09 अगस्त, 2016

वह खेत में उपजाता है कविता-कहानी

राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले का एक छोटा-सा गांव है- परलीका। यह गांव अब आधुनिक राजस्थानी साहित्य में बहुत बड़ा मुकाम बना चुका है। पहली बात तो इस गांव ने कहानी-ग्राम की अवधारणा को साकार कर दिखाया है। दूसरा सच यह है कि इस गांव ने आधुनिक राजस्थानी कहानी को कई प्रमुख कहानीकार दिये हैं, वहीं कहानी-आंदोलन को समर्पित 'कथेसर' जैसी पत्रिका भी यहीं से वर्ष 2012 से प्रकाशित हो रही है। वर्षों पहले हमारे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने नारा दिया था- 'जय जवान, जय किसान।' यह नारा परलीका के एक सीमान्त काश्तकार जिनका नाम रामस्वरूप किसान है, के संदर्भ में सार्थक सिद्ध हो रहा है। सच में यह किसान ही है, जो खेत में अपना पसीना बहाकर खेती करता है। किंतु आश्चर्य इस बात का है कि यह किसान अपने खेत में पिछले बीस वर्षों से बीजों के स्थान पर शब्द डाल रहा है। इतना ही नहीं खेत में कविताएं-कहानियां उपजाता है। अथक मेहनती किसान के विषय में उल्लेखनीय है कि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के बांग्ला नाटक 'रक्त करबी' का इसने राजस्थानी अनुवाद 'राती कणेर' नाम से किया, जिस पर साहित्य अकादेमी अनुवाद पुरस्कार- 2003 अर्पित किया। इतना ही नहीं साहित्य अकादेमी, नयी दिल्ली की ओर से 'राइटर्स इन रेजीडेंसी' के तहत डेढ़ लाख रुपये की स्कॉलरशिप भी रामस्वरूप किसान को दी गई, जिसके अंतर्गत 'तीखी धार' कहानी-संग्रह प्रकाशित हुआ है। साथ ही इसी किसान की रचनाएं राजस्थान के माध्यमिक शिक्षा बोर्ड तथा कई विश्वविद्यालयों के पाठयक्रमों में शामिल हो चुकी हैं।                 
                  वर्षों से खेती और साहित्य में संलग्न रामस्वरूप किसान की रचनाएं और बाल अब पक चुके हैं। आप का जन्म परलीका में राजेराम बेनीवाल के छोटे से घर में 14 अगस्त, 1952 को हुआ। उनके ही गांव में रहने वाले मित्र कवि-कथाकार डॉ. सत्यनारायण सोनी लिखते हैं- 'किसी व्यक्ति को बढ़ी दाढ़ी व घिसे कपड़ों में ऊंटगाड़े पर बैठ नित्य खेत जाते देख कर कौन कह सकता है कि यह राजस्थानी का बड़ा कथाकार और कवि है।' इस बड़े कवि-कथाकार ने वर्तमान में बदल रहे ग्रामीण जन-जीवन का यर्थाथ जिस बारीकी से प्रकट करने का उपक्रम अपनी रचनाओं में किया है, उसे देख हर कोई विस्मित होता है। बहुत सरलता-सहजता से कुछ ही शब्दों में ऐसी मार्मिक बात किसान की रचनाओं में आती है कि वह सीधे दिल और दिमाग पर छा जाती है। 'घर में रमती कवितावां' नामक सीरीज की एक कविता देखें-'छत पर चढ़'र/ हेलौ मारदयौ/ कोई नीं सुणै/ छात रै लटक ज्यावौ/ सगळौ गांव/ भेळौ हुज्यै'। (छत पर चढ़ कर / आवाज़ देने से / कोई नहीं सुनता / छत से लटक जाने पर / पूरा गांव / एकत्रित हो जाता है।) 
                  किसान की कविता की मार्मिकता मूल भाषा राजस्थानी में कहीं अधिक गहराई के साथ उद्घाटित होती है। वे जिस टकसाली राजस्थानी भाषा का प्रयोग करते हैं, वह परलीका क्षेत्र में बोली जाने वाली स्थानीय भाषा है। वे श्रृंगारिक शब्दों से सुसज्जित और कलात्मक भाषा के विरोधी नहीं है, किंतु ऐसी भाषा और कविता किस काम की जो संप्रेषित ही नहीं हो, इसी स्थिति के लिए उनकी 'कांई कै'णौं चावै' की ये पंक्तियां उल्लेखनीय हैं- 'थांरी/ सिणगरयोड़ी भासा रै/ कामणगारै सबदां रो अरथ/ कोनी आवै/ खोल'र/ बता कवि/ कांईं कै'णो चावै?' (तुम्हारी / श्रृंगारित भाषा के / जादुई शब्दों का अर्थ / नहीं समझता / खुल कर / बता कवि / कहना क्या चाहता है?) यहां संवाद की जीवंत भाषा उनको सीधा जन-जन से जोड़ती है।
                   साहित्य में पहला कदम रामस्वरूप किसान ने राजस्थानी काव्य-कृति 'हिवड़ै उपजी पीड़' से रखा। इस कृति में सात सौ से अधिक दोहें हैं। यह रेखांकित करने योग्य है कि राजस्थानी भाषा अपनी मान्यता के लिए संघर्षरत है और प्रकाशन व्यवसाय नाजुक हालत में है। राजस्थानी पुस्तकों की पहुंच पाठकों तक नहीं है या कहें कि खरीद कर पढ़ने वाले पाठक बहुत कम हैं। ऐसी विकट स्थितियों में भी किसान की इस पुस्तक के अब तक तीन संस्करणों का छपना एक कीर्तिमान है। कवि ने परम्परागत दोहा छंद में आधुनिक भावबोध के साथ मर्मस्पर्शी व्यंजनाओं में अपने अनुभवों-अनुभूतियों को यहां साझा किया है। वहीं चित्रात्मक भाषा द्वारा भावों की सरस प्रस्तुति भी। अपनी लघु-पुस्तिका 'कूक्यो घणो कबीर' में 'कीड़िया' को संबोधित सोरठा-प्रयोग किसान ने किया है, तो 'आ बैठ बात करां' में उनकी छंद-मुक्त राजस्थानी कविताएं हैं। मूल हिंदी में एक लम्बी कविता के रूप में कृति 'गांव की गली-गली' का भी प्रकाशन हुआ है। जिसके विषय में वरिष्ठ कवि विजेन्द्र ने लिखा है- 'किसान ने हिंदी को राजस्थानी की ऊर्जा से सींचकर हिंदी को समृद्ध किया है- यह इस कविता की बड़ी उपलब्धि है।' 
                  आधुनिक संदर्भों में संबोधन काव्य का अति आत्मीय रूपांतरण अथवा कहें नव-प्रयोग कृति 'आ बैठ बात करां' में हुआ है। कवि किसान ने जिस अंतरंता से अपने घर में पत्नी से बात करने का उद्घोष किया है, वह बेहद मर्मस्पर्शी और अद्वितीय है। मामूली से मामूली बात को कविता में मार्मिकता के साथ रूपांतरित कर देना उल्लेखनीय है- 'पतझड़ री/ छाती पर/ पग धर पूगां/ बसंत रै घरां/ आ बैठ/ बात करां।' (पतझड़ की/ छाती पर/ पैर रख कर पहुंचे/ बसंत के घर/ आ बैठ/ बात करें।) 
                  ऐसा कहने की क्षमता रखने वाले इस विरल संवेदना के कवि में अक़सर मित्र फैसला नहीं कर पाते कि ये किसान बड़ा कवि है, या बड़ा कहानीकार। और तो और, इसमें किसी बड़े साहित्यकार से भी बड़ा एक इंसान बसता है। जिसे गांव की गली-गली प्यार करती है और जो मित्रों-परिजनों को देखते ही खिल उठता है। दुश्मन के लिए भी बांहें फैलाए चौड़ी छाती सामने करने वाले ऐसे इंसान को ठीक से समझ पाना सरल नहीं है। 
                  'जद-जद/ खाली हाथ/ बा'वड्यो म्हैं घरां/ हांस'र जेब में हाथ मारयौ/ थूं म्हारी/ देखयो तो कविता लाधी/ रिपियां सूं घणौं मान दियौ/ थूं म्हारी कविता नै।' (जब-जब/ खाली हाथ लिए/ मैं घर लौटा/ हंस कर/ जेब टटोलती तुम मेरी/ देखा तो मिली कविता/ रुपयों से अधिक मान दिया/ तुमने मेरी कविता को।) यह रहस्योद्घाटन है जिसमें किसान अपनी अर्द्धांगिनी आनंदी जी को अपनी कविता के निरंतर परिष्कृत होने का श्रेय देते हैं। उनका पूरा परिवार और गांव स्वयं को आनंदित महसूस करता है। किसान मूलत: कवि हैं और कहीं भी हो वह सदा अपनी दुनिया में खोये रहते हैं। जब कभी अपने बेटे की दुकान में बैठने का अवसर आता है, तब भी वे वहां कविता की संभावना तलाश लेते हैं। उनकी एक मूल हिंदी कविता है- 'बेटा जब कभी बाहर जाता है/ अपनी लोह-रछ की दुकान में/ मुझे बैठा जाता है।