जिस तरफ जिंदा आदमी की पहचान है उसकी सांसें, उसी तरह किसी
लेखक की पहचान क्या होनी चाहिए? सीधा सा इसका जबाब है- उसका लेखन। अगर कोई आदमी
सांस नहीं ले रहा या कहें जिसकी सांसें पूरी हो चुकी होती है, वह मृत कहलाता है।
इसी तर्ज पर पन्नेखां को मृत लेखक मानना चाहिए। जो लेखन से थक-हार कर वर्षों से
कलम को दूर फेंके बैठा हो, उसे मरा हुआ लेखक माने जाने में हर्ज ही क्या है? माना
पन्नेखां जिंदा है, वह रोज उठता है खाता-पीता और सोता है। यह काम तो हर इंसान करता
है, लेखक का होता यानी हमेशा नहीं तो दो-चार दिन से, या फिर महीने-साल में कभी तो
लिखना होना चाहिए या कि नहीं। पन्नेखां की आखरी किताब बीस साल पहले छपी। मान एक
नहीं पांच-सात छपी और कई पुरस्कार मान-सम्मान भी मिल गए या ले लिए तो क्या हुआ। वे
तब लेखक थे अब नहीं है। पर उनके भक्त हैं कि अब तक उनकी अर्थी को ढोते चले जा रहे
हैं। आखिर कब तक ढोता रहेंगा कोई किसी की अर्थी। जाहिर है कि या तो फन्नेखां को मर
जाना चाहिए या फिर अर्थी पर ही यकायक बैठ जाना चाहिए। गला फाड़ कर चिल्लाना चाहिए-
अरे भैया, नीचे उतारो। मैं अब लिखना चाहता हूं।
पंच चाचा के
विचार हैं- लेखक अमर होता है। कोई लेखक संसार से चला भी जाता है तो भी वह अपने
शब्दों के सांसार में जिंदा रहता है। फन्नेखां ने जब कभी लिखा और खूब लिखा, तभी तो
वह लेखक है। जो एक बार जो लेखक हो गया, वह तो हमेशा के लिए लेखक रहेगा। लेखक को
लेखक मानना पड़ेगा, उसकी मरजी है कि वह लिखे या नहीं लिखे। किताब छपाए या नहीं
छपाए। किताब तो जब छपेगी छप जाएगी। हो सकता है वह लिख-लिख रियाज कर रहा हो। रियाज
बहुत जरूरी है। क्या पता इसी रियाज से आगे चल कर वह ऐसा कुछ रचे जिस पर नोबल
पुरस्कार मिल जाए।
मैंने पंच चाचा
से कहा कि हमारे राजस्थान से नोबल के लिए नामित लेखक विजयदान देथा ‘बिज्जी’ ने भी
खूब रियाज किया था। बताते है कि तीन सौ कहानियां और तेरह सौ कविताएं लिखी फिर
संकल्प किया अपनी मातृभाषा में लिखने का। वे रवीन्द्र को अपना एक गुरु मानते थे और
अपने गुरु की तरह नोबल लाने की पूरी इच्छा थी। तभी तो उस दरवाजे तक पहुंचे। मैंने
माना पंच चाचा ठीक और लोग गलत कहते हैं। हो सकता है कि पिछले बीस वर्षों से
फन्नेखां जी भी रियाज करते रहे हो। रियाज के कई प्रकार है और उसमें गुप्त रियाज का
बड़ा महत्त्व है। ऐसा रियाज जिसे जीते-जी जाहिर नहीं किया जाता।
हमारे बिज्जी
ने रियाज किया था और उसे जाहिर भी किया। अपने आत्मकथ्य और साक्षात्कार में बिज्जी
बोले कि उन्होंने तीन सौ कहानियां और तेरह सौ कविताएं लिखी थी। जो बिज्जी से
परिचित हैं वे जानते हैं कि वे खुद को खुली किताब की तरह रखते थे। बोरूंदा में
उनके पत्राचार, लेखन-विमर्श सभी खुली किताब की तरह उनके जीवन काल में रहे और आज जब
वे संसार में नहीं है तब संकट आ गया कि तीन सौ में से तीन कहानियां और तेरह सौ में
से एक कविता भी किसी की आंखों के सामने नहीं आ पा रही है। नोबल के लिए नामित लेखक
के आरंभिक-सफर को जानने को पाठक-लेखक की उत्सुकता और बेताबी स्वभाविक है। काश ऐसा
होता कि बिज्जी के जीवनकाल में यह रहस्य उजागर हो जाता। आज यह संकट देखना-सहना
नहीं पड़ता। खैर हुआ सो हुआ। जो होता है वह अच्छे के लिए ही होता है। इस पाठ से
हमें सबक लेना है कि ऐसी साधना से हमारा पाठक-वर्ग वंचित नहीं रहे। पन्नेखां विषयक
चिंता वाजिब है। फन्नेखां लेखक नहीं है, ऐसा आरोप उनकी गुप्त-साधना के जग-जाहिर
होने से ही निराधार हो सकेगा।
१६-१२-२०१६ नया अर्जुन श्रीगंगानगर में

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