सुबह-सुबह अखबार मेरे हाथों में आते ही मैं खोजना आरंभ कर देता हूं। अखबार की पहली खबर से चालू होकर अंतिम पंक्ति तक बस मैं बस खोजता और खोजता रहता हूं कि कहीं कोई मेरे काम की खबर मिल जाए। रविवार और साहित्य परिशिष्ठ के दिन तो मैं अपनी रचना को खोजता हूं कि संपादक ने मेरी रचना को स्थान दिया है या नहीं बाकी दिनों में मेरी खोज अलग होती है। अब आपसे क्या छिपाना आप कोई मुझ से अलग थोड़ी हैं मैं तो जैसे कोई कुंवरा वैवाहिक विज्ञापनों में वधू को खोजता है वैसे ही पुरस्कारों को ढूंढ़ता हूं। यह मेरा दुर्भाग्य कि मुझे सफलता बहुत कम नसीब होती। संपादकों के लिए मैं आदर के अतिरिक्त अन्य शब्दों का प्रयोग करते हुए कुछ कह भी कैसे सकता हूं वर्ना जो कभी कभार मेरी रचना को स्थान देते हैं वह भी बंद कर देंगे।
मैं निवेदन की मुद्रा में यह तो कह सकता हूं कि वे पुरस्कारों की खबरें जरा विस्तार से और पूरी प्रकाशित किया करें। जनता को इससे कोई सरोकार नहीं है कि यह पुरस्कार कैसे मिला है, पर मैं लेखक के रूप में यह जानने का थोड़ा हक और अधिकार रखता हूं। मेरे लिए यह जानकारी बहुत जरूरी है कि पुरस्कार किसे मिला, किस रचना पर मिला, कितनी राशि का मिला और संस्था ने किन-किन को निर्णायक बनाया है। सबसे अधिक जरूरी यह पुरस्कार सम्मान दूसरे लेखकों यानी कि मुझे कैसे मिल सकता है। मैं इसे पाने के लिए क्या क्या तैयारी करूं। जैसे कंपटीशन की तैयारी के लिए देश में जगह जगह कोचिंग सेंटर खुले हैं वैसे ही पुरस्कार पाने के लिए संस्थाओं को ऐसे सेंटर भी खोलने चाहिए।
सुना है कि कुछ जुगाड़ू किस्म के लेखक पुरस्कार पाने के लिए डोनेशन के नाम पर बढ़ चढ़ कर रकद सहायता-सहयोग के नाम पर देते हैं। आश्चर्य की बात है कि पुरस्कार और सम्मान का पूरा खर्च गोपनीय रूप से उठाने वाले लेखकों को हसंते खिलखिलाते देखा गया है। उनके कांधे या सिर पर कोई शिकन या बोझ कहीं दिखाई ही नहीं देता है। माना कि संपादक यह सब गोपनीय बातें नहीं छाप सकता है किंतु कुछ तो उसका उत्तरदायित्त्व होता है। कुछ लेखक किस्म के संपादक खुद तो ऐसे जानकरियों से लाभ उठा लेते हैं किंतु अपने पाठकों और अन्य लेखकों को वंचित रखते हैं जिससे वे पुरस्कार की दौड़ में पीछे रह जाते हैं।
मैं यह अध्ययन अर शोध लंबे समय से कर रहा हूं और अब मेरे अध्ययन के परिणाम या कहें सार आपके सामने प्रस्तुत करने का समय आ गया है। मैं योग्य लेखक हूं और आप में से भी अनेक योग्य लेखक होंगे। हमें कुछ ऐसा करना यह है कि साहित्य के जुगाड़ू लेखकों की टें बोल जाए। मेरे इस अध्ययन में अकादमी के पुरस्कारों पर विशेष अध्ययन किया गया है क्यों कि वहां सूचना का अधिकार सक्रिय है। सेठों और साहूकारों की संस्थाओं के नाम भले सेठ-साहूकार रखें हो किंतु असल में ये सब चोरों-लुटेरों की संस्थाएं होती हैं। इनका साहित्य और पुरस्कार से लेश मात्र का लोभ नहीं होता ये बस इस नाम पर वीआईपी को बुलाकर उनके हाथों पुरस्कार प्रदान कराते समय अपनी फोटो और लाभों को ध्यान में रखते हैं।
