25 अगस्त, 2017

मधु आचार्य ‘आशावादी’ का होना

डॉ. नीरज दइया
यह संयोग है कि मधु आचार्य ‘आशावादी’ का जन्म 27 मार्च, 1960 को विश्व रंगमंच दिवस के दिन हुआ। यह भी संयोग है कि विद्यासागर आचार्य के आंगन में हुआ जिन्होंने नाटक के लिए अपने दोनों बेटों को समर्पित कर दिया। संभवत: इसी कारण और अपनी लगन के बल पर मधु आचार्य ने नाटक, रंगमंच, पत्रकारिता और साहित्य में ऐसा मुकाम हासिल किया, जिस पर देश और दुनिया की नजर है। कवि-कथाकार मित्र राजेन्द्र जोशी के शब्दों में कहें तो मधु आचार्य ‘आशावादी’ का होना और बीकानेर जैसे शहर में होना, अपने आप में बहुत मायने रखता है। बीकानेर एक ऐसा शहर है जिसमें रचनात्मकता के ऐसे बीज हैं जो अपना पर्यावरण खुद निर्मित कर लेते हैं। यहां कला, साहित्य और संस्कृ ति की एक अखूट परंपरा रही है जो निरंतर प्रवाहशील होते हुए मधु आचार्य तक पहुंचती है। नाटक और साहिय के संस्कार अगर घर में मिल जाए तो किसी के कला माध्यम में कुछ खास करने की संभावनाएं बढ़ जाती है। आनंद वी. आचार्य और मधु आचार्य ‘आशावादी’ इसके प्रमाण हैं कि जिन्होंने अपने पिता की थाती को धरोहर की तरह न केवल संभाला, बल्कि उसे विकसित भी किया। मधु आचार्य के साथ एक संयोग चेतना आचार्य से विवाह के साथ जुड़ा। इसे संयोग इसलिए कह जाएगा कि पिता के साथ ससुर भी साहित्यिक परंपरा से जुड़े होने से पूरी पारिवारिक पृष्ठभूमि मधु आचार्य के साथ जुड़ती है और दूर तक चलती है। बीकानेर के जनकवि बुलाकी दास ‘बावरा’ ने अपने समय में मंचीय कवि के रूप में धूम मचा रखी थी। उनका आशीर्वाद आचार्य के साहित्यिक-संस्कारों को द्विगुणित करने वाला कहा जा सकता है।
बाल्यकाल से ही मधु आचार्य का अनेक विख्यात नामों के साथ पारिवारिक जुड़ाव रहा। शिक्षा और साहित्य के वातावरण में पले-बढ़े छात्र मधु ने जीवन में अनेक मुकाम पार करते हुए, राजनीति विज्ञान से एम. ए. तथा एल.एल.बी. की शिक्षा ग्रहण की। अध्ययन के दौरान गुरु-मार्गदर्शक के रूप में भवानी शंकर शर्मा का सान्निध्य मिला। विभिन्न मंचों पर अनेक नाटकों में कलाकार और निर्देशक की भूमिकाओं का सफल निर्वाह करने वाले मधु आचार्य ने कभी किसी काम से गुरेज नहीं किया। उनके संस्कार ही ऐसे थे कि स्टेज पर और जीवन में भी किसी भी काम को कभी छोटा-बड़ा नहीं समझा। वर्षों तक नाटक के लिए कुछ भी करने और करवाने का जुनून-जिद पालते रहे। इसी यात्रा में आपने 75 नाटकों का निर्देशन और 200 से अधिक नाटकों में अभिनय कर एक कीर्तिमान स्थापित किया। साहित्य सृजक के रूप में वर्ष 1990 से जुड़ाव हुआ। तब से अब तक विविध विधाओं मंन निरंतर लिख-पढ़ रहे हैं। ‘स्वतंत्रता आंदोलन में बीकानेर का योगदान’ विषय पर शोध-कार्य भी किया है।
साहित्य-लेखन की यात्रा का आगाज राजस्थानी नाटक ‘अंतस उजास’ (1995) से हुआ। यह एक प्रयोग था कि किसी जन कवि की कविताओं को नाटक में प्रयुक्त किया जाए। मंच पर लोक-रंग को बिखेरने वाला यह नाटक जितनी बार मंचित हुआ सफल रहा। बाद में यह नाटक राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृ ति अकादमी, बीकानेर की पांडुलिपि प्रकाशन योजना के अंतर्गत प्रकाशित हुआ। पत्रकारिता से जुड़े मधु आचार्य ‘आशावादी’ के दैनिक राष्ट्रदूत से दैनिक भास्कर तक की यात्रा के अनेक मुकाम और पड़ाव हैं। रंगकर्मी-नाटककार और पत्रकार के रूप में अपना लौहा मनवा चुके आशावादी ने साहित्य में ‘गवाड़’ के माध्यम से जैसे दूसरी पारी का श्रीगणेश किया। इस बार साहित्य-प्रांगण में एक के बाद एक और कभी एकसाथ अनेक पुस्तकें और विधाओं में अपनी रचनात्मकता प्रस्तुत करते गए, जो अब भी जारी है। विशाल अनुभव लिए मधु आचार्य ‘आशावादी’ ने साहित्यिक दुनिया को नवीन आभा देने का प्रेरणास्पद आगाज बीकानेर में किया है। प्रकाशन के बाद भव्य लोकार्पण अपनी पूरी टीम के साथ मिलकर करने में वर्तमान समय और समाज में साहित्य की गरिमामय पुनस्र्थापना का लक्ष्य अंतर्निहित है।
अब तक राजस्थानी में प्रकाशित पुस्तकें हैं- ‘गवाड़’, ‘अवधूत’, ‘आडा-तिरछा लोग’, ‘भूत भूत रो गळो मोसै’ (उपन्यास); ‘ऊग्यो चांद ढळ्यो जद सूरज’, ‘आंख्यां मांय सुपनो’, ‘हेत रो हेलो’ (कहानी-संग्रह); ‘अमर उडीक’, ‘अेक पग आभै मांय’ (कविता-संग्रह)। आपने शिक्षा विभाग, राजस्थान के लिए ‘सबद साख’ (विविधा) पुस्तक का संपादन भी किया है। हिन्दी में भी विविध विधाओं में 26 पुस्तकें अब तक प्रकाशित हुई हैं। यथा- ‘हे मनु!’, ‘खारा पानी’, ‘मेरा शहर’, ‘इन्सानों की मंडी’, ‘@24 घंटे’, ‘अपने हिस्से का रिश्ता’, ‘दलाल’ (उपन्यास), ‘सवालों में जिंदगी’, ‘अघोरी’, ‘सुन पगली’, ‘अनछुआ अहसास और अन्य कहानियां’, ‘जीवन एक सारंगी’, ‘चिड़िया मुंडेर पर’ (कहानी-संग्रह), ‘चेहरे से परे’, ‘अनंत इच्छाएं’, ‘मत छीनो आकाश’, ‘आकाश के पार’, ‘नेह से नेह तक’, ‘देह नहीं जिंदगी’, ‘रेत से उस दिन मैंने पूछा’, ‘श से शायद शब्द....’, ‘गुमान में खड़ा आकाश’, मौन में उसे देखना' (कविता-संग्रह), ‘गई बुलेट प्रूफ में’ (व्यंग्य संग्रह) ‘रास्ते हैं, चलें तो सही’ (प्रेरक निबंध), ‘अपना होता सपना’, ‘चींटी से पर्वत बनी पार्वती’, ‘खुद लिखें अपनी कहानी’, ‘सुनना, गुनना और चुनना’ (बाल साहित्य)।
बीकानेर में मधु आचार्य का होना एक संयोग है और मेरा उनकी इस साहित्यिक यात्रा को करीब से देखना भी संयोग है। साहित्य में पुरस्कारों के विषय में मानते हैं कि पुरस्कार संयोग होते हैं। मधु आचार्य ‘आशावादी’ ने लेखन में पुरस्कारों के स्थान पर सतत लेखन को महत्त्व दिया है। संयोग है राजस्थानी उपन्यास ‘गवाड़’ पर उन्हें जहां राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृ ति अकादमी का ‘मुरलीधर व्यास राजस्थानी कथा-पुरस्कार’ अर्पित किया गया और इसी कृ ति पर वर्ष 2015 का साहित्य अकादेमी पुरस्कार भी अर्पित किया गया है।
