18 अगस्त, 2016

मीठी आलोचना का मीठा फल!!

पंच चाचा आज सुबह जल्दी उठ गए और मुझे समझाने में लगे हैं कि अब से जितने भी बड़े-बड़े संपादक, प्रकाशक और पुरस्कार समितियों से जुड़े लेखक-कवि हैं, उनकी किताबों की विस्तार से मीठी-मीठी आलोचनाएं मैं लिखा करूं। उनका कहना है भले इसे दूसरे लेखक प्रशंसा कहे, पर भविष्य में मुझे आलोचना बस मीठी-मीठी और जायकेदार ही लिखनी है।
ऊपरी तौर पर यह सलाह भले कठिन लगे पर इतनी भी कठिन नहीं है कि मानना असंभव हो। फिर इसे मानने से किसी का दम थोड़े ही निकलता है। आलोचना का तो मूलतः स्वभाव ही सामयिक और सोचने योग्य बातों से जुड़ना है। मधुरता को प्रचारित-प्रसारित करना है। यदि रसगुल्लों के लिए प्रसिद्ध शहर बीकानेर में भी रहकर भी मैं मीठी-मीठी आलोचना नहीं लिख सका, तो मेरा यहां रहना बेमानी है। ऐसा करने में लाभ ही लाभ है, यदि आलोचना ज्यादा मीठी हो जाए तो थोड़ी नमकीन खाने की भी सुविधा है।
पंच चाचा का तो कहना है कि जब भी कोई किसी की आलोचना लिखे, साथ में रसगुल्ले और भुजिया लेकर ही बैठना चाहिए। चलते-चलते कलम गलत दिशा में जाने लगे तो झट एक रसगुल्ला मुंह में डालो और कलम को संभालो। और कभी लगे कि मीठे से जी उकता रहा तो भुजिया फाक के स्वाद को पटरी पर ले आओ। पंच चाचा कहते हैं कि जरूरी नहीं हर कहानी संपादक को पसन्द आए और यह भी जरूरी नहीं कि हर किताब पर आलोचक लिखे। भाई संपादक को कोई कहानी पसंद करवाने के लिए कुछ खास तरकीबें हैं और आलोचक को खुश करने के तो बहुत से तरीके हैं।
मैंने कहा कि खास तरकीबों और बहुत से तरीकों से साहित्य का बेड़ा गर्क हो रहा है। अब तो स्वच्छता अभियान चल रहा है। साहित्य में फैलती जा रही गंदगी को अगर आलोचना साफ नहीं करेगी तो कौन करेगा। ये आपकी मीठी-मीठी आलोचना का ही असर है कि हर कोई लेखक-कवि होने का तगमा लगाए घूमता है। ऐसे में एक आलोचना ही है, जिसमें स्व-विवेक से आलोचक को तो बढ़ते रहना है। भाषा जानने-समझने वाले साथी लेखकों-आलोचकों की आलोचना अथवा पाठक-मित्रों के आग्रह से बेखबर। बाखबर यह स्व-विवेक ही है जो किसी आलोचक को स्थापित करता है। यदि मीठी-मीठी आलोचना होती रही तो एक खतरा यह भी है कि अंततः एक दिन ऐसा आएगा जब लोगों का आलोचना नाम से ही भरोसा उठ जाएगा।
पंच चाचा कहां हारने वाले थे, बोले- ‘मीठी आलोचना का मीठा फल!! कभी चखा हो तो जानो। कभी लिखो मीठी आचोलना तब पता चले कि यह मीठा फल क्या होता है। आलोचना लिखना जानते हो तो लेखकों की किताबों में सुंदर-सुंदर भूमिकाएं लिखो, ब्लर्ब लिखो। इससे मधुर संबंध बनते हैं। कभी वे आपके घर मीठा लेकर आते हैं तो कभी आप जाओ मीठा लेकर। इन संबंधों के कारण अनेक बिगड़े या बिगड़ते काम बन जाते हैं। कुछ लोग इसे एक दूसरे के संबंध भुनाना भी कहते हैं। ऐसी बातों से मन खराब नहीं करना चाहिए। हमें बस अपनी किताबें प्रकाशित करवानी है तो जो प्रकाशक करेंगे, उन से हमारे संबंध मधुर होने चाहिए। हमें पुरस्कार चाहिए तो ऐसे निर्णायक ही यह सच्चा और पुनीत कार्य करेंगे जिनसे हमारे संबंध मधुर हो। बिना मधुरता के कुछ भी संभव नहीं भतीजे। कान खोल के सुन ले- यह मधुरता ऐसे नहीं आती है, कई उपाय करने पड़ते हैं। मेरी भतिजियां तो फिर भी नैन-मटका कर के कुछ न कुछ हासिल कर ही लेती हैं पर तू ठहरा खूसट। तुझे मेरी बात माननी ही होगी। तू राजी हो तो ऐसा भी हो सकता है कि तेरी आलोचना के लिए कोई रेट फिक्स कर दूं, मतलब कुछ मीठा-मीठा अग्रिम ले लेते हैं। जैसा जो देने में सक्षम है, उस से वही कुछ लेने में बुराई कहां है। यूं सिर झुकाए मत बैठ। बोल, कुछ तो बोल।’
- नीरज दइया

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