21 फ़रवरी, 2018

भविष्य का बड़ा सवाल - राजस्थानी ? / डॉ. नीरज दइया

 सर्वप्रथम यही विचार करें कि ‘राजस्थानी’ क्या है? इसका पहला जबाब तो यही कि मैं राजस्थानी हूं, क्योंकि मैं राजस्थान में रहता हूं। मैं राजस्थानी होकर भी भारतीय हूं, क्योंकि मेरा राजस्थान भारत में है। कोई व्यक्ति अपने आप में बड़ा अथवा छोटा नहीं होता। उसका बड़ा अथवा छोटा होना स्थिति सापेक्ष है। सत्य केवल यही है कि मैं जितना भी हूं, जैसा भी हूं, मेरा होना एक अस्थित्व है। मुझे वैश्विक-परिदृश्य में एक सूक्ष्म इकाई अथवा नगण्य के रूप में लिया जा सकता है। जाहिर है मैं यहां मेरी नगण्यता, लघुता अथवा सूक्ष्मता की बात नहीं कर रहा हूं। अभिप्राय है कि अखिल विश्व में व्यक्ति नगण्य होने के उपरांत भी स्रष्टि की मानव-जाति अथवा लेखक-समुदाय के अस्तित्त्व की एक अभिव्यक्ति तो है ही। किसी का होना अपने आप में एक चुनौतिपूर्ण है। अणु-परमाणु के भीतर विभिन्न कणों को स्वीकारते हम उनकी शक्तियों को प्रणाम करते हैं। यहां मुझे कवि गिरिजाकुमार माथुर का स्मरण आता है जिन्होंने कविता ‘आदमी का अनुपात’ में लिखा है- प्रदेश कई देश में / देश कई पृथ्‍वी पर / अनगिन नक्षत्रों में / पृथ्‍वी एक छोटी / करोड़ों में एक ही / सबको समेटे हैं / परिधि नभ गंगा की / लाखों ब्रह्मांडों में / अपना एक ब्रह्मांड / हर ब्रह्मांड में / कितनी ही पृथ्वियां / कितनी ही भूमियां / कितनी ही सृष्टियां / यह है अनुपात / आदमी का विराट से....।
            माना कि आदमी एक कमरे में दो दुनिया रचाता है और रचनाकार एक कागज के पन्ने पर कितनी-कितनी दुनिया रचते हैं। बच्चन जी ने लिखा था- मैं और, और जग और, कहां का नाता, मैं बना-बना कितने जग रोज मिटाता; जग जिस पृथ्‍वी पर जोड़ा करता वैभव, मैं प्रति पग से उस पृथ्‍वी को ठुकराता! ऐसे में इसे रचना और रचनाकार की विराटता ही कहेंगे, जिसे वह अपनी भाषा में साकार करता है। कवि उमाशंकर जोशी ने अपनी कविता में जिसे रस का ‘अक्षय-पात्र’ कहा, वह भाषा से संभव है। कवि कुंवर नारायण ने तो भाषा को सहूलियत से बरतने का परामर्श भी दिया है। कहना यह है कि ऐसी सहूलियत मुझे मेरी भाषा राजस्थानी में है। मैं अपनी यह विरासत न केवल सहेजना चाहता हूं वरन भारतीय साहित्य में इसकी एक बानगी रखने का प्रयास कर रहा हूं। वैसे यह सर्वविदित है कि राजस्थानी भाषा को अब तक संवैधानिक मान्यता नहीं है। साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली और राजस्थान के माध्यमिक शिक्षा बोर्ड समेत अनेक विश्वविद्यालयों ने राजस्थानी को स्वतंत्र भाषा के रूप में वर्षों पहले स्वीकार कर लिया है किंतु राजस्थान विधान सभा द्वारा पारित प्रस्ताव केंद्र सरकार ने ठंडे बस्ते में रखा हुआ है। राजस्थान में कभी राज-काज की भाषा राजस्थानी थी, किंतु उसने हिंदी के हित में अपना बलिदान दिया, यह एक ऐतिहासिक सत्य है। बलिदान का प्रतिफल यह है कि अब भी राजस्थान के बच्चों को उनकी मातृभाषा में अध्ययन की व्यवस्था नहीं है। जबकि राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2005 और शिक्षा का अधिकार अधिनियम- 2009 को पूरे देश में लागू किया गया है और राजस्थान में यह लंबित है।
