26 अगस्त, 2016

न कुछ कहना ही बेहतर कहना है

किन्हीं दो संदिग्ध व्यक्तियों ने बीती रात हमारे घर की तरफ पत्थर फेंके तो पंच काका नींद से जाग गए। उन्होंने खिड़की से बाहर देखते हुए उन्हें पहचाने की कोशिश की, पर वे अपने इन दो भतीजों को पूरा पहचान नहीं सके। एक तो आधी रात का वक्त और अब आंखें भी पहले जैसी कहां रही पंच चाचा की।
पर काका के कान अब भी दूर की सुन लेते हैं।
            वे बता रहे हैं कि पत्थर फेंकने वाले जोर जोर से चिल्ला रहे थे-
            पहला : तू कहानीकार नहीं है समझे।
            दूसरा : तू आलोचक नहीं है समझे।
            नए पत्थरों को नीचे से उठा कर फेंकते हुए समवेत : तू कवि भी नहीं है समझे, और हां अनुवादक तो बिल्कुल नहीं है।
            फिर इन्हीं स्वरों में पंच चाचा के कानों तक दो-चार गालियां भी पहुंची, उन उखड़े हुए भतीजों की वे गालियां पंच चाचा कहते हैं दोहराने योग्य नहीं है।
            उन्होंने ऊपर के वाक्यों की पुनरावर्ती के साथ नए वाक्य भी सुने :
            - अबे तू संपादक नहीं है।
            - समझे ले तू कुछ भी नहीं है।
            - हम तुम्हें आदमी भी नहीं मानते कमीने आलोचक। तू हम पर क्यों नहीं लिखता।
            पंच चाचा के धैर्य ने भी इतना सब देख-सुन कर साथ छोड़ दिया, उन्होंने अपनी लाठी उठाई और गेट तक पहुंचे। उनको देखते ही उनके फर्जी भतीजे भाग गए।
            पंच चाचा बड़े ज्ञानी-ध्यानी है। वे मुझे से कह रहे हैं कि तुमने मेरे उन दो फर्जी भतीजों की कितनी भैंसे खोल ली हैं, जो वे नाराज है और गालियां भी निकाल रहे हैं। नहीं तो आज कौन किसको गालियां निकालता है। अब जा ऐसा कर बाड़े में उन्हीं की भैंसों का दूध निकाल कर ला। मैं उनकी भैंसों का दूध पी कर उन भतीजों के नाम अपनी विद्या से जान लूंगा।
            मैंने कहा- नाम जान कर क्या करेंगे।
            पंच चाचा बोले- मैं कुछ भी करूं या ना करूं, ऐसे गुणी भतीजों के नाम तो जानने ही चाहिए ना।
            भैंसों के बाड़े में मैं जा तो रहा हूं पर मेरी समस्या यह है कि मैंने भैंसे तो चाचा के काफी रिस्तेदारों की खोल कर अनजाने में अपना बाड़ा भर लिया है। अब मैं पहचान कैसे करूं कि किस की भैंस कौनसी है?
       हां तो अब सुनो चाचा के अनाम भतीजो! मेरी और आपकी कोई लड़ाई नहीं है। मैंने कभी किसी से लड़ाई नहीं की है। अगर फिर भी आपकी निगाह में हमारी ऐसी कोई लड़ाई है, जिसे आप याद कर रहे हैं तो मेरा निवेदन है अब सब भूल-भाल जाओ। किसी दिन मिल-बैठ कर बात करते हैं।
      अब मैं थोड़े दिनों के लिए आलोचना का काम स्थगित कर रहा हूं। जिस काम से चारों तरफ नाराजगी ही नाराजगी हो उसे करने से क्या फायदा। मैं जब भी कुछ कहता हूं सही समझ कर कहता हूं। आलोचना को लेखक के लिए हितकर मानते हुए कहता हूं। पर यहां तो यदि किसी के लिए अच्छा लिख दिया, तो दूसरे भाई-बंधु नाराज हो जाते हैं। और कुछ ऊपर-नीचे लिख दिया तो भी नाराजगी जाहिर है। कुछ नहीं लिखा तो भी नाराज कि मेरे लेखन पर कुछ क्यों नहीं लिखा। अब सच में मुझे लगने लगा है कि न कुछ कहना ही बेहतर कहना है।
- नीरज दइया
17.11.2016 को गंगानगर दैनिक अर्जुन में

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें