हिन्दी साहित्य का यह सबसे बड़ा और कटु सत्य है कि यहां विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों द्वारा शोध, आलोचकों द्वारा की रचना की बजाय नाम को महत्त्व अधिक दिया जाता है, कमोबेश यह भेड़चाल है जिसका खामियाज़ा हर अच्छे लिखनेवाले को भुगतना पड़ता है और अच्छा-सराहनीय लिखने के बावज़ूद वह हाशिए पर, अचर्चित और गुमनाम-सा ही रह जाता है। राजस्थान के लेखकों के साथ ये दुर्घटनाएं सबसे अधिक हुयीं हैं। सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह कि खुद यहां के बड़े- बड़े तथाकथित नामधारी, आलोचना में चर्चित आलोचको ने यहां के शब्दकारों की बजाए उन दिल्ली, भोपाली लेखकों के लेखन पर ज्यादा काम किया जो उन्हें अधिक से अधिक प्रोजेक्ट लाभ, नाम- इकराम, किसी न किसी अकादमी, संस्था, फाउंडेशन में फिट करा सकते थे। इस दिशा में यह सुखद लगता है कि बीकानेर के राजस्थानी-हिन्दी में समान अधिकार से लिखनेवाले युवा कवि, आलोचक डा. नीरज दइया ने इस ओर ध्यान दिया और उनकी दो किताबें बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार व मधु आचार्य ‘आशावादी’ के सृजन-सरोकार सूर्य प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर से आयी हैं। अभी मैं “बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार” से गुजर रहा हूं चूंकि मैं बुलाकी शर्मा, उनके लेखन से व्यक्तिश: जुड़ा हूं, उनकी सृजन-यात्रा के के हर पड़ाव का न केवल साक्षी रहा हूं अपितु उन्हें निकटता से जानने का दावा तो नहीं करता लेकिन अवसर जरूर मिलता रहा है और मुझे इस बात का संतोष और खुशी है कि डा. नीरज दइया मुझ से भी कहीं गहरे बुलाकी शर्मा के लेखन और व्यक्तित्व को जानने में सफल हुए हैं।
बुलाकी शर्मा शब्द-जगत में बीकानेर की ऐसी शख्सियत है जिस पर हर शहर ऐसी शख्सियत के अपने शहर में होने का गर्व कर सकता है एक ऐसा समन्वयवादी दोस्त- दुश्मन सभी से मधुरभाषी, व्यवहार-कुशल व्यक्तित्व हैं जिनके बारे में एक शब्द ’अजात शत्रु’ बिज्जी ने सही ही कहा था। चालीस बरसों से राजस्थानी- हिन्दी में व्यंग्य- कथा साहित्य में निर्बाध रूप से निरंतर उनकी कलम चल रही है। राजस्थानी- हिन्दी दोनों ही भाषाओं में अकादमी सम्मान के अलावा उन्हें कई सम्मान से भी अधिक लेखकों-पाठकों के बीच गहरी पहचान उनकी कलम की बदौलत हासिल है। उनका व्यक्तित्व और कृतित्व देखते हुए सहज ऐसी अपेक्षा और आवश्यकता बेमानी नहीं है कि उनके रचनाकर्म पर विस्तार से आलोचनात्मक आलेख, बातचीत, बहस और मूल्यांकन आदि हो।
एक ऐसा समय जब जीवन के हर क्षेत्र में व्यक्ति आत्ममुग्धता में जी रहा है, कला- साहित्य में तो यह चरम पर है। सब एक-दूसरे की टांग खींचने में जुटे हैं, कौन मित्र-शत्रु है, कौन शत्रु-मित्र, पहचान मुश्किल है, हर कार्य-करम किसी न किसी स्वार्थ, हित में निहित हो चुका हो, ऐसे में किसी के व्यक्तित्व, सृजन का सम्यक मूल्यांकन का विचार ही आश्चर्यजनक लगता है, पर जैसा कि नीरज दइया को जाननेवाले जानते हैं, वे ऐसे आश्चर्यजनक शुभ करते रहते हैं, उन्हंत ऐसे सभी शुभ के लिए साधुवाद।
बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार कृति में डा. नीरज दइया ने अथ श्रीबजरंग बली की डायरी, धूमिल होते समय के एलबम के पन्ने, अफलातून की धूम, अजात शत्रु की काया- माया, लिखा तो ठीक ही है, बात एक कालजयी कहानी की, नवीन कथा शैली में सम्बन्धों के ग्राफ, सुनने- सुनाने और पढ़ने- पढ़ाने की कहानियां, राजस्थानी व्यंग्य विधा के परसाई, खुद घायल होने का हौंसला और हुनर, चेखव की बन्दूक यानी बीएस फिफ्टी वन, वरिष्ठ व्यंग्यकार की श्रेणी में, सदा स्मरणीय बाल साहित्यकार, नाटककार, अनुवादक और सम्पादक के रूप में, बुलाकी शर्मा से सृजन-संवाद और अंत में बुलाकी शर्मा की सृजन- यात्रा जैसे आकर्षक शीर्षकों से बुलाकी शर्मा के सम्पूर्ण व्यक्तित्व और कृतित्व को एक मंच पर सामने लाने का जो सद्प्रयास किया है, उस में वे सफल रहे हैं। पुस्तक के अंत में बुलाकी शर्मा के लेखन और व्यक्तित्व की परतें खोलनेवाला साक्षात्कार दिया गया है जो महत्त्वपूर्ण हैं, जिस में इस किताब को तैयार करते समय उनके लेखन और व्यक्तित्व के बारे में उपजी हमारी कुछ शंकाओं से सम्बन्धित सवालों के लेखक द्वारा दिए गए माकूल जबाब, कुछ और प्रश्नो की राह खोलते हैं, हो सकता है उन प्रश्नों के उत्तर लेखक आगे कभी दें। एक प्रश्न बहुभाषाओं में लिखनेवाले लेखक अपनी रचनाओं को दोनों भाषाओं की किताबों में रखते हैं , उन रचनाओं की मौलिकता के बारे में हैं, वह किस भाषा में मौलिक है, का उत्तर जो उन्होंने दिया है, से तो मैं भी सहमत नहीं। मेरा मानना है यह रचना के प्रति अतिरिक्त मोह के अलावा कुछ नहीं हैं जो वह उसी एक रचना को लेखक अपने लेखन की हर भाषा में देखना-दिखाना चाहता है।
सुन्दर आवरण के लिए प्रख्यात चित्रकार-कवि कुंवर रवीन्द्र एवं सुरुचिपूर्ण प्रकाशन के लिए सूर्य प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर के डॉ. प्रशांत बिस्सा बधाई के पात्र हैं।
- नवनीत पाण्डे
(लेखक वरिष्ठ कवि-कथाकार है)
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पुस्तक : बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार (आलोचना) / लेखक : डॉ. नीरज दइया
प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन, मंदिर, बीकानेर ; पृष्ठ-88 ; संस्करण 2017 ; मूल्य-200/-
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