रामगोपाल को एकएक आवेश आया। मन विचलित हो उठा। ‘ऐसा कैसे कर सकते हैं वे?’ उन्होंने जोर से कहा तो उनकी पत्नी ने बताया- ‘ऐसा तो वे पहले भी कर चुके हैं? जो फ्रिज हमने बेटी के दहेज में दिया उसे उन्होंने आगे किसी को गिफ्ट दे दिया।’ रामगोपाल के गुस्से का बांध सीमा लांध रहा था- ‘यह कब की बात है, मुझे पहले बताया क्यों नहीं?’ पत्नी ने धीरे से कहा- ‘बताती कैसे, तुम्हारी बेटी अब तुम्हारी हमारी नहीं रही। वह उनकी तरफ हो गई है, उसने बताया ही नहीं। यह तो बातों बातों में उसके मुंह से निकल गया कि वाशिंग मसीन जो हमने दहेज में दी उसे वे किसी रिश्तेदार की शादी में गिफ्ट देंगे।’
रामगोपाल ने सोचा कि वह फोन लगा कर अपने समधी जी से बात करे पर अगले ही पल यह विचार त्याग दिया। आगे भी ऐसा हुआ कि उसने फोन किया और उन्होंने फोन उठाया ही नहीं, ना ही वापस उनका फोन आया। पत्नी ने पूछा- ‘क्या हुआ?’
‘कुछ नहीं।’ कहते हुए उन्होंने धीरज बंधाते हुए कहा- ‘शांता, तुम चिंता मत करो। भगवान के घर न्याय है और देखना यहीं का यहीं है। जो जैसा करेगा, वैसा भरेगा। ऊपरवाला सारे कर्मों का हिसाब रखता है।’
शांता को यह सुनकर भी धीरज नहीं आया। उसने कहा- ‘ऊपरवाला तो करेगा जब करेगा, अब मैं करूंगी।’
‘क्या करोगी भागवान?’ रामगोपाल को आश्चर्य हुआ कि यह तो कभी ऐसा नहीं करती। उनको उत्तर मिला- ‘ऑनलाइन ऑडर कर के समधी के घर मैं एक नई वाशिंग मसीन भिजवा दूंगी। बेटी के दहेज में इतने रुपये खर्च किए, इस मामूली खर्च से क्या डरना।’ वह मुस्कुरा रही थी।
- डॉ. नीरज दइया
20 मार्च, 2023
लघुकथा- मामूली खर्च/ डॉ. नीरज दइया
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें