23 अगस्त, 2016

बिना विपक्ष का एक पक्ष

र्षों से भरतीय जनमानस कभी धूप, कभी छांव की संकल्पना से जुड़ा है। हरेक भारतीय जानता है कि कभी सुख और कभी दुख। वह सुख में भले दुख का इंतजार न करता हो, पर दुख में सुख का इंतजार जरूर करता है। मजे की बात यह भी कि दुख के बाद सुख बेहद सुहाता आता है। जब कोई सुखी जीवन जी राहा हो तो भला किसी दुख की कल्पना क्यों करे। दुख को जब जहां जिस रास्ते आना है आ जाए। वह अगर रोकने से रूकने वाला हो तो चिंता भी की जाए। सुख के इंतजार में दुख के दिन काटते हैं और सुख में आने वाले दुख से बेपरवाह जीवन भले जीते हो किंतु यह विषय शोध का है।
    इस नायब विषय पर किसी ने ध्यान नहीं दिया पर हमारे पंच चाचा ने गहनता से इस पर विचार-विमर्श किया। फेसबुक पर सक्रिय चाचा के एक भतीजे को श्रेय जाता है जिसने लिखा कि दूसरे पक्ष तक मेरी पहुंच नहीं है। पंच चाचा बोले- सभी तो मेरे भतीजे हैं फिर ये पहला और दूसरा क्या हुआ। एक तक पहुंच अर दूसरे तक पहुंच नहीं। यह तो निरा वहम है। आज इतने आने-जाने और पहुंचने के साधनों के बाद भी अगर पहुंच नहीं तो कब होगी। भैया तुमको चांद पर तो जाने का कहा नहीं। जब एक ही शहर में एक पक्ष और दूसरा पक्ष किए बैठे हो तो मोबाइल काहे लिए घूमते हो। अरे झट से लगाओ नंबर और करो पहुंच में सब को। तुम्हें किसी दूसरे ने नहीं, तुम्हारे लक्ष्णों ने ही डूबोया है।
    मान की जब कोई एक है तो कोई दूसरा और तीसरा भी होगा। पर बात पंच चाचा के भतीजे की फिर कभी, अभी तो हम एक ऐसे पक्ष की कल्पना करें जिसका कोई विपक्ष नहीं हो। यह देखने में जरूर कुछ पेचीदा लगता है। भैया जहां पक्ष होगा वहां विपक्ष होगा ही जैसे संसार में सुख है तो दुख भी होगा ही। बस यहीं तो इस बात का चाबी है। यहां सब सुख चाहते हैं। चाहना भी चाहिए, अब कबीर का जमाना तो रहा नहीं और वहां भी देखिए- ‘सुखिया सब संसार है, खावै और सोवै। दुखिया दास कबीर है, जागै अरू रोवै॥’ संसार के सुखी होने का इस से बड़ा क्या प्रमाण चाहिए। पंच चाचा कहते हैं- अब कबीर जैसे दुखी होने का समय नहीं है। जागने और रोने की जगह खाना और सोना ही उचित है। खाने और सोने में अब भी अगर कोई बाधक है या हो सकता है तो वह है विपक्ष। इस विपक्ष को क्या हम पक्ष में नहीं ला सकते हैं। अधिक से अधिक कहना ही तो है कि भैया विपक्ष, तू अपने नाम को बदल ले यार। ये वी का तगमा उतार कर पक्ष बन जा। तुझे भी फायदा और हमें तो फायदा ही फायदा।
    पंच चाचा कह रहे हैं- ये समझदार लोग फर्जी फेसबुक आईडी क्यों बनाते हैं? फेस टू फेस बात करो। बिना किसी बात के कोई बात ले बैठे हो। भैसा क्या रखा है- पक्ष और विपक्ष में। सब एक हो जाओ। चारों तरफ हमारा पक्ष ही पक्ष होना चाहिए। फर्जी आईडी से जली-बुझी को हवा देते हो। ट्विटर हो भले फेसबुक इन में कुछ सार नहीं है। कभी कुछ कहते हो कभी कुछ कहते हो। कभी खुद कहते हो, कभी दूसरे-तीसरे से कहलवाते हो। छोड़ो ये सब और अपनी पहुंच का विस्तार करो। किसी को विपक्ष मानो ही मत। कुछ करने से पहले मानना जरूरी है। मन का वहम निकालो और हो जाओ चालू। इतनी गंभीर और ज्ञान की बात को अगर बेसर करना हो तो फेसबुक में खोये रहो। दिन-रात, सुबह-शाम बस फेस बुक ही फेस बुक।
    अब तो भैया अपनी फेक-बुक को छोड़ो, पंच चाचा ने खाना खा लिया है। अब बे चूरी खाते हुए कह रहे है- “हाँ भई भाइड़ो ! फेसबुक से पेट नहीं भरेगा, कुछ खाना होगा। जो होगा देखा जाएगा। अब फेसबुक में बेसी दीदै ना लागाओ। जीमण जीमो और सुपारी-चूरी जो है, खा कर फुल मस्त हो जाओ।”
- नीरज दइया 

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