11 अगस्त, 2017

असत्य के प्रयोग

    बापू की आत्मकथा का नाम है। सत्य के प्रयोग। उन्होंने बताया जो मैं पहले से जानता था, पर नई बात यह थी कि वे किताब लिख रहे हैं- असत्य के प्रयोग। केवल किताब ही नहीं लिख रहे, उन्होंने कहा कि वे प्रयोग भी कर रहे हैं। उनका मानना है कि सत्य से भला क्या प्रयोग करना? जो सत्य है, वह तो सत्य है। प्रयोग का विषय तो असत्य है। अब जमाना सत्य का नहीं, केवल और केवल असत्य का ही जमाना है। अब तो झूठों का बोलबाला और सच्चे का मुंह काला वाली अनेक बातें और स्थितियां हमारे समाने हैं। वे महाश्य मुंह खोल कर खड़े थे और बीच-बीच में बोल रहे थे- मुझसे मुंह मत खुलवाओ, आपको सबको पता है कि कहां क्या-क्या हो रहा है। मैंने उन्हें टोका- मुझे कुछ भी नहीं पता कि कहां क्या-क्या हो रहा है?
    उन्होंने मुझे ऊपर से नीचे तक घूरते हुए कहा- अखबार नहीं पढ़ते हो या समाचार नहीं सुनते हो। छोड़िए इन दोनों को, क्या चौक में नहीं बैठते हो। आस-पास की गप्प-गोष्ठी का आनंद तो लेते ही हो। फिर भी भोले बनते हो। क्या आप भी मेरी तरह असत्य का कोई प्रयोग मुझ पर करने लग गए हो? देखिए, यह आपका विषय नहीं है। मैंने इसे खोजा है और इस पर मुझे काम करने दो। मेरी किताब छप जाए फिर देखना सबकी आंखें खुल जाएगी। मुझे फिर उनको टोकना पड़ा- जनाब आंखें तो सभी की खुली हुई है।
    वे तनिक गुस्से से बोले- आप सब कुछ समझकर भी नादान बनते हैं, उसका कोई क्या कर सकता है! आंखें तो खुली हुई है, पर फिर भी खुली हुई नहीं है। इसे ऐसे समझ सकते हैं कि हमारा आदर्श वाक्य है- सत्यमेव जयते। जानते हैं ना? मैंने गर्दन स्वीकृति में हिलाई तो वे बोले- मेरी किताब पढ़ने के बाद वही वाक्य नए रूप में दिखाई देने लग जाएगा। आज सत्य की जीत कहां हो रही है। झूठ बेचा जा रहा है, खरीदा जा रहा है। चारों तरफ झूठे लोग भरे पड़े हैं। जिसे देखो- झूठ बोलते हैं और सरासर झूठ बोलते हैं। सफेद झूठ को रंग-बिरंगे लुभावने रंगों में सजा कर पेश किया जा रहा है। नहीं समझें? मैं विज्ञापनों की बात कर रहा हूं। वस्तुओं की कीमत की बात कर रहा हूं। दो रुपये के माल को बीस रुपये में बेचने वाले एम.आर.पी. के नाम पर भोली भाली जनता को ठग रहे हैं।
    मैंने बीच में पूछना मुनासिब समझा कि असत्य के प्रयोग किताब में क्या इन्हीं सब बातों पर प्रवचन मिलेंगे? वे हंसने लगे और बोले- आप भी ना कितने भोले हैं। देखिए मैं प्रयोग कर रहा हूं। किताब लिखने की बात कर रहा हूं और अगर किताब लिख दी तो फिर यह असत्य, कैसे असत्य रहेगा? बात को समझा करो, मैं सच में असत्य के प्रयोग कर रहा हूं। मैंने उन्हें प्रणाम कर बस इतना ही कहा- धन्य हैं आप। धन्य है आपकी धरा और धन्य जननी। जैसे उन्हें मेरे इसी धन्य का इंतजार था। वे मुडे और चल दिए।
    मैं उन्हें मंथर गति से जाते हुए देख रहा था कि पंच काका आ पहुंचे, बोले- ये पागल क्यों आया था। इसकी ज्यादा मत सुना करो। सबके पास ऊल-जलूल बातें करता फिरता है। यह अच्छा किया इसे घर में नहीं बैठाया। इसके घरवाले भी इससे परेशान है। इस से होता कुछ नहीं, इसे करना कुछ नहीं। बस फालतू बातें करता रहता हैं। इसका काम लोगों के दिमाग खराब करना है।
० नीरज दइया 
 

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