पुरस्कार रहस्य जो जितना मैंने जाना वह यह है कि पुरस्कार की प्रविधि को शमशाम में ले जाने वाली अर्थी से समझ सकते हैं। जिस प्रकार अर्थी को उठाने की होड लगी रहती है वैसे ही पुरस्कार को पाने के लिए और कंधा देने के लिए चारों तरफ होड़ लगी हुई है। यह विचित्र संयोग है कि पुरस्कार समिति में भी एक संयोजक और तीन निर्णायक अर्थात कुछ चार होते हैं और अर्थी भी चार लोग मिलकर उठाते हैं। अर्थ काच की तरफ एकदम साफ है कि ये चारों साहित्य के ठेकेदार चाहे तो किसी लेखक की अर्थी उठाएंगे और कहेंगे तो नहीं उठाएंगे। मना कर देंगे। कहने को तो कहा जाता है कि संयोजक की भूमिका मूकदर्शक भर होती है किंतु मूक बधिर भी इशारे में बहुत कुछ कह देते हैं फिर यह तो ठहरा तुर्रम खां संयोजक। कभी निर्णायक कोई बाप किस्म का आदमी आ जाए तो बात अलग है वर्ना सारी बात संयोजन के संकेतों पर ही रहती है।
मेरे देश के महान संपादकों और अखबारों को मालिकों मैं आपके किस्म किस्म के पत्रकारों और पत्रकारिता के घटकों की दुहाई देते हुए वॉच डॉग पत्रकारिता के मसीहाओं का आह्वान करता हूं कि मेरे इस अध्ययन का फायदा उठाएं और अकादमी पुरस्कारों को अर्थी से समझें कि अर्थी को वैसे तो कोई भी कंधा दे देता है एक राह चलता राहगीर भी। किंतु असल सवाल है कि किसी की अर्थी को कंधा देने का असली हकदार कौन है? शव किसी बाप का है तो बेटे हकदार होगा और बेटे का है तो उसके बाप-दादा। साहित्य पुरस्कारों में घोर अंधेरा देखा जा रहा है। कंधा देने वाले ऐसे गैरे नत्थू खैरे हैं। जो साहित्य के अ-आ-ई सीख रहे हैं उनको संयुक्ताक्षरों तक पहुंचा दिया गया है। निर्णायक स्कूल कॉलेज के अध्यापक प्रोफेसर बन रहे हैं जिनको सृजनात्मक साहित्य का अर्थ केवल पाठ्यक्रम में लगी पाठ्यपुस्तकों के अतिरिक्त कुछ आता है। निर्णायक की हैसियत नहीं है कि वह पुरस्कार के लिए सामने प्रस्तुत पुस्तकों का अर्थ अभिप्राय और साहित्य-परंपरा में प्रासंगिकता का आकलन तो बहुत दूर की बात वे अच्छे से उनका वाचन नहीं कर पाएंगे।
अस्तु हे संपादक श्रेष्ठ आप ही आशा का केंद्र है कि कुछ ऐसा करें कि इस युग के जुगाड़ू लेखकों की टें बोल जाए। आदरणीय आपसे इतना कुछ संभव नहीं हो तो इतनी कृपा अवश्य करें कि मेरी इस अधकचरी तृतीय कोटि की रचना को थोड़ा सा स्थान आपने प्रतिष्ठित अखबार में प्रदान करें। आपकी इसी अनुकंपा से मैं स्वयं को धन्य समझूंगा।
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