नीरज दइया
मैं कोई नई बात नहीं बता रहा हूं, यह तो आप सब जानते ही हैं कि लोहा लोहे को काटता है। बिल्कुल छोटी सी बात है और मुझे तो यह भी पता है कि आपको सच और झूठ दोनों स्थितियों में गर्दन हिलाने की आदत है। यह भी हो सकता है कि आप मेरी तरह यह प्रगट नहीं होने देना चाहते हैं कि आप ज्ञानी हैं अथवा अज्ञानी। यह हमारा सर्वकालिक सूत्र है- जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। हम जो कुछ है वह भावना और दृष्टि में हैं। हमारे भारतीय स्वभाव का यह अभिन्न अंग है कि हम जो नहीं जानते हैं, वह भी हम जानते हैं। हमको भगवान ने सब कुछ दिया है। अब सब कुछ में क्या कुछ नहीं आता, यह हम नहीं जानते हैं। इतिहास को देख हम मुदित होते हैं कि हमने दुनिया को जीरो दिया और एक बार पूरे महान हो गए। अब बार-बार महान होना और महानता को प्रमाणित करना हमें रास नहीं आता है। हम तो सादा जीवन उच्च विचार वाले हैं। प्रर्दशन हमें बुल्कुल पसंद नहीं है। और तो और हमारे यहां अज्ञानता प्रदर्शन को तो वर्जित माना गया है।
अब नए बच्चों को कम समझ आता है इसलिए मैं उन्हें समझाने के लिए इसी सूत्र को थोड़ा-सा समझा रहा हूं। मैं समझाने के मामले में थोड़ा कंजूस हूं, आपको यदि पूरा समझा दूंगा तो मुझ से मेरी पूरी समझ चली जाएगी। इसलिए थोड़े में संतोष करें, और मेरी समझ का शेष भाग मेरे पास तो है ही। बाज वक्त मेरे और आपके वही काम आना है। हां, तो मैं बता रहा था लोहा लोहे को काटता है यह आप्त-वाक्य है। वैसे पते की बात यह भी है कि हमारे देश में मूर्खों की कमी नहीं है, जो हरदम रोते रहते हैं। कहते हैं कि बेरोजगारी की समस्या है। अजी अब कौन समझाएं कि समस्या ही समस्या को काटती है। असल में समस्या तो कोई है ही नहीं, बस हमने समस्या को काटने के लिए समस्याओं का अम्बार बनाया है। नहीं समझें, वही लोहा लोहे को काटता है और समस्या समस्या को काटती है।
हमारी बड़ी समस्या बेरोजगारी है पर इसी बेरोजगारी ने कितनों को रोजगार दिया है। भैया बेरोजगारी से तो सरकार को भी रोजगार मिल रहा है। देखते नहीं चार कोई पोस्ट निकालो और फीस के साथ थोक के भाव में फार्मों का अंबार लग जाता था। अब फीस और फार्मों के अंबार की समस्या भी हल हो गई। सब कुछ ऑन-लाइन कर दिया है। देखा हमारी नई परीक्षा तकनीक, सब कुछ ऑन लाइन कर दिया है। जनता के सुख-दुख और अच्छे दिन सब कुछ ऑन लाइन है। पर्यावरण और प्रदूषण की समस्या का भी इससे अंत हुआ कि नहीं, बोलो? अरे कुछ तो बोलो, केवल झूठी गर्दन नहीं हिलानी है। सच को सच बोलना सीखो। चलिए जो मन में है उसे बोलना सीखें। भैया, मन की बात बोलो और अपने सारे राज खोलो। देखिए प्रधानमंत्रीजी भी इतने बड़े पद पर होते हुए अपने मन की बात बोलते हैं ना। जब वे कुछ छुपा के नहीं रखते तो तुम और हम आम आदमी की क्या औकात है। सच में आपको और हमको यानी सब को मन की बात कहनी ही कहनी चाहिए। या गोपियों की भांति हमारे भी मन कोई कृष्ण ले गया है और अब हम बिना मन वाले मन की बात कह ही नहीं सकते हैं।
पंच काका कहते हैं कि झूठे गर्दन हिलाने से नेक-प्रोब्लम हो सकती है। हर समस्या का समाधान समस्या ही है। कोई भी समस्या हो तो सभी यही करते हैं कि किसी दूसरी समस्या की तरफ ध्यान बांट देते हैं। यही राइट चोइस है बेबी, यानी यही उचित उपचार है।