            राजस्थान के भू-भाग और देश-विदेश में करोड़ों जन-जन की भाषा राजस्थानी को विदेशों में भी स्वतंत्र भाषा के रूप में स्वीकारा गया है, किंतु राजभाषा हिंदी के विद्वान गुरुजन इसे अब भी एक बोली के रूप में पढ़ा रहे हैं। यह मिथ्या तथ्य अब भी प्रचलन में है, यह उनकी हठधर्मिता नहीं तो भला क्या है? ‘भाषा विज्ञान’ के स्पष्ट निर्देशों के उपरांत बोली और भाषा के बीच अंतर उन्हें समझ नहीं आता। नहीं तो क्या कारण है कि इस मुद्दे पर वे तर्क सम्मत जांचने-परखने ही हिम्मत नहीं करते हैं। बोली के भाषा बनने के समस्त मानकों को पूरा करने के बाद भी अगर राजस्थानी को बोली ही मानना है तो ऐसे गुरुओं के ज्ञान हेतु कबीर जी ने बहुत पहले लिखा था- गुरुवा सहित सिष्य सब बूढ़े, अंतकाल पछिताना। मुद्दा यह भी बनता है कि सभी मतों, तथ्यों और तर्कों के आधर पर राजस्थानी एक समृद्ध भाषा सिद्ध होने के उपरांत भी अगर आपकी दृष्टि में राजस्थानी एक बोली है, तो आप इस बोली के विकास के लिए क्या कर रहे हैं?
            एक भ्रांति यह भी है कि राजस्थानी की संवैधानिक मान्यता से हिंदी कमजोर होगी। क्या अन्य प्रांतीय भाषाओं की मान्यता से हिंदी कमजोर हुई है? फिर वह राजस्थानी जिसने सदा हिंदी को पुष्ट और पोषित किया है उससे भला कैसे कमजोर होगी। आदिकाल में पृथ्वीराज रासो और मध्यकाल में मीरा सबसे बड़ा प्रमाण है कि राजस्थानी ने हिंदी को सबल बनाया है। आधुनिक काल में अनेक राजस्थानी रचनाकार अपनी मातृभाषा के साथ समानांतर रूप से हिंदी में भी लेखन कर रहे हैं। हिंदी के पूरे समर्थन के साथ हमारी प्रवल आकांक्षा है कि राजस्थानी को जल्द ही संवैधानिक मान्यता मिले। राजस्थानी समाज यह भी कामना करता है कि हिंदी को राजभाषा और राष्ट्रभाषा के रूप में पूरे भारत में मान्यता और सम्मान मिले।
            विनम्रतापूर्वक यहां यह भी निवेदन है कि राजस्थानी भाषा मेरे रक्त में घुली हुई है। मेरी मातृभाषा राजस्थानी के प्रति यहां के बड़े-बूढ़ों और बच्चों के हितों को देखते हुए संवैधानिक दर्जा मिले। हिंदी के सम्मान की सहमति के साथ ही आग्रह है कि क्षेत्रीय भाषाओं की अवमान नहीं होनी चाहिए। राजस्थानी भाषा को मान्यता मिले यही ‘अंतिम इंछा’ लिए महाकवि कन्हैयालाला सेठिया सहित अनेक रचनाकार इस संसार से विदा हो गए। आज भी अगर राजस्थानी के वरिष्ठ रचनाकारों से प्रश्न किया जाएगा कि उनकी अंतिम इंछा क्या है? वे समवेत स्वर में जबाब देंगे- हमारी भाषा की उसका सम्मान मिले। प्रत्येक व्यक्ति की अस्मिता का सवाल भाषा से जुड़ा है। हमारी भाषा में हमारी जड़े हैं और यदि कोई किसी की जड़ों को काटेगा तो कब तक चुप रहा जा सकेगा यह भविष्य का बड़ा सवाल है।
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अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 21 फरवरी 2018

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