/ सामान से ठसाठस दुकान/ लिखने का कमरा बन जाती है।/ जिसमें बैठा मैं/ वहां होते हुए भी वहां नहीं होता,/ ग्राहक खाली हाथ लौट जाते हैं।/ बेटा जब लौटता है/ कविता आगे रख कहता हूं-/ आज की कमाई।/ उसके चेहरे से फिसलकर/ एक फीकी मुस्कान/ दुकान में तैरने लगती है।' जिस आदमी ने ठान लिया हो कि उसे बस कवितामय ही रहना है, तो उस के लिए सर्वत्र कविता ही कविता है। वह सोता है जब तक आंख खुली रहती है तब तक छत को ताकते हुए कविताएं ही कविताएं सोचता है। 
                  रामस्वरूप किसान कवि के साथ-साथ निर्भीक संपादक भी हैं। अपनी त्रैमसिक पत्रिका 'कथेसर' के संपादकीय में लेखन, लेखक और जीवन के गूढ़ विर्मश बड़ी सहजता से लिखते हैं। किसी भी मुद्दे पर वे बेबाक लिखने से नहीं चूकते। राजस्थानी कहानी 'दलाल' से रामस्वरूप किसान चर्चा में आये, जिसे 'कथा' संस्था द्वारा पुरस्कृत किया गया और अंग्रेजी अनुवाद द्वारा यह पूरे देश में राजस्थानी कहानी के कीर्तिमान के रूप में चर्चित रही। बेहद छोटे से कथानक व थोड़े से संवादों के बल पर जिस कलात्मकता से किसान ने पशु-दलाल के चरित्र में मानवीय दृष्टिकोण को व्यंजित किया है, वह निसंदेह अविस्मरणीय है। किसान के अब तक तीन राजस्थानी कहानी-संग्रह- 'हाडाखोड़ी', 'तीखी धार', 'बारीक बात' तथा एक लघुकथा-संग्रह- 'सपनै रो सपनो' प्रकाशित हो चुके हैं। किसान की राजस्थानी कहानियों का हिंदी अनुवाद डॉ. सत्यनारायण सोनी ने किया है, जो जल्द ही पुस्तकाकार प्रकाशित होने वाला है। निश्चय ही इस प्रकाशन से किसान के भीतर बसने वाले महान कहानीकार को भारतीय कहानीकर के रूप में पहचाना जाएगा। 
                   किसान की रचनाएं अपनी लौकिक भाषा स्वरूप में अनेक संभावनाएं लिए हुए हैं। वे अपनी रचनाओं में किसी शब्द के लिए शब्दकोश के बजाय गांव परलीका के जन-जन के कंठों से पोषित भाषा का प्रयोग महत्वपूर्ण मानते हैं। उनके इन दिनों चर्चित कहानी-संग्रह 'बारीक बात' के संदर्भ में कवि मोहन आलोक ने अद्भुत भाव-भंगिमा की बेजोड़ यात्रा का क्लासिकल पड़ाव मानते हुए राजस्थानी में लिखा- 'किसान की कहानियां अपने शिल्प को साथ लेकर प्रगट होती हैं। यह एक ऐसा शिल्प है जिसे शिल्प नहीं, उनका भाषाई स्वभाव कहना उपयुक्त होगा। ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक अपने लेखन में 'मचान' पर खड़ा होकर आपने खेत की रखवाली कर रहा है, और भाषा के बुलबुले उसके चहुंदिस तैर रहे हैं।' 
                  खेत में कड़ी मेहनत के बल पर जीवनयापन करने वाले राजस्थानी के इस अनूठे साहित्यकार रामस्वरूप किसान का भाषा मान्यता आंदोलन में भी सक्रिय योगदान रहा है। इन्हें राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर के मुरलीधर व्यास राजस्थानी कथा पुरस्कार सहित अनेक महत्वपूर्ण पुरस्कार एवं सम्मान मिल चुके हैं। साथ ही इनकी अनेक रचनाएं कई भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं।
  
दुनिया इन दिनों  15 अगस्त, 2016 अंक में प्रकाशित। ब्लॉग पोस्ट लिंक

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