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मैं कोई नई बात नहीं बता रहा हूं, यह तो आप सब जानते ही हैं कि लोहा लोहे को काटता है। बिल्कुल छोटी सी बात है और मुझे तो यह भी पता है कि आपको सच और झूठ दोनों स्थितियों में गर्दन हिलाने की आदत है। यह भी हो सकता है कि आप मेरी तरह यह प्रगट नहीं होने देना चाहते हैं कि आप ज्ञानी हैं अथवा अज्ञानी। यह हमारा सर्वकालिक सूत्र है- जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। हम जो कुछ है वह भावना और दृष्टि में हैं। हमारे भारतीय स्वभाव का यह अभिन्न अंग है कि हम जो नहीं जानते हैं, वह भी हम जानते हैं। हमको भगवान ने सब कुछ दिया है। अब सब कुछ में क्या कुछ नहीं आता, यह हम नहीं जानते हैं। इतिहास को देख हम मुदित होते हैं कि हमने दुनिया को जीरो दिया और एक बार पूरे महान हो गए। अब बार-बार महान होना और महानता को प्रमाणित करना हमें रास नहीं आता है। हम तो सादा जीवन उच्च विचार वाले हैं। प्रर्दशन हमें बुल्कुल पसंद नहीं है। और तो और हमारे यहां अज्ञानता प्रदर्शन को तो वर्जित माना गया है।
अब नए बच्चों को कम समझ आता है इसलिए मैं उन्हें समझाने के लिए इसी सूत्र को थोड़ा-सा समझा रहा हूं। मैं समझाने के मामले में थोड़ा कंजूस हूं, आपको यदि पूरा समझा दूंगा तो मुझ से मेरी पूरी समझ चली जाएगी। इसलिए थोड़े में संतोष करें, और मेरी समझ का शेष भाग मेरे पास तो है ही। बाज वक्त मेरे और आपके वही काम आना है। हां, तो मैं बता रहा था लोहा लोहे को काटता है यह आप्त-वाक्य है। वैसे पते की बात यह भी है कि हमारे देश में मूर्खों की कमी नहीं है, जो हरदम रोते रहते हैं। कहते हैं कि बेरोजगारी की समस्या है। अजी अब कौन समझाएं कि समस्या ही समस्या को काटती है। असल में समस्या तो कोई है ही नहीं, बस हमने समस्या को काटने के लिए समस्याओं का अम्बार बनाया है। नहीं समझें, वही लोहा लोहे को काटता है और समस्या समस्या को काटती है।
हमारी बड़ी समस्या बेरोजगारी है पर इसी बेरोजगारी ने कितनों को रोजगार दिया है। भैया बेरोजगारी से तो सरकार को भी रोजगार मिल रहा है। देखते नहीं चार कोई पोस्ट निकालो और फीस के साथ थोक के भाव में फार्मों का अंबार लग जाता था। अब फीस और फार्मों के अंबार की समस्या भी हल हो गई। सब कुछ ऑन-लाइन कर दिया है। देखा हमारी नई परीक्षा तकनीक, सब कुछ ऑन लाइन कर दिया है। जनता के सुख-दुख और अच्छे दिन सब कुछ ऑन लाइन है। पर्यावरण और प्रदूषण की समस्या का भी इससे अंत हुआ कि नहीं, बोलो? अरे कुछ तो बोलो, केवल झूठी गर्दन नहीं हिलानी है। सच को सच बोलना सीखो। चलिए जो मन में है उसे बोलना सीखें। भैया, मन की बात बोलो और अपने सारे राज खोलो। देखिए प्रधानमंत्रीजी भी इतने बड़े पद पर होते हुए अपने मन की बात बोलते हैं ना। जब वे कुछ छुपा के नहीं रखते तो तुम और हम आम आदमी की क्या औकात है। सच में आपको और हमको यानी सब को मन की बात कहनी ही कहनी चाहिए। या गोपियों की भांति हमारे भी मन कोई कृष्ण ले गया है और अब हम बिना मन वाले मन की बात कह ही नहीं सकते हैं।
पंच काका कहते हैं कि झूठे गर्दन हिलाने से नेक-प्रोब्लम हो सकती है। हर समस्या का समाधान समस्या ही है। कोई भी समस्या हो तो सभी यही करते हैं कि किसी दूसरी समस्या की तरफ ध्यान बांट देते हैं। यही राइट चोइस है बेबी, यानी यही उचित उपचार है।
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