30 अगस्त, 2017

शाश्वत जीवन और छलांग

    कुछ चीजें जो हम पाना चाहते हैं, वे  कैसे मिल सकती है? कहते हैं कुछ चीजें सोचने से मिलती हैं। जो पाना है उसके बारे में सोचते रहो और वे एक दिन मिल जाएंगी। सोचने की अवधि के बारे में कुछ विवरण नहीं है। यह उस चीज और आपके सोचने की क्षमता पर निर्भर है। यह बड़ी गहरी बात है। एक दूसरी बात कि कुछ चीजों को पाने के लिए बिना सोचे-समझे छलांग लगानी पड़ती है। अगर आप कुछ चीज को पाने के लिए छलांग लगाते हैं और आपके हाथ-पैर या कुछ भी टूट-फूट होती है तो जिम्मेदार मैं नहीं हूं। यह ज्ञान मेरा नहीं है। यह गहन चिंतन-मनन भगवान ओशो का है। वे तो यहां तक कह गए हैं कि जिस किसी ने कहा होगा कि कोई भी छलांग लगाने के पहले हजार बार सोचना चाहिए, कहने वाला कोई कायर या कमजोर रहा होगा। बकौल ओशो- छलांग पहले लगा लो, सोचना कभी भी। शाश्वत जीवन पड़ा है, जब दिल आए सोच लेना, मगर छलांग तो लगा लो। ठीक बात है बाद में अस्पताल या घर में पड़े-पड़े आराम से सोचा जा सकता है। वैसे जेल सोचने के लिए बेहद उपयुक्त जगह है। जेल में सोचने और सोचने के अनेक प्रमाण हम अनेक कृतियों के रूप में गिना सकते हैं, जो जेल में लिखी गई हैं। 
    बिना सोचे और कम सोचे छलांग लगाने वालों में युवा पीढ़ी बड़ों को भी पीछे छोड़ चुकी है। खेल खेल में वे छलांग लगा कर मौत को गले लगा लेते हैं। कभी प्रेमी छलांग लगाता है कभी प्रेमिका। कभी खुशी में छलांग लगाई जाती है तो कभी गम में। कभी मिलन में छलांग का दृश्य आता है और कभी विरह में। छलांग के बारे में इसलिए ओशो ने कहा कि सोचना नहीं है। पीछे घरवालों के बारे में अपने परिवार और मित्रों के बारे में बिल्कुल सोचने नहीं है। क्यों कि सोचने वाला छलांग लगा ही नहीं सकता। कहते हैं कि जितनी चादर है उतने पैर फैलाओ की बातें ऐसे लोगों पर लागू नहीं होती है। उनका मानना है कि पैर लंबे हैं तो क्या काट लें? हम तो खुल कर और जी भर के पैर फैलाएंगे। कर्ज लेकर चादर को लंबा-चौड़ा करेंगे, और बाद में छलांग लगाएंगे। ऐसी छलांग में देश से भाग जाने वालों के अनुपम उदाहरण हम जानते हैं। नीति और धर्म की बातें बताने वाले ही जब अलमस्त हो कर छलांगें लागने में व्यक्त है तो फिर रोकने वाला है कौन? समझाने वाला ही मूर्खताएं करें तो फिर किसे दोष ? 
    देश में ओशो को मानने वाले बहुत है। धर्मगुरु और बाबाओं ने भी ओशो के इस चिंतन पर ममन किया और कई छलांग लगा चुके हैं, कुछ तैयारी में है। बिना सोचे-समझे छलांग लगा कर सफलता हासिल करने का सुख तो उन्हें मिला ही किंतु बाद में जो कुछ हुआ और जो कुछ हो रहा है वह बस नसीब की बातें है। पहुंचे हुए धर्मगुरु, साधु, संन्यासी जो कहते हैं करते हैं उनमें इतनी गूढ़ता होती है कि सामान्य व्यक्ति के समझने की बात होती ही नहीं। वे ईश्वर की भांति इस संसार में लीला करने आते हैं और कुछ की लीला गुप्त रहती है कुछ की जगजाहिर हो जाती है। बापू आशाराम से राम-रहीम की यात्रा में यही हुआ कि आम आदमी हैरान हो गया। सामान्य आदमी की तो औकात ही क्या, इस खेल को तो विशिष्ट आदमी भी देखते रह गए।
    पंच काका कहते हैं कि यह होना स्वभाविक था, क्योंकि छलांग शब्द को गंभीरता से देखें। इसमें अनेक ध्वनियां और अर्थ छुपे हैं। छलांग में जो ‘लांग’ है वह धोती की लांग का संकेत हैं। छ वर्ण असल में छह की ध्बनि देता है। वे तो यहां तक मानते हैं कि छलांग में मूल शब्द ‘छल’ है और उसमें ‘अंग’ जोड़ कर छलांग बना है। छल और अंग की व्याख्या ऐसे संतों ने अपने अपने ढंग से की है। 
     ० नीरज दइया

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