अन्य पुरस्कार और सम्मान है- राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, जोधपुर से ‘राज्य स्तरीय नाट्य निर्देशक अवार्ड’, ‘शंभू-शेखर सक्सेना विशिष्ट पत्रकारिता पुरस्कार’, सादूल राजस्थानी रिसर्च इन्स्टीट्यूट, बीकानेर से ‘तैस्सितोरी अवार्ड’ एवं नगर विकास न्यास द्वारा भी पुरस्कृ त-सम्मानित। राजस्थान संगीत नाटक अकादमी के आप उपाध्यक्ष रहे तथा साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली के राजस्थानी भाषा परामर्श मंडल के सदस्य के रूप में उल्लेखनीय सहभागिता है। आपकी अनेक रचनाओं के विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित हुए हैं और विश्वविद्यालयों द्वारा रचनाओं पर शोध-कार्य भी हुआ है। प्रतिदिन लिखना-पढऩा केवल अनिवार्य मानते ही नहीं वरन मधु आचार्य ‘आशावादी’ प्रतिदिन करणीनगर स्थिति अपने निजी आवास में इतना पढ़ते-लिखते हैं कि लोगों को आश्चर्य होता है। इतना ही नहीं इस लिखने-पढऩे के बीच अपने मित्रों और परिजनों से मिलने जुलने के साथ ही जन-जन के चहेते मधु आचार्य अपनी व्यस्तताओं के बीच नित्य समय-प्रबंधन ऐसा करते हैं कि वे सभी जगह मौजूद मिलते हैं। आचार्यों के चौक स्थित अपने पैतृक आवास कलकत्तिया भवन में रहते हैं। नित्य बेहद सरल, सीधे मिलनसार आत्मीय मधु आचार्य अपने पत्रकारिता, साहित्यिक व्यक्तित्व के बिना किसी आवरण पाटों पर बैठे हथाई करते मिलते हैं। अपने सभी रूपों को विस्मृत कर वे संजीदा इंसान के रूप में मिलते हैं। कला माध्यम से जुड़े अथवा शीर्ष पर पहुंचे व्यक्ति का जीवन में एक योग्य इंसान होना ही उसका असल है। अपनी रचनाओं के माध्यम से निर्माण के नवीन विचार एक अच्छा इंसान ही बेहतर दे सकता है।
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मधु आचार्य का प्रकाशित साहित्य
• 1995 अतंस उजास (नाटक)
• 2012 ‘गवाड़’ (राजस्थानी उपन्यास)
• 2013 ‘हे मनु!’ (उपन्यास), ‘चेहरे से परे’ (कविता संग्रह) ‘सबद साख’ (संपादन)
• 2014 ‘खारा पानी’, ‘मेरा शहर’, ‘इंसानों की मंडी’ (उपन्यास), ‘अवधूत’, (राजस्थानी उपन्यास), ‘सवालों में जिंदगी’, ‘अघोरी’(कहानी संग्रह), ‘उग्यो चांद ढळ्यो जद सूरज’ (राजस्थानी कहानी संग्रह), ‘अनंत इच्छाएं’, ‘मत छीनो आकाश’ (कविता संग्रह), ‘रास्ते हैं, चले तो सही’ (प्रेरक निबंध)
• 2015 ‘@24 घंटे’ (उपन्यास), ‘आडा-तिरछा लोग’ (राजस्थानी उपन्यास), ‘सुन पगली’, (कहानी संग्रह), ‘आंख्यां मांय सुपनो’ (राजस्थानी कहानी संग्रह), ‘आकाश के पार’, ‘नेह से नेह तक’, ‘देह नहीं है जिंदगी’ (कविता संग्रह) ‘अमर उडीक’ (राजस्थानी कविता संग्रह)
• 2016 ‘अपने हिस्से का रिश्ता’(उपन्यास), ‘अनछुआ अहसास और अन्य कहानियां’, ‘जीवन एक सारंगी’ (कहानी संग्रह), ‘रेत से उस दिन मैंने पूछा’, ‘श से शायद शब्द....’ (कविता संग्रह), ‘गई बुलेट प्रूफ में’ (व्यंग्य संग्रह), ‘अपना होता सपना’, ‘चींटी से पर्वत बनी पार्वती’ (बाल उपन्यास) ‘खुद लिखें अपनी कहानी’(बाल कथाएं) ‘सुनना, गुनना और चुनना’(बाल कविताएं)
• 2017 ‘भूत भूत रो गळो मोसै’ (राजस्थानी उपन्यास), ‘हेत रो हेलो’ (राजस्थानी कहानी संग्रह), ‘एक पग आभै मांय’ (राजस्थानी कविता संग्रह) दलाल (उपन्यास) मुंडेर पर चिड़िया (कहानी संग्रह) गुमान में खड़ा आकाश, मौन में उसे देखना (कविता संग्रह)
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