अभी दो महीने ही पूरे नहीं हुए मुझे इस घर में काम करते हुए और अचानक आज मां सा ने कह दिया- ‘सुनो! कल से काम पर नहीं आना।’ इस दिनोदिन बढ़ती मंहगाई में हम जैसी को जब तक दो-चार घरों में काम नहीं मिले तो गुरज-बरस कैसे हो... चारों तरफ हायतौबा मची हुई है। मुझे रहा नहीं गया, मैं बोल पड़ी- ‘क्यों मां सा क्या हुआ? मुझ से कोई गलती हो गई क्या?’
मां सा नरम पड़ गई और बोली- ‘नहीं री... गलती कैसी। ऐसा है मुझे से इस उमर में घर का कामकाज होता नहीं। वैसे हमारे घर में काम है भी कितना सा... चार जनों की रोटी बनाना और साफ-सफाई।’
- ‘तो मैं आप जब कहो आ जाती ना.... बताओ जल्दी आना है या फिर लेट...?’
- ‘अरे नहीं तू बहुत भोली है री। देख इत्ते दिन बहू अपने पीहर गई हुई थी। अब वो कल आ रही है। वही करती थी पहले और अब भी कर लेगी...।’
मैं मन मसोस कर रह गई। क्या कहती? पर मन ही मन में तो अपने आप बोल फूट ही गए- ‘अच्छा कल तुम्हारे वाली नई नौकरानी आ रही है।’
- डॉ. नीरज दइया
००००
20 मार्च, 2023
लघुकथा- नई नौकरानी / डॉ. नीरज दइया
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें