12 अगस्त, 2016

हियै तराजू तोल के चक्कर में

र बात दो प्रकार की होती है। अंदर की और बाहर की। कहने वाले कहते हैं कि बाहर की बात अंदर जाती है और अंदर की बात बाहर आती है। बात के अंदर-बाहर आने-जाने के कई बार बात बदल जाती है। असली बात बीच राह कहीं खो जाती है। बात चाहे अंदर की हो या बाहर की, मगर बात लगातार होनी चाहिए। बात के समर्थकों का मानना है कि बिना बात के भी बात होनी चाहिए। यह सुन कर मुझे संदेह होता है कि जब बात होगी ही नहीं तब वह अंदर-बाहर कैसे आएगी-जाएगी। बात होती है तब हर जगह की बात अलग-अलग होती है, होनी भी चाहिए। बात पर स्थानीयता का प्रभाव अनेक स्तर पर होता है। किंतु क्या बात नहीं है तब भी ये स्थानीयता पीछा नहीं छोड़ती और दो अलग अलग जगहों पर बिना बात भी अलग-अलग बात संभव होती है। बात का होना या नहीं होना हमारे अंदर-बाहर होने या नहीं होने पर निर्भर करता है। हम एक जगह संतुष्ट नहीं होते इसिलिए कभी अंदर होते हैं और कभी बाहर। जब बात के अंदर होते हैं तब बाहर निकलना चाहते हैं और इसके विपरीत जब हमें बात से बाहर रख दिया जाता है तब बात के ऐन मध्य पहुंच कर नहीं मालूम क्या हासिल करना चाहते हैं।
फिल्म आनंद में राजेश खन्ना जब किसी अनजान आदमी से बात कर सकता है और हम जो जान-पहचान वाले से ही बात करने में कतराते हैं। घर पर कोई सगा-संबंधी आ जाए तो दो-चार सावल-जबाब के बाद सोचते हैं- आगे क्या बात करें? हम इधर-उधर की नहीं मूल बात जानना चाहते हैं कि कोई किस काम से आया है। कभी कहीं आप बिना काम ऐसे ही चले जाएं और यह कह भी दे कि ऐसे ही आ गया मिलने, तो सामने वाला विश्वास नहीं करेगा। उसे अंत तक यही लगता रहेगा कि किसी न किसी काम से ही आप उसके यहां पहुंचे हैं। आज के युग में इतनी जटिलताएं है कि बिना काम के कोई किसी के यहां आता-जाता नहीं। कहीं कहीं तो ऐसा भी है कि कहीं काम हो तो भी समयाभाव है। हम चाह कर भी कहीं आने-जाने में बहुत बार खुद को फसा हुआ पाते हैं और निकल नहीं पाते। इस समय में कोई खाली नहीं। सभी अपने में व्यस्त हैं। कुछ ने व्यस्ताएं ओढ़ रखी है। और कुछ नहीं तो इंटरनेट जो है हमारा बहुत सारा समय खा जाता है। आज जब हम कुछ नहीं, बस समय ही सब कुछ है। मैं सोचता जरूर हूं कि समय पर सही बात करूं पर अक्सर नहीं होता। कुछ समय तो ऐसे सोचते बीत जाता है कि अंदर की बात करूं या बाहर की। बात करता हूं पर बहुत आगे बात का सिरा खो जाता है और सोचने लगता हूं कि बात का आगाज ही गलत कर दिया था। पर मुंह से निकली हुई बात और कमान से निकला हुआ तीर भला वापस कब होते हैं।
‘हियै तराजू तोल के तब मुख बाहर आनी’ के चक्कर में बहुत बार बात तराजू पर तुलती नहीं और मैं चुप रहता हूं। कुछ ऐसे माहिर होते हैं जो बिना बात के भी ढेर सारी बातें कर सकते हैं। मसलन- कैसे हो? क्या कर रहे हो? कहां रहते हो? घर का मकान है या किराये का? इन दिनों क्या कर रहे हो? नौकरी में गुजारा हो जाता है क्या? बच्चे कितने हैं? बेटियों के लिए कोई लड़का देखा क्या? क्यों जमाना बहुत खराब है? तबियत कैसी है? कोई बीमारी तो नहीं? थके-थके उदास क्यों नजर आते हो? तुम्हारा शर्ट बहुत सुंदर है, कहां से खरीदा? हाथ में अंगूठी शनि की पहन रखी है क्या? क्या तुम ग्रहों पर विश्वास करते हो? अखाबार में सब लोग झूठा राशिफल क्यों पढ़ते हैं? मैं तो भूत-प्रेत को नहीं मानता, तुम मानते हो क्या?
ऐसी ढेर सारी बातें को करने से क्या फायदा जो किसी काम की नहीं हो। जो भीतर हो वहीं बाहर मुख पर होनी चाहिए। बातों के बवंडर को देख पंच चाचा कहते हैं- अंदर और बाहर की बात में फर्क क्यों?

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