवाल यह है कि क्या राजस्थानी भाषा को लुप्त होने दिया जाए या इसे बचाया जाना जरूरी है। भाषा विज्ञान में बोलियों और भाषाओं के क्रमिक विकास पर व्यापक विवेचन मिलता है। यह विज्ञान हमें बताता है कि कोई बोली भाषा कब, कैसे और क्यों बनती है। इसके साथ ही वैज्ञानिक और तार्किक आधार भी विद्वानों ने नियत किए हैं। उन सभी आधारों पर खरी उतरने वाली राजस्थानी भाषा के विषय में अब भी भाषा-बोली को लेकर भ्रामक स्थिति फैलाई जा रही है।
रिमिक्स के दौर में गुम होते शब्द
प्रत्येक भाषा में व्याकरण और भाषिक संदर्भ होते हैं जिनके अभाव में अनेक दोष लोक में धीरे धीरे व्याप्त होने लगते हैं। बदलते समय और समाज में राजस्थानी लोक-साहित्य और भाषा की समझ नहीं होने के अनेक प्रमाण हम देखते हैं। उदाहरण के लिए राजस्थानी में ‘ळ’ एक विशिष्ट ध्वनि है किंतु प्रत्येक ‘ल’ के लिए ‘ळ’ प्रयुक्त नहीं होता है। बल (ताकत) और बळ (जलना) इसके सहज उदाहरण हैं। अनेक लोकगीत ऐसे हैं जिनका स्वरूप बदलता जा रहा है। रिमिक्स और फ्यूजन के दौर में लोकधुनों की मीठास और परंपरागत कौशल धीरे-धीरे बिसरता जा रहा है। क्या अब भी हम ‘कान्या मान्या कुर्र, चलां जोधपुर...’ अथवा ‘आओ नीं पधारो म्हारे देस... ’ जैसे कर्णप्रिय गीत सुनकर भीतर तक रसविभोर नहीं होते हैं?
जीवन से मरण तक के लोकगीत वाले हमारे समाज में अनेकानेक भावों से हम मुदित और हर्षित होते हुए हमारी इस थाती पर इतराते हैं किंतु संकट मंडराता साफ देखा जा सकता है। असंख्य पांडुलिपियां और ग्रंथ संग्रहालयों की विरासत क्या भविष्य में नष्ट हो जाएगी? ऐसे अनेक मुद्दे हैं जिनके लिए राजस्थानी भाषा से युवा पीढ़ी और घर-परिवार से जोड़े रखना जरूरी है।
मातृभाषा का ऋण उतारना होगा
राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 और शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 में मातृभाषा के पक्ष में स्पष्ट प्रावधान होते हुए भी राजस्थान के विद्यार्थियों को उनके मातृभाषा में शिक्षा के अधिकार से वंचित रखना सर्वथा अनुचित और अनैतिक है। भाषा ही ऐसी जड़ें हैं जिससे हमारे भीतर संस्कार पोषित होते हैं और बालक-बालिकाओं को ऐसी त्रासद स्थिति में देखते हुए भी पूरा राजस्थानी समाज कब तक चुप्पी साधे रखेगा। हमारी भाषा को हमारे घर, परिवार और समाज ने हमें सौंपा है तो इस अपेक्षा के साथ कि इसे हम बचाएंगे और आने वाली पीढ़ियों को सौंप कर मातृभाषा के ऋण से मुक्त होंगे। यह संयोग है कि मेरे रक्त में घुली हुई भाषा राजस्थानी है, जो मुझे मेरी मां ने अपने स्तनपान के दिनों मुझे विरासत के रूप में दी थी। राजस्थानी मेरी आत्मा की भाषा है और हिंदी मेरे पेट का पोषण करती है।
हिंदी को ॠणमुक्त करना है
अगर राजस्थान से एक आवाज राजस्थानी के लिए उठती है तो दुगने जोश और उत्साह के साथ राजस्थानी समाज हिंदी का भी समर्थन करता रहा है। क्या मेरा मकान यदि पक्का बनता है तो किसी पड़ौसी अथवा मकान जहां स्थित है वह मकान अथवा स्थान कमजोर होने का कोई अंदेशा है? यदि नहीं तो फिर राजस्थानी भाषा की संवैधानिक मान्यता से हिंदी भला कमजोर कैसे होगी? अगर इतिहास के पन्नों में जाएंगे तो मिलेगा कि राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता देकर हिंदी को ऋण-मुक्त करना है।
म्हारी जबान रो ताळो खोलो
राजस्थानी मान्यता के इस संघर्ष में अनेक पीढ़ियों के अपना अपना योगदान दिया है। अब भी संघर्ष जारी है किंतु इसका रूप परिवर्तित होते नजर आने लगा है। युवा पीढ़ी के क्षोभ में यदि समय रहते यह मांग अब भी पूरित नहीं होती तो गांधी जी के सिद्धांतों पर चलने वाले राजस्थान की हवाओं में आंधी आने की संभवाना बनने लगी है। आज राजस्थानी भाषा की संवैधानिक मान्यता के लिए घर-गली-कस्बों और गांव-गांव से एक ही आवाज आने लगी है- ‘म्हारी जबान रो ताळो खोलो। राजस्थानी म्हारै रगत रळियोड़ी भासा है।’ पर जब अपने ही लोग इसे बिसरा रहे हो तो मान्यता मिलने के बाद भी क्या राजस्थानी खुश हो पाएगी?
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मायड़ भाषा को युवा पीढ़ी में लोकप्रिय बनाने की आवश्यकता
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प्राथमिक शिक्षा का माध्यम राजस्थानी नहीं होने से प्रदेश के बच्चों की जड़े काटती जा रही हैं, इसके अभाव में विकास की सारी संभवानाएं कुंठित होती जाती है। उन पर बहुत छोटी उम्र में ही हिंदी और अंग्रेजी का बोझ डाल कर उनके भाषाई संस्कार छिने जा रहे हैं।
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देश और प्रांत के गठन के समय भाषा का संदर्भ महत्त्वपूर्ण माना गया है। पंजाब के लिए पंजाबी, गुजरात के लिए गुजराती और महाराष्ट्र के लिए मराठी फिर राजस्थान के लिए राजस्थानी क्यों नहीं?
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मातृभाषा से हर आदमी की एक खास पहचान बनती है, हमारी खास पहचान खान-पान से लेकर पहनावे तक में धीरे धीरे लुप्त होती जा रही है।
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आज अंग्रेजी की पौ बारह पच्चीस है। लगने लगा है कि अंग्रेजी से जुड़ कर हम उच्च वर्ग में शामिल हो जाएंगे। हिंदी समेत सभी भारतीय मातृभाषाओं की स्थिति कमजोर होती जा रही है ऐसे में राजस्थानी दोहरी मार झेलने को विवश है।
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प्राथमिक शिक्षा का माध्यम राजस्थानी नहीं होने से प्रदेश के बच्चों की जड़े काटती जा रही हैं, इसके अभाव में विकास की सारी संभवानाएं कुंठित होती जाती है। उन पर बहुत छोटी उम्र में ही हिंदी और अंग्रेजी का बोझ डाल कर उनके भाषाई संस्कार छिने जा रहे हैं।
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देश और प्रांत के गठन के समय भाषा का संदर्भ महत्त्वपूर्ण माना गया है। पंजाब के लिए पंजाबी, गुजरात के लिए गुजराती और महाराष्ट्र के लिए मराठी फिर राजस्थान के लिए राजस्थानी क्यों नहीं?
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मातृभाषा से हर आदमी की एक खास पहचान बनती है, हमारी खास पहचान खान-पान से लेकर पहनावे तक में धीरे धीरे लुप्त होती जा रही है।
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आज अंग्रेजी की पौ बारह पच्चीस है। लगने लगा है कि अंग्रेजी से जुड़ कर हम उच्च वर्ग में शामिल हो जाएंगे। हिंदी समेत सभी भारतीय मातृभाषाओं की स्थिति कमजोर होती जा रही है ऐसे में राजस्थानी दोहरी मार झेलने को विवश